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Saturday, 3 January, 2026
होममत-विमतहिंदुओं पर हमले, खालिदा की मौत और जमात—बांग्लादेश कई मोर्चों पर संकट से जूझ रहा है

हिंदुओं पर हमले, खालिदा की मौत और जमात—बांग्लादेश कई मोर्चों पर संकट से जूझ रहा है

जब सभी लोग नए साल का स्वागत कर रहे थे, तब बांग्लादेश में 50-वर्षीय एक हिंदू व्यक्ति को ज़िंदा जला दिया गया, दो हफ्तों में यह चौथा ऐसा हमला था. देश में फॉर-राइट के अपने संस्करण की पकड़ मजबूत होती जा रही है.

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नई दिल्ली: बांग्लादेश इस समय अपने ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ वाले दौर से गुज़र रहा है. सत्ता की लड़ाइयां रियल टाइम में लड़ी जा रही हैं और आने वाले चुनाव से पहले राजनीति ने अभी से रफ्तार पकड़ ली है.

दिसंबर भर बांग्लादेश और भारत के साथ उसके उतार-चढ़ाव भरे रिश्ते सुर्खियों में छाए रहे. फिर ‘बेगमों की जंग’—शेख हसीना और खालिदा ज़िया—पर पर्दा गिर गया. खालिदा का निधन हो गया और उनके बेटे तारिक रहमान ने कमान संभाल ली. इसके साथ ही हिंसा और अस्थिरता के बीच देश ने वंशवादी राजनीति के अपने इतिहास में एक नया पन्ना पलट दिया. यही वजह है कि बांग्लादेश दिप्रिंट का ‘न्यूज़मेकर ऑफ द वीक’ है.

अल्पसंख्यक और उनकी झलकती पीड़ा

जब हर कोई नए साल का जश्न मना रहा था, उसी वक्त बांग्लादेश में 50 साल के एक हिंदू व्यक्ति को आग के हवाले कर दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई—दो हफ्तों में यह चौथा ऐसा हमला था. यह देश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की कड़ी का ताज़ा मामला है, जहां हालात पहले से ही उबल रहे हैं. बांग्लादेशी राजनीतिक विश्लेषक शफकत रब्बी के शब्दों में, इन हमलों के पीछे कट्टरपंथ का बढ़ना और फॉर-राइट के उनके संस्करण की पकड़ मजबूत होना है.

रब्बी के मुताबिक, दक्षिण एशिया के सभी देशों में राजनीतिक हिंसा का इतिहास रहा है और राइट का उभार भी देखा गया है. कारणों पर बहस हो सकती है, लेकिन इसके नतीजे पर कोई शक नहीं है.

जो सिलसिला भारत-विरोधी प्रदर्शनों से शुरू हुआ था—एक प्रमुख स्वतंत्र नेता शरीफ उस्मान हादी पर हमले और बाद में उनकी मौत के बाद कूटनीतिक मिशनों के सामने—वह धीरे-धीरे पूरे देश में फैली भीड़ हिंसा में बदल गया. आरोप है कि हादी पर हमला करने वाले लोग भारत भाग गए थे.

कट्टरपंथ की आग में देश के दो बड़े मीडिया हाउस—द डेली स्टार और प्रोथोम आलो, भी झुलस गए. बंद दफ्तरों के भीतर आग लगी और कर्मचारी फंस गए. पत्रकारों ने इसे पिछले पांच दशकों में सबसे बड़ा हमला बताया. हादी की हत्या से गुस्साई भीड़ ने सांस्कृतिक केंद्रों पर भी हमला किया और अभिलेखागार नष्ट कर दिए.

‘डार्क प्रिंस’ की वापसी

इस सारे हंगामे के बीच, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष तारिक रहमान 25 दिसंबर को 17 साल के निर्वासन के बाद देश लौटे. मौजूदा अस्थिर हालात में रहमान की वापसी शायद सबसे ज्यादा गौर से देखी गई घटना रही. बांग्लादेश की राजनीति के ‘डार्क प्रिंस’ कहे जाने वाले रहमान बीएनपी के संभावित प्रधानमंत्री उम्मीदवार हैं. उनकी मां खालिदा जिया पाकिस्तान के प्रति अपने नरम रुख के लिए जानी जाती थीं, जो भारत की ओर झुकी रहीं शेख हसीना से अलग था.

2024 के छात्र-नेतृत्व वाले मॉनसून आंदोलन के बाद शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद, बीएनपी ने खुद को राइट के उभार और एक दशक के प्रतिबंध के बाद इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी की वापसी के बीच एक शांति-स्थापक के रूप में पेश किया है. हसीना के हाशिए पर जाने और उनकी पार्टी पर प्रतिबंध लगने के बाद, बीएनपी इस समय सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी हुई है. रहमान पार्टी की एक सुधारवादी छवि को आगे बढ़ा रहे हैं—जो बयानबाज़ी से ज़्यादा शांति का वादा करती है और बांग्लादेश को सबसे ऊपर रखती है.

वह पहले कह चुके हैं, “न दिल्ली, न पिंडी, बांग्लादेश सबसे पहले.” लौटने के बाद अपने भाषण में रहमान ने अपना चुनावी एजेंडा रखा—संप्रभुता और अल्पसंख्यकों, महिलाओं और आम नागरिकों की सुरक्षा. मार्टिन लूथर किंग जूनियर से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने समर्थकों की भीड़ से कहा, “मेरे पास एक योजना है.”

यह बदलाव अहम है, क्योंकि अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के तहत कई लोगों को बदलाव की उम्मीद थी, लेकिन राइट की ओर झुकाव की नहीं. हसीना के भारत निर्वासित होने के बाद, यूनुस सरकार ने अपनी रणनीतियों और कूटनीतिक समीकरणों में बदलाव किया. ढाका ने पाकिस्तान और चीन से नज़दीकियां बढ़ाईं, जबकि मुख्य सलाहकार ने भारत के पूर्वोत्तर पर अपनी बयानबाज़ी तेज की.

इसी राह पर चलते हुए, छात्र आंदोलन से निकली नई पार्टी नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (एनसीपी) ने कड़े बयान दिए, जिनमें दिल्ली के खिलाफ धमकियां और हादी की मौत के बदले पूर्वोत्तर से उग्रवादियों को शरण देने जैसे संदर्भ शामिल थे. बाद में इसी एनसीपी ने जमात के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन कर लिया, जिससे बड़े पैमाने पर इस्तीफे हुए—सिर्फ शीर्ष नेताओं के ही नहीं, बल्कि महिला सदस्यों के भी, जिन्होंने इस्लामी पार्टी से जुड़ने से इनकार कर दिया.

क्षेत्रीय दरारें अब खुलकर सामने हैं और भारत-बांग्लादेश रिश्ते एक बार फिर तेज़ी से बिगड़ते दिख रहे हैं. दोनों तरफ से राजनयिकों को तलब किया जा रहा है और वीज़ा बंद कर दिए गए हैं. रिश्तों में ठंडक और गहरी होती जा रही है.

हालांकि, खालिदा की मौत ने एक बदलाव का संकेत दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को एक लंबा शोक संदेश भेजा; विदेश मंत्री एस. जयशंकर उनसे मिलने ढाका गए. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी बांग्लादेश हाई कमीशन का दौरा किया. अगले महीने चुनाव की ओर बढ़ रहे बांग्लादेश में, जहां ज्यादातर वैश्विक और घरेलू सर्वे बीएनपी की जीत का अनुमान लगा रहे हैं, इन प्रतीकों को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव” की बार-बार अपील के बाद, भारत ने शायद एक व्यावहारिक रास्ता चुना है—अगली बार चुनी जाने वाली किसी भी सरकार से लोकतांत्रिक तरीