क्या जातिगत बैठकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर जाति के खुले प्रश्न पर लौट आएगी, या ये बैठके सत्ता की नई बनावट से उपजी बेचैनी का संकेत हैं? यह सवाल 23 दिसंबर 2025 की शाम और ज़्यादा प्रासंगिक हो गया, जब विधायक निवास में ब्राह्मण समाज की एक अहम बैठक हुई. यह बैठक पंचानंद पाठक के लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर आयोजित हुई.
सहभोज के नाम पर हुई इस बैठक की पृष्ठभूमि प्रदेश में ब्राह्मण समाज की कथित राजनीतिक उपेक्षा थी. यह उपेक्षा आदित्यनाथ योगी सरकार के दौर में महसूस की जा रही है. विपक्ष लंबे समय से योगी पर ठाकुर-समर्थक होने का आरोप लगाता रहा है. दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो उत्तर प्रदेश की राजनीति अब किसी एक चुनाव, एक दल या एक जाति तक सीमित नहीं रही है. यह गहरे सामाजिक पुनर्संयोजन, सत्ता की बदलती बनावट और “सम्मान” की नई परिभाषा को लेकर चल रही तीखी खींचतान की कहानी है.
लखनऊ की कड़ाके की ठंड के बीच विधायक निवासों में जो सियासी तपिश दिखी, वह केवल मौसम के खिलाफ खड़ी राजनीति नहीं थी, बल्कि उस असंतोष की अभिव्यक्ति थी, जो लंबे समय से सत्ता के भीतर दबा हुआ था. ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने इस दबे हुए असंतोष को सार्वजनिक मंच पर ला दिया. यह कोई साधारण सामाजिक जमावड़ा नहीं था, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व, प्रतिनिधित्व और घटते प्रभाव को लेकर पैदा हुई बेचैनी का खुला संकेत था.
जब जाति ने तोड़ दी दलीय दीवारें
इस बैठक की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों के ब्राह्मण विधायक भी शामिल हुए. अपने वर्चस्व की तलाश में जातिगत गोलबंदी ने दलीय सीमाओं को तोड़ दिया, क्योंकि सवाल अब पार्टी का नहीं, बल्कि जातीय राजनीतिक भविष्य का था.
पूर्वांचल और बुंदेलखंड से आए लगभग 45–50 विधायकों की मौजूदगी ने साफ कर दिया कि यह मामला किसी एक क्षेत्र या किसी एक नेता की नाराज़गी तक सीमित नहीं है. डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी, रत्नाकर मिश्रा, उमेश द्विवेदी, साकेत मिश्रा, ऋषि त्रिपाठी, प्रकाश द्विवेदी, अनिल त्रिपाठी, बाबूलाल तिवारी और धर्मेंद्र सिंह (भूमिहार) जैसे प्रभावशाली नामों की मौजूदगी इस बात का प्रमाण थी कि यह बैठक सत्ता के भीतर से उठी एक संगठित आवाज़ है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा.
जातिगत गणित और सत्ता की स्थिरता
इस पूरी राजनीति को समझने के लिए जातिगत गणित को केंद्र में रखना ज़रूरी है. उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 9–10 प्रतिशत और ठाकुर/क्षत्रियों की 7–8 प्रतिशत मानी जाती है. यानी दोनों को मिलाकर करीब 16–18 प्रतिशत का वह सामाजिक आधार, जो किसी भी बहुकोणीय चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है.
2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत के पीछे जिस “सामाजिक इंजीनियरिंग” की चर्चा हुई, उसमें ब्राह्मण–ठाकुर समर्थन एक मज़बूत स्तंभ था. इससे पहले 2012 में समाजवादी पार्टी की सत्ता-वापसी में भी ब्राह्मण नेतृत्व को सत्ता-संरचना में जगह देना रणनीति का अहम हिस्सा रहा.
इतिहास गवाह है, जब इस वर्ग को सत्ता में सम्मानजनक हिस्सेदारी का भरोसा मिलता है, तो वह सत्ता को स्थिरता देता है; और जब उसे लगता है कि उसकी भूमिका केवल प्रतीकात्मक रह गई है, तो वही वर्ग सत्ता के सामने असहज सवाल खड़े करने लगता है.
यह भी याद रखना चाहिए कि उच्च जातियों का यह राजनीतिक प्रमेय भाजपा पर तो काफी हद तक फिट बैठता है, लेकिन अन्य क्षेत्रीय दलों की वैचारिक प्रतिबद्धताओं के विपरीत जाता है. सपा और बसपा—दोनों ने जब-जब उच्च जातियों के साथ गठबंधन किया, उन्हें क्षणिक लाभ तो मिला, लेकिन पार्टी की आंतरिक बनावट कमजोर होती चली गई. बसपा के साथ ब्राह्मण गठबंधन हाथी को गणेश तो बना देता है, लेकिन दलित सशक्तीकरण पीछे छूट जाता है. सपा में माता प्रसाद पांडे को नेता विपक्ष चुने जाने के बाद इसका असर क्या होगा, यह अभी देखना बाकी है.
सवर्ण असंतोष के समानांतर बदलती सत्ता
इसलिए उत्तर प्रदेश की राजनीति की कहानी केवल सवर्ण असंतोष तक सीमित नहीं है. इसके समानांतर एक कहीं ज़्यादा गहरा और ऐतिहासिक बदलाव भी चल रहा है—पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों का राजनीतिक हस्तक्षेप और सशक्तीकरण.
मंडल आयोग के बाद सत्ता की सामाजिक बनावट में जो बदलाव शुरू हुआ, उसने राजनीति की दिशा ही बदल दी. 1993 का सपा–बसपा गठबंधन इस बदलाव का पहला बड़ा संकेत था, जिसने स्पष्ट कर दिया कि सत्ता अब पारंपरिक सवर्ण नेतृत्व की बपौती नहीं रहेगी. 2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी सरकार में यादव–ओबीसी प्रभुत्व और प्रशासनिक ढांचे में पिछड़ी जातियों की बढ़ती मौजूदगी ने इस बदलाव को और गहरा किया.
हाल के वर्षों में भाजपा ने भी गैर-यादव ओबीसी और दलित समूहों—निषाद, कुर्मी, कुशवाहा, जाटव, को संगठित कर सत्ता की बनावट को अपेक्षाकृत व्यापक बनाया है.
सम्मान की वापसी और सपा का वैचारिक द्वंद्व
इसी बदलते परिदृश्य में समाजवादी पार्टी के नेता विपक्ष माता प्रसाद पांडेय की “सम्मान की वापसी” वाली भाषा सामने आती है. यह बयान केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक तनाव की अभिव्यक्ति है. सम्मान यहां किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि सत्ता-साझेदारी, निर्णय-निर्माण और राजनीतिक दृश्यता का प्रश्न है.
सवाल यह है कि यह सम्मान किसका है और किस संदर्भ में लौटेगा? क्या यह उस दौर की स्मृति है, जब सत्ता पर पारंपरिक जातियों का नैतिक और वैचारिक नियंत्रण था, या फिर यह सभी सामाजिक समूहों के लिए बराबरी पर आधारित सम्मान की बात करता है?
इस बहस को और जटिल बनाता है समाजवादी पार्टी प्रमुख का रुख, जिसमें वे माता प्रसाद पांडेय की इस भाषा को वैधता देते दिखाई देते हैं. एक ओर सपा पीडीए पिछड़ा–दलित–अल्पसंख्यक के नारे के साथ सामाजिक लामबंदी में जुटी है, वहीं दूसरी ओर “सम्मान की वापसी” जैसे संकेत पार्टी के भीतर मौजूद वैचारिक द्वंद्व को उजागर करते हैं. यह विरोधाभास बताता है कि बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच सत्ता तक पहुँचने की रणनीति कितनी जटिल हो गई है.
