बांग्लादेश की जुलाई क्रांति अब खुद को ही खा जाने वाली एक त्रासदी जैसी दिखने लगी है. जो आंदोलन भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ छात्रों की क्रांति के रूप में शुरू हुआ था, वही अब उन मूल आदर्शों को कमज़ोर कर रहा है जिन पर देश बना था.
2024 के छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस के हाथों अबू सैयद की मौत ने आंदोलन को और खूनी बना दिया था और हाल में इसी क्रांति से जुड़े एक और युवा नेता उस्मान हादी की हत्या ने हालात और बिगाड़ दिए—इससे मीडिया दफ्तरों और सांस्कृतिक केंद्रों पर हमले हुए, भारत-विरोधी गुस्सा भड़का और कश्मीर में आज़ादी की मांगें फिर उठीं.
ये मौतें जितनी दुखद हैं, आज के बांग्लादेश में क्रांति के गिरे हुए “हीरो” देवताओं की तरह पूजे जा रहे हैं. उनके इस्लामवादी एजेंडे—जो अब तक लोकतंत्र की लड़ाई के नाम पर छिपे थे—देश के युवाओं के बड़े हिस्से में स्वीकार किए जा रहे हैं. यह बेहद परेशान करने वाला है.
राजनीतिक रूप से भी सड़न साफ दिखने लगी है. नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (एनसीपी), जो छात्र आंदोलन से निकली थी, अब पूरी तरह कलंकित हो चुकी है. उस पर यौन उत्पीड़न, जबरन वसूली और बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी से चुनावी गठजोड़ के आरोप लगे हैं.
एक सपने की मौत?
28 दिसंबर को, शेख हसीना के खिलाफ छात्र आंदोलन की प्रमुख चेहरा रहीं और एनसीपी की पूर्व सदस्य नीला इसराफिल ने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि हसीना सही थीं और राजनीति “शुद्ध ज्यामिति” है. इसराफिल ने लिखा कि उनके आसपास के लोग सभी रज़ाकार हैं, या रज़ाकारों के बच्चे और पोते हैं.
इसराफिल ने लिखा, “नाम बदलते हैं, पार्टियां बदलती हैं, पीढ़ियां अपडेट होती हैं, लेकिन वेक्टर वही रहता है. सत्ता की कहानियां घूमती हैं, लेकिन धोखे की धुरी नहीं बदलती. इसलिए हां, यह गाली नहीं है, यह इतिहास की निरंतरता है, जिसे राजनीतिक ज्यामिति में कहा गया है.”
इसराफिल ने जुलाई में औपचारिक रूप से एनसीपी से इस्तीफा दिया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी में अपराधियों को सज़ा नहीं मिलती और खासकर लैंगिक उत्पीड़न के मामलों में चुप्पी साध ली जाती है.
उन्होंने पोस्ट में लिखा, “मैं भ्रष्ट राजनीति नहीं, नैतिकता चुन रही हूं. एनसीपी ऐसी पार्टी है जहां अपराधियों पर कार्रवाई नहीं होती, जहां किसी महिला के साथ उत्पीड़न होने के बाद भी अपराधी के पक्ष में चुप्पी रखी जाती है. मैं ऐसे स्थान पर एक पल भी नहीं रह सकती.”
अब पार्टी के करीब तीस संस्थापक सदस्यों ने चेतावनी दी है कि अगर एनसीपी ने जमात से हाथ मिलाया तो वे सामूहिक रूप से इस्तीफा दे देंगे.
27 दिसंबर को ढाका ट्रिब्यून ने रिपोर्ट किया, “पार्टी संयोजक को लिखे पत्र में सदस्यों ने जमात-ए-इस्लामी के राजनीतिक इतिहास का हवाला दिया, खासकर 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान उसकी आज़ादी-विरोधी भूमिका और नरसंहार में उसकी भागीदारी का. उन्होंने कहा कि यह बांग्लादेश की लोकतांत्रिक भावना और पार्टी के मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ है.”
पत्र में जमात और उसकी छात्र शाखा शिबिर की भी आलोचना की गई. आरोप लगाया गया कि जुलाई आंदोलन के बाद से वे “विभाजनकारी राजनीति, दूसरी पार्टियों के भीतर जासूसी, एनसीपी की महिला सदस्यों की चरित्र हत्या, और धर्म आधारित सामाजिक फासीवाद के बढ़ते खतरे” में शामिल रहे हैं.
रॉयटर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की कि एनसीपी ने जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन बना लिया है. रिपोर्ट में कहा गया, “पिछले साल के आंदोलन के बाद से नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) ने खुद को भाई-भतीजावाद और दो-दलीय दबदबे के विकल्प के रूप में पेश किया था, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वह सड़क की ताकत को वोट में बदलने में जूझ रही है.”
हालांकि, जमात के साथ आधिकारिक गठबंधन से पहले ही छात्र पार्टी की लोकप्रियता बांग्लादेश में गिर चुकी थी. 31 जुलाई को डेली स्टार में एचएम नजमुल ने लिखा, “अब यह विडंबना सार्वजनिक रूप से दिख रही है, जब बांग्लादेश के हालिया सरकार-विरोधी छात्र मंचों से जुड़े कई लोग—खासतौर पर एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट (एसएडी), बांग्लादेश गणतांत्रिक छात्र संसद (बीजीसीएस) और राजनीतिक मंच नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी)—जबरन वसूली, पहचान की नकल और सत्ता के आपराधिक दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं.”
जुलाई आंदोलन से निकली एकमात्र राजनीतिक पार्टी का बिखरना चिंताजनक है, लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि अबू सैयद और उस्मान हादी जैसे लोगों को देवताओं की तरह पूजना—एक ऐसे देश में जो आज कानूनहीनता, साम्प्रदायिक हिंसा और भारत-विरोधी भावनाओं से बंटा हुआ है.
झूठे हीरो की पूजा
16 जुलाई 2024 को, 23 साल का अबू सैयद उन गुस्साए छात्र प्रदर्शनकारियों में शामिल था, जिन्होंने रंगपुर की बेगम रोकेया यूनिवर्सिटी के सामने पुलिस से टक्कर ली थी. वह स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन आंदोलन का हिस्सा था, जो सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ शुरू हुआ था जिसमें स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए 30 प्रतिशत कोटा फिर से लागू किया गया था. बाद में यह आंदोलन शेख हसीना सरकार को हटाने की मांग तक पहुंच गया.
अबू सैयद दूसरे प्रदर्शनकारियों से आगे खड़ा हो गया और हाथ फैलाकर पुलिस को उसे गोली मारने की चुनौती दी. इसके बाद जो हुआ, उसके वीडियो कई मीडिया संस्थानों ने रिकॉर्ड किए. इन वीडियो में दिखा कि पुलिस ने उस पर रबर की गोलियां चलाईं, जिससे वह घायल हो गया.
जब सैयद ज़मीन पर गिरा, तो दूसरे प्रदर्शनकारी उसे तुरंत रंगपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए. वहां ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों ने उसे अस्पताल पहुंचते ही मृत घोषित कर दिया.
हाथ फैलाए हुए सैयद की तस्वीर ने हसीना की सख्त सत्ता के खिलाफ छात्र आंदोलन को और भड़का दिया. यह तस्वीर सीमा पार तक पहुंची और छात्रों, कलाकारों और मशहूर लोगों में गूंज पैदा हुई.
टॉलीवुड के संगीत निर्देशक इंद्रदीप दासगुप्ता ने कहा, “ज़िंदगी तुम्हें याद रखेगी, भाई. ताकत के साथ जिम्मेदारी आती है—एक सच्चाई जो आज अक्सर भुला दी जाती है. शर्म है आप पर, शासन व्यवस्था. बांग्लादेशी छात्र समुदाय के साथ पूरी एकजुटता.”
सैयद की मौत के एक महीने बाद, अपनी नई किताब Inshallah Bangladesh: The Story of an Unfinished Revolution के लिए रिसर्च करते हुए, मेरी मुलाकात एक अब रिटायर हो चुके वरिष्ठ खुफिया अधिकारी से हुई. उन्होंने कहा कि सैयद की फेसबुक पोस्ट से उसके भीतर गहरे मिशन की भावना दिखती थी.
अधिकारी ने कहा, “वह इस्लामी इतिहास, जिहाद और शहादत से ताकत लेता था. वह जमात-ए-इस्लामी के प्रचारक नेता मौलाना डेलवार हुसैन सईदी का प्रशंसक था, जो 1971 का दोषी युद्ध अपराधी था. 2013 में बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने सईदी को 20 में से आठ मामलों में दोषी पाया था, जिनमें हत्या, बलात्कार और धार्मिक उत्पीड़न शामिल थे.”
बांग्लादेशी राजनयिक मोहम्मद हारुन अल राशिद ने दिप्रिंट से कहा कि सैयद को इस्लामवादी मकसद के लिए गोली खाने की ट्रेनिंग दी गई थी.
राशिद ने कहा, “वह रातों-रात हीरो बन गया और पुलिस को चुनौती देते हुए, हाथ फैलाए उसकी तस्वीरों वाले पोस्टर हर जगह लगाए गए, लेकिन वह जमात द्वारा प्रशिक्षित जिहादी था. ऐसे और लोग हैं जिन्होंने एनसीपी में शरण ली है. इससे भी डरावना है उस्मान हादी का नया पंथ.”
बांग्लादेश में नैतिक पतन
12 दिसंबर को, छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा और राजनीतिक संगठन इंकिलाब मंचो का सह-संस्थापक शरीफ उस्मान बिन हादी, ढाका में मस्जिद से निकलते समय सिर में गोली लगने से घायल हो गया. ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने कहा कि हमला मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने किया. 18 दिसंबर को हादी को मृत घोषित कर दिया गया.
उसकी मौत के बाद, हादी के समर्थकों ने बांग्लादेश के दो बड़े अखबारों—प्रोथोम आलो और डेली स्टार के दफ्तरों वाली इमारतों में आग लगा दी, ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र छायानट में तोड़फोड़ की और भारत-विरोधी प्रदर्शनों में शामिल हुए.
बांग्लादेशी राजनीतिक कॉलमिस्ट एस.एम. फैयाज़ हुसैन ने कहा, “हादी की मौत का भारत से क्या लेना-देना है? उसके समर्थक कश्मीर में आज़ादी की मांग क्यों कर रहे हैं? भारत की आंतरिक राजनीति से बांग्लादेश का क्या संबंध है? अगर आपने हादी के उभार को ध्यान से देखा होता, तो जवाब होता—सब कुछ.”
हुसैन ने आगे कहा कि हादी एक जोशीला वक्ता था और ‘जनता के मुद्दों’ की बात करता था, लेकिन अंदर से वह “जमात समर्थित आवाज़ था, जिसने अराजकता, स्त्री-विरोध और साम्प्रदायिक नफरत को विचारधारा में बदल दिया.”
बांग्लादेशी-स्वीडिश राजनीतिक टिप्पणीकार प्रियंका आहलबर्ग के लिए, अबू सैयद और उस्मान हादी जैसे लोगों का महिमामंडन बांग्लादेशी समाज में गहरे नैतिक पतन को दिखाता है.
उन्होंने कहा, “जब आतंकवाद को हीरोइज़्म के रूप में पेश किया जाता है, तो इतिहास को क्रूरता को सही ठहराने के लिए दोबारा लिखा जाता है.”
2024 का बांग्लादेशी छात्र आंदोलन दुनिया के सामने एक ज़ेन ज़ी क्रांति के रूप में पेश किया गया था, जिसने अराजकता को चुनौती दी, लेकिन असल में इसने बांग्लादेश को 1947 के पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति की ओर वापस धकेल दिया, अल्पसंख्यकों की जान खतरे में डाल दी और सैयद व हादी जैसे लोगों को देवता बनाकर इस्लामवादियों को ताकत दे दी. शरिया कानून से चलने वाले देश की हमेशा वकालत करने वाली बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी इससे ज्यादा खुश नहीं हो सकती थी.
(दीप हालदार लेखक और पत्रकार हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह उनके निजी विचार हैं.)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: बांग्लादेश की राजनीति में तारीक रहमान का अंधेरा अतीत रहा है, पहले उन्हें अपनी छवि सुधारनी होगी
