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पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा, नई दिल्ली | गेट्टी
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सीबीआई में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच के विवाद ने इस संस्था की प्रतिष्ठा, विश्वसनीयता और छवि को गर्त में मिला दिया है.

समाचार पत्रों में सीबीआई के नंबर एक अधिकारी आलोक वर्मा और नंबर दो अधिकारी राकेश अस्थाना के बीच आंतरिक विवाद की खबरें भरी पड़ी है. यह मामला उस समय सामने आया जब शीर्ष अधिकारी ने अपने डिप्टी के खिलाफ मामला दर्ज कराया. यह केवल अभूतपूर्व नहीं है बल्कि एक संस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर हमला है. जिसे भारत में ‘प्रमुख जांच एजेंसी’ के रूप में जाना जाता है.

अभी तक ज्यादातर राज्य सरकारें ,अदालतें और यहां तक की साधारण लोग भी यही चाहते हैं कि उनका केस सीबीआई को स्थानांतरित कर दिया जाए और उसकी जांच सीबीआई से कराई जाए. उनकी किसी दूसरी संस्था में निष्ठा नहीं रहती है जिससे वे लोग सीबीआई की तरफ रुख करते हैं. ऐसा लगता है अपरिवर्तनीय तरीके से सब कुछ रातों रात बदल गया. दो लोगों के अहम के टकराव के बीच संस्था की प्रतिष्ठा, विश्वसनीयता और छवि को जोरदार झटका लगा है.

किसी भी संगठन में विवाद, मतभेद, अहंकार की लड़ाई आम बात है, लेकिन उनसे निपटने के आसान तरीके भी होते हैं. वे आंतरिक रूप से निपटा लिए जाएं तो अच्छा रहता है. जब सरकारी संगठनों के मामले में चीजें हाथ से बाहर हो जाती हैं, तो संबंधित मंत्रालय या यहां तक कि वरिष्ठ कार्यालयों का हस्तक्षेप होता है. इस मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने इसमें हस्तक्षेप नहीं किया और मामले को इस मोड़ तक आने दिया.

किसी को समझ में नहीं आता कि क्या दांव पर है. किसी भी कानून प्रवर्तन संस्था का अधिकार अपनी कानूनी शक्तियों पर उतना नहीं होता है, जितना अपराधियों के दिमाग में बसा हुआ डर और उनके बारे में व्याप्त रहस्य होता है. सीबीआई के दायरे में मुख्यतः वे अपराधी आते हैं जो अंडरवर्ल्ड, आतंकवाद, पारंपरिक अपराध, आर्थिक अपराध और सबसे अधिक सार्वजनिक कार्यालय के भ्रष्टाचार में शामिल होते हैं. यह बहुत पहले की बात नहीं है जब मैंने देखा है कि इस प्रकार के मामले सीबीआई को हिलाकर रख देते हैं.

सीबीआई के द्वारा याकूब मेमन को गिरफ्तार करने के बाद दाऊद इब्राहिम ने इंडिया टुडे के साथ एक साक्षात्कार में कबूल किया था कि जांच एजेंसी ने उसे चूहा बना दिया जिसके कारण उसको बिल में रहना पड़ता है. दाऊद ने कहा, ‘सीबीआई ने मुझे चूहा बना दिया है. मैं फंस गया हूं और स्वतंत्र रूप से बाहर नहीं जा सकता.’ दाऊद ने कहा कि वह जहां भी जाता है, उसको हर व्यक्ति सीबीआई का एजेंट नजर आता है.

इस वर्तमान विवाद के कारण सीबीआई को गहन क्षति हुई है, सीबीआई अब प्रमुख जांच एजेंसी नहीं है बल्कि एक आत्म विनाशकारी और राक्षस के रूप में नज़र आ रही है.

मुझे आश्चर्य है कि अब सीबीआई को पूछताछ या जांच के लिए कौन पूछेगा. सीबीआई अभियोजक या जांच अधिकारी किस मामले के साथ कानून की अदालत का सामना करेंगे? यह अलग-अलग मत के अपराधियों के दिमाग में क्या प्रभाव डालेगा? कौन सा आईपीएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर सीबीआई में शामिल होना चाहेगा? अदालतों में सीबीआई मामलों का भाग्य क्या होगा? इन सभी सवालों और सभी मुद्दों को संबोधित करना होगा और बाद में जल्द से जल्द जवाब देना होगा.

हम नागरिकों को याद रखना चाहिए कि सीबीआई ने अपनी सभी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ अतीत में देश को सेवा प्रदान की है और सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है.
सरकार के द्वारा झगड़ा करने वाले सेनापतियों को बुलाया जाना चाहिए और उनके मतभेदों को देश के हित में जल्द से जल्द सुलटा लेना चाहिए.

नीरज कुमार दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त थे. उन्होंने 1993 में केंद्रीय जांच ब्यूरो में विशेष कार्य बल की स्थापना की थी, जिसने मुंबई विस्फोटों की जांच की थी. वह वर्तमान में भ्रष्टाचार और सुरक्षा संबंधी मामलों पर बीसीसीआई के मुख्य सलाहकार हैं. वह ‘डायल डी फॉर डॉन’ पुस्तक के लेखक भी हैं.

यह लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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