scorecardresearch
Friday, 12 July, 2024
होममत-विमतचीन द्वारा मस्जिदों को नष्ट करना दिखाता है कि मुस्लिम केवल भारत जैसे देशों में ही फल-फूल सकते हैं

चीन द्वारा मस्जिदों को नष्ट करना दिखाता है कि मुस्लिम केवल भारत जैसे देशों में ही फल-फूल सकते हैं

चीन सक्रिय रूप से इस्लामी वास्तुकला को चीनी विचारधारा को प्रतिबिंबित करने वाले प्रतीकों से बदल रहा है, लेकिन मुस्लिम जगत पूरी तरह से खामोश है.

Text Size:

फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी अभूतपूर्व खोजी पत्रकारिता के माध्यम से चीन की एक चिंताजनक सच्चाई को उजागर किया है और वह है मुस्लिम पहचान और संस्कृति का प्रणालीगत उन्मूलन. चीन सक्रिय रूप से इस्लामी वास्तुकला को चीनी विचारधारा को प्रतिबिंबित करने वाले प्रतीकों से बदल रहा है. 2018 के बाद से देश में 2,312 मस्जिदों को कथित तौर पर नष्ट कर दिया गया है या फिर परिवर्तित किया गया है. यह विध्वंस जितना चिंताजनक है उससे भी यह एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाता है: मुस्लिम दुनिया इस तरह के ज़बरदस्त सांस्कृतिक और धार्मिक दमन के सामने चुप क्यों रहती है?

जैसा कि फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा लिखा गया- चीन की दुस्साहसिक कार्रवाइयां वैश्विक ध्यान और निंदा की मांग करती हैं. मुस्लिम दुनिया से सामूहिक प्रतिक्रिया की कमी अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलता और भू-राजनीतिक संदर्भ में मानवाधिकारों के उल्लंघन को संबोधित करने की चुनौतियों को रेखांकित करती है. यह वैश्विक समुदाय के लिए न्याय, मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए सामूहिक रूप से और तत्काल वकालत करने का एक रिमाइंडर है.

मुस्लिम देश चुप क्यों हैं?

यह परेशान करने वाली चुप्पी चीन के वास्तुशिल्प परिवर्तनों से परे फैली हुई है, जो शिविरों में उइघुर मुस्लिमों के दमन के गहरे परेशान करने वाले मुद्दे तक पहुंचती है. इन शिविरों में कथित मानवाधिकारों के हनन पर पाकिस्तान की मौन प्रतिक्रिया चीन के साथ उसके संबंधों को लेकर उलझन को बढ़ाती है. यह एक जटिल साझेदारी है, जो इस्लाम के सिद्धांतों पर स्थापित एक राष्ट्र को साम्यवादी चीन में बड़े पैमाने पर ईश्वरविहीन समाज के साथ एकजुट करती है.

पाकिस्तान अक्सर मुसलमानों और मुस्लिम भावनाओं के खिलाफ कथित अपराधों के लिए पश्चिम की आलोचना करता रहा है. हालांकि, जब बात चीन की आती है तो वह एकदम खामोश रहता है. यह विरोधाभास केवल भौंहें चढ़ाने से कहीं अधिक की मांग करता है. इसके लिए भू-राजनीतिक गतिशीलता की आलोचनात्मक जांच की आवश्यकता है. चीन सक्रिय रूप से मुस्लिम पहचान को धीरे-धीरे मिटा रहा है, लेकिन पाकिस्तान उसके साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की जटिल और चयनात्मक प्रकृति का पता चलता है. वैश्विक मंच पर मुस्लिम भावनाओं की चयनात्मक वकालत दिखाती है कि कैसे इस्लाम को एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जो अक्सर पाकिस्तान में अभिजात वर्ग के हितों की सेवा करता है.


यह भी पढ़ें: अल जज़ीरा के बढ़ते पाखंड को नज़रअंदाज़ करना अब और भी कठिन होता जा रहा है


मूल्यों में स्पष्ट विरोधाभास भौंहें चढ़ाता है और भू-राजनीतिक गतिशीलता की आलोचनात्मक जांच के लिए प्रेरित करता है. इन दोनों देशों को जोड़ने वाले जटिल जाल को समझना उनके गठबंधन की जटिलताओं और मानवाधिकारों और वैश्विक स्थिरता के लिए इसके व्यापक निहितार्थों को समझने में महत्वपूर्ण हो जाता है.

भारत में मुसलमान फलते-फूलते हैं

राजनीतिक विचारधाराओं और धार्मिक संबद्धताओं के बीच यह जटिल नृत्य भारत में और अधिक भ्रमित करने वाला मोड़ लेता है. कुछ लोग सक्रिय रूप से ऐसे आख्यानों को कायम रखने में लगे हुए हैं जो भारत को मुसलमानों के उत्पीड़क के रूप में चित्रित करते हैं. हालांकि, ज़मीनी हकीकत उनके तर्कों से उलट है. हिंदू-बहुल भारत में इस्लाम के विविध रूप पनपते हैं. सऊदी अरब, ईरान, पाकिस्तान या इंडोनेशिया के विपरीत, इस लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में इस्लाम के सभी संप्रदाय पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और समृद्धि के साथ अभ्यास करते हैं.

हालांकि, इस्लामवादी और साम्यवादी आदर्शों वाले बौद्धिक समूह, एक जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा होने के विशेषाधिकारों का आनंद लेते हुए, विदेशी हितों के साथ मिलकर एक दोहरा खेल खेलते हैं. यह एक अजीब परिदृश्य है जहां कम्युनिस्ट और इस्लामवादी दोनों, भारतीय समाज की विविधतापूर्ण छवि में, देश के धार्मिक ताने-बाने और क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती देने के लिए एकजुट होते हैं, और उन विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं जो अक्सर राष्ट्र के सार को कमजोर करते हैं. उन्हें यह आज़ादी चीन में कभी नहीं मिलेगी, जहां कम्युनिस्ट असहमति पर कड़ी कार्रवाई करते हैं. यह भिन्न विचारधाराओं के बीच भारत द्वारा बनाए गए नाजुक संतुलन को दर्शाता है.

इस्लामी दुनिया की शांति रणनीतिक हो सकती है, क्योंकि प्राथमिक ध्यान उन लोगों का मुकाबला करने पर प्रतीत होता है जिन्हें वे आम दुश्मन मानते हैं- हिंदू बहुसंख्यक भारत, यहूदी बहुसंख्यक इज़राइल और ईसाई बहुसंख्यक पश्चिम. इस जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में, कम्युनिस्ट चीन के साथ गठबंधन अस्थायी रूप से उन्हें इन तीन संस्थाओं का मुकाबला करने में मदद कर सकता है. यदि वे इन कथित विरोधियों पर काबू पाने में सफल हो जाते हैं, तो अगले चरण में उनके अस्थायी सहयोगी, कम्युनिस्टों के साथ टकराव शामिल होगा. यह रणनीतिक पैंतरेबाज़ी एक बहुआयामी कूटनीतिक दृष्टिकोण को सामने लाती है, जहां तात्कालिक उद्देश्यों के आधार पर गठबंधन बनाए जाते हैं, जिससे एक भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात तैयार होती है जहां अंतिम खेल अनिश्चितता में डूबा रहता है.

भारतीय मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि अधिकांश लोकतांत्रिक राष्ट्र, जो बड़े पैमाने पर गैर-मुसलमानों द्वारा स्थापित किए गए हैं, उन्हें सम्मान के साथ रहने, अपनी पहचान बनाए रखने और स्वतंत्रता का आनंद लेने के लिए सबसे सही माहौल रहता है. इसके विपरीत, कुछ मुस्लिम-बहुल राष्ट्र – और साम्यवादी सरकारें – व्यक्तियों को उनकी प्राथमिकताओं के अनुसार अपने विश्वास का पालन करने के लिए समान स्तर की धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान नहीं कर सकते हैं.

(आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वे ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: शाहिद अफरीदी से लेकर अब्दुल रज्ज़ाक तक पाकिस्तानी क्रिकेटरों का गंदा, पिछड़ी सोच वाला चेहरा सामने आया


 

share & View comments