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अरिंदम मुखर्जी द्वारा चित्रण
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हिन्दी सिनेमा हमारी लोकप्रिय संस्कृति में एक सबसे अमीर और चमकदार कारोबार है, यहाँ तक कि यह क्रिकेट से भी आगे निकल गया है। क्यों यह सबसे बुजदिल भी है, जो हो रहा है उसका साथ दे रहा है?

लंबे समय से हिन्दी सिनेमा की बुजदिल दशा मुझे हेमा मालिनी और संजीव कुमार अभिनीत  1972 की फिल्म सीता और गीता से आनंद बख्शी की पंक्ति की याद दिलाती है, जो कि कुछ यूं थी: हवा के साथ-साथ, घटा के संग-संग/ओ साथी चल। इसका सीधा सा अर्थ हैः बस हवा के साथ-साथ चलो।

स हफ्ते की शुरूआत में मैंने कहा था कि विधू विनोद चोपड़ा-राजकुमार हिरानी की फिल्म संजू में संजय दत्त को एक भोले-भाले शिकार (ज्यादातर असभ्य पत्रकारों के) के रूप में चित्रित करने में ईमानदार नहीं है। अब मैं एक बड़ा सवाल उठाता हूँ – भारत के सबसे बड़े, सबसे प्रतिभाशाली और सफल फिल्म निर्माता संस्थान को खुश करने के लिए इतना तत्पर क्यों रहते हैं? या, एक समय जब एक रॉबर्ट डी नीरो एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से “फ* ऑ* … ट्रम्प” कह सकते हैं, भारत के सबसे बड़े फिल्म निर्माताओं को राज ठाकरे को अनावश्यक रूप से शुक्रिया अदा करके एक नया उपक्रम क्यों शुरू करना है?

Shekhar Gupta, chairman and editor-in-chief of ThePrint

यह आदमी है कौन? उनकी सभी तरकीबों के बावजूद, वह 288 सीटों वाली अपने राज्य की विधानसभा में एक से ज्यादा सीट जीत नहीं सकते हैं और 227 सदस्यों वाले नगर निगम में केवल 7 सीटें। एक महत्वाकाँक्षी फिल्म को मुंबई के प्रसिद्ध देवता और हर काम की शुरूआत के देवता भगवान गणेश के बजाय राजठाकरे का अभिवादन क्यों करना पड़ता है? सीधा सा जवाब है। वह कुछ जीत तो नहीं सकते लेकिन बर्बाद बहुत कुछ कर सकते हैं। तो फिर पंगा क्यों लेना।

मुंबई सिनेमा (मैं बॉलीवुड को इसमें शामिल नहीं कर रहा हूँ) का अंडरग्राउंड और ओवरग्राउंड दोनों ही माफियाओं के साथ आंशिक रूप से सहजीवी और आंशिक रूप से पारस्परिक प्रशंसाओं का पुराना रिश्ता रहा है। बड़ी बात यह है कि सरकार सहित सभी प्राधिकरणों के समक्ष यह समान रूप से विनम्र और चापलूस है।

यह हमारे समाज का एक अजीब पहलू है कि हमारे रचनात्मक वर्ग प्रतिष्ठानवादी हो जाते हैं। अकादमिक, चित्रकारों और कुछ मीडिया के अनुभागों को छोड़कर, रचनात्मक और लोकप्रिय संस्कृति के अधिकांश नेता सत्ता, सरकार या माफियाओं पर पकड़ रखने वाले किसी भी व्यक्ति की चापलूसी करके खुश हैं। आप शास्त्रीय संगीतकारों और नर्तकियों को कुछ छूट दे सकते हैं क्योंकि उन शैलियों ने अभी तक ज्यादा पैसों का खेल नहीं खेला है। लेकिन सैकड़ों करोड़ की हर सप्ताहांत में ओपनिंग और कई-कई बिलियन डॉलर के स्टूडियो वाला हिन्दी सिनेमा इतना अपमानजनक व्यवहार क्यों करता है?

सका जन्म हमारी दरबारी संस्कृति में हुआ था। महाराजा, और तत्पश्चात सुल्तान तथा बादशाह, कला और संस्कृति के संरक्षक थे। अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ने और सम्मान तथा प्रसिद्धि हासिल करने के लिए आपको दरबारी संगीतकार, नर्तक या चित्रकार होना ज़रूरी था। राजसी गौरव ‘भारत सरकार’ में बदल गया लेकिन अदालत परंपरा बनी रही। सरकार ने आपको लुटियंस दिल्ली और पद्म पुरस्कारों में अनुदान, छात्रवृत्ति, विदेशी यात्राएं, आरामदायक नौकरी, प्रदर्शनियाँ और बंगले प्रदान किये। इसमें से रचनात्मक लोगों के दो समूह यानि की लेखक (विशेष रूप से कवि) और चित्रकार पहले ही अलग हो गए। पहला अपने वामपंथी उन्मुखीकरण के कारण और दूसरा इसलिए क्योंकि चित्रकारी एक अच्छा पैसा कमाने वाला व्यवसाय बन गया था।

वह जो सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली बन गया था, दुर्भाग्यवश सबसे आलसी बन गया। इसकी शुरुआती चिंगारी 83 वर्षीय वामपंथी गीतकार और कवि गुलज़ार, जो बचे हुए कुछ स्वाभिमानी व्यक्तियों में से एक हैं, की पीढ़ी के साथ भड़की। बचे हुए लोगों में से अधिकतम तलवे चाटने वाले दरबारी और दरबारी कवि बन गए। आज की पीढ़ी में, वास्तव में केवल कुछ शीर्ष सितारों ने ही प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति में जोखिम उठाया है। अमिताभ बच्चन तीन साल में रिटायर्ड हर्ट हो गए। दुबारा कभी सत्ताधारी व्यक्ति के खिलाफ गलती से भी टिप्पणी न करें। उन्हें ‘निर्भया’ और कुछ अन्य मुद्दों पर लोगों का समर्थन मिला था लेकिन यह तब हुआ था जब यूपीए सरकार पहले से ही क्षीण हो गई थी और घुटने टेक दिए थे। लेकिन हम जानते हैं कि हाल ही में कठुआ और उन्नाव पर वह कैसे मौन रहे। आप एक फिल्म में “सरकार” का किरदार निभा सकते हैं लेकिन असली सरकार से पंगा क्यों लेना। कुछ सम्माननीय अपवाद जैसे राज बब्बर, शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी, स्मृति ईरानी, यहाँ तक कि दिव्य स्पंदना बहादुरी से सामने आते हैं।

यदि आपके शीर्ष फिल्म निर्माता इतने पाखंडी न होते तो आप इतनी शिकायत नहीं करते। हिरानी ने 3 इडियट्स से लेकर पीके और मुन्ना भाई श्रृंखला तक मजबूत सामाजिक संदेश के साथ कई शानदार हिट फिल्में दी हैं। मिशन कश्मीर के साथ चोपड़ा ने हमें देशभक्ति सिखाई और हमने कृतज्ञता व्यक्त की क्योंकि उनके अच्छे कलाकारों ने उनके मूल राज्य में आईएसआई के घृणित मनसूबों को ध्वस्त कर दिया।

लेकिन जहाँ वे रहते हैं, उन्होंने उसी शहर में आईएसआई को आसानी से “बाहर” जाने दिया। भोले-भाले पीड़ित के रूप में संजू  आकर्षक रूप से एक त्रुटिपूर्ण मगर प्रतिभावान किरदार की तुलना में “आम जनता” के लिए एक बेहतर किरदार है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, दाऊद इब्राहिम, अनीस भाई (जिसे दत्त ने राइफल्स, ग्रेनेड और गोला बारूद प्राप्त करने के दिन कथित तौर पर छह बार कॉल की थी) और माफिया अभी भी जीवित हैं और करांची से अपने साम्राज्य को चलाते हैं। पंगा क्यों लेना?

शीर्ष सितारों के पास एक आसान बहाना होता है: उनका बहुत कुछ दांव पर लगा है। आमिर खान ने एक बार बोलने की “गलती” की और इसके पलटवार ने उन्हें चोट पहुँचाई। उनका सबसे बड़ा ब्रांड प्रायोजन का करार शर्मनाक रूप से समाप्त हो गया और इंडस्ट्री के शीर्ष लोगों ने उनके लिए आवाज नहीं उठाई। यहां तक कि शाहरुख खान भी आलोचनाओं के बाद से खामोश हैं। कई फिल्मों में मुस्लिम नामों के साथ प्रमुख पात्रों की भूमिका निभाकर शाहरुख ने कम से कम एक मूक बयान तो दिया है। दूसरी तरफ, सलमान ने एक अच्छा, सबके दिलों को जीतने वाले हिंदू का किरदार निभाने पर ध्यान केंद्रित किया है, यहाँ तक कि उन्होंने अपनी एक नवीनतम फिल्म में आईएसआईएस को भी ध्वस्त किया। आप देखिये संजू की तरह एक दोषी होने के कारण वह एक समस्या में पड़ गये।

पारंपरिक तर्क यह है कि यह लोकप्रिय संस्कृति हमारे समय की वास्तविकता को दर्शाती है। भारत में राजनीतिज्ञों या व्यापारियों की भी तुलना में सिनेमा को पहले ही इसकी भनक लग गई थी। लेकिन हिंदी सिनेमा ने हाल ही में ऐसा करना बंद कर दिया है। इसके दिमाग में एक चीज ने घर कर रखा है “फिल्मों की ओपनिंग”। इसमें विचारों की कमी रही है और जबकि इसने सामाजिक रूप से प्रासंगिक विषयों को उठाया है, अभिव्यक्ति हमेशा ही समाज को सन्देश देने का सबसे लोकप्रिय माध्यम है। मीडिया पहुँच खोने के डर की वजह से शिकायत नहीं करती है। यहाँ तक कि संजू की भी, मैं शिकायत नहीं कर रहा हूँ कि यह पत्रकारों को भद्दी “गाली” देती है।

मैं पूरी तरह समझता हूँ कि सिनेमा ने पत्रकारों का तिरस्कार किया है, वे पैसे से प्रमुख समाचार पत्र में स्थान और टीवी टाइम, अतिप्रशंसा और रिव्यू देने वालों से स्टार-रेटिंग आसानी से खरीद सकते हैं। मेरा सरल बिंदु यह था कि यह 1993 के बम विस्फोटों का इतिहास नहीं बदल पाएगा।

क्तिशाली फिल्मी दुनिया परिवर्तन का घटक हो सकती है और कमजोर वर्ग, वंचितों और अल्पसंख्यकों की रक्षा में मदद कर सकती है। ऐसा तब नहीं हो सकता जब यह किसी शक्तिशाली व्यक्ति, सरकार, राज ठाकरे की तरह दबंग, या दाऊद इब्राहिम जैसे व्यक्ति के सामने सहजता से झुक जाती है। वे सामाजिक पक्षपात और वर्गीकरण को भी चुनौती नहीं देंगे। वे शौचालयों पर एक फिल्म बना सकते हैं क्योंकि सरकार इसे पसंद करेगी, लेकिन लंबे समय से हिंदी सिनेमा के शीर्ष 10 सितारों में से किसी ने भी एक दलित, या एक परेशान किसान का किरदार नहीं निभाया है। दक्षिण भारतीय सुपरस्टार रजनीकांत ने गर्व और रुतबे के साथ ऐसा किया है।

याद करिए, यही फिल्म जगत भाइयों  के सामने औंधे मुँह गिरा था। वे विरोध प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री के पास नहीं गए। वे शांत हो गये। और बाद में, जब बॉम्बे पुलिस शूटर्स के एक छोटे से दल ने “मुठभेड़ों” में गैंगेस्टर्स को जेल में डालना शुरू किया, तो उन्होंने उनकी पूजा करनी शुरू कर दी।

मैंने इस दल के दो लोगों, सब-इंस्पेक्टर दया नायक और प्रदीप शर्मा, जिन्होंने लगभग 100 ‘वध’ किये थे, को अपने एनडीटीवी के शो ‘वाक द टॉक’ में बुलाया था। नायक ने कहानी सुनाई कि कैसे सर्वश्रेष्ठ सुपरस्टार ने अपने मूल गांव में पुलिसकर्मी की मां के नाम पर एक अस्पताल के निर्माण को वित्त पोषित किया। इसके बाद इसका उद्घाटन करने के लिए कर्नाटक के गाँव में जाकर उन्होंने बॉम्बे पुलिस के खास अधिकारी को चकित कर दिया। लेकिन जब उन्हीं पुलिस वालों को अदालतों की परेशानी झेलनी पड़ी, जिन्हें निलंबित कर दिया गया था और गिरफ्तार कर लिया गया था(बाद में बरी कर दिया गया), तो किसी ने भी उनकी मदद नहीं की। मारने के लिए अब उनके पास बंदूकें और लाइसेंस नहीं थे, इसलिए अब वे बेकार थे।

सौभाग्यवश अब कुछ नई आशाएं हैं। फिल्मी दुनिया के कई नये लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और उन शक्तियों पर सवाल उठाने से नहीं डरते हैं। हमें इस तथ्य का जश्न मनाना चाहिए कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है और वे अधिक सफल भी हो रहे हैं। वे अभी शीर्ष सितारे तो नहीं हुए हैं लेकिन इस रास्ते पर जरूर हैं। उनकी उपस्थिति शक्तिशाली रूप से बढ़ रही है। इस बीच बाकी शीर्ष सितारे, हवा के साथ बह सकते हैं, हवा के साथ-साथ, घटा के संग-संग …

Read in English : Bollywood’s Royals: Brave heroes on screen, spineless zeroes off it


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