आंकड़े क्या कह रहे हैं?
लोकनीति–सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वे के आँकड़े इस विमर्श को ठोस आधार देते हैं. सर्वे के मुताबिक सामान्य या अगड़ी जातियां, ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और वैश्य—अब भी बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ खड़ी हैं. इसके उलट पिछड़ी जातियां, अनुसूचित जातियाँ और मुस्लिम मतदाता ‘इंडिया’ गठबंधन को प्राथमिकता दे रहे हैं.
हिंदू लोअर ओबीसी जातियों में भाजपा और उसके सहयोगियों के वोट प्रतिशत में मामूली बदलाव है, लेकिन कांग्रेस को इस वर्ग में 3 प्रतिशत और उसके सहयोगी दलों को 2019 के मुकाबले 4 प्रतिशत का लाभ हुआ है. यह गैर-यादव ओबीसी आधार में धीरे-धीरे उभरती दरार का संकेत है.
दलित वोटों के आंकड़े और भी निर्णायक हैं. राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने 2019 के मुकाबले 3 प्रतिशत दलित समर्थन खोया है, जबकि उसकी सहयोगी पार्टियों ने 2 प्रतिशत समर्थन गंवाया है. कांग्रेस ने भी 1 प्रतिशत दलित समर्थन खोया है, लेकिन उसके सहयोगी दलों को फायदा हुआ है. खासकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी द्वारा दलित वोटों का जुटाया जाना बताता है कि दलित राजनीति अब केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से संतुष्ट नहीं है, बल्कि सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी चाहती है.
आर्थिक वर्गों के आधार पर मतदान व्यवहार तस्वीर को और जटिल बनाता है. 2024 के आम चुनावों में भले ही भाजपा अपने दम पर बहुमत से पीछे रह गई हो, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बड़े हिस्से ने अब भी भाजपा को वोट दिया. ग़रीबों में 37 प्रतिशत ने भाजपा और 21 प्रतिशत ने कांग्रेस को चुना. निम्न वर्ग में भाजपा को 35 प्रतिशत वोट मिले, जो कांग्रेस से 13 प्रतिशत अधिक हैं. यह दिखाता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाएँ अब भी गरीब और निम्न वर्ग के एक हिस्से को भाजपा से जोड़े हुए हैं, लेकिन यह समर्थन दलित और पिछड़े समुदायों में समान रूप से मज़बूत नहीं है.
निर्णायक टकराव की ओर उत्तर प्रदेश
इन सभी तथ्यों को साथ रखकर देखें तो ब्राह्मण–ठाकुर बैठकों की बेचैनी, “सम्मान की वापसी” की भाषा और PDA की आक्रामक राजनीति एक ही प्रक्रिया के अलग-अलग चेहरे हैं. यह प्रक्रिया सत्ता की सामाजिक बनावट में हो रहे बदलाव की है.
सवर्ण राजनीति अपने घटते प्रभाव को लेकर असहज है, जबकि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय बढ़ते राजनीतिक आत्मविश्वास के साथ सत्ता में स्थायी हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं. आगामी विधानसभा चुनाव इसी टकराव की निर्णायक परीक्षा होंगे.
यह चुनाव केवल भाजपा बनाम सपा या किसी गठबंधन का मुकाबला नहीं होगा. यह तय करेगा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति “सम्मान” को कैसे परिभाषित करती है—बराबरी और हिस्सेदारी के रूप में, या फिर पुराने वर्चस्व की स्मृतियों के सहारे.
लखनऊ की ठंड में उभरी यह सियासी गर्मी दरअसल उसी संघर्ष की आंच है, जिसमें सत्ता, समाज और इतिहास आमने–सामने खड़े हैं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति आज सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रही, बल्कि अपने भविष्य की वैचारिक दिशा तय कर रही है.
(डॉ. प्रांजल सिंह, दिल्ली यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)
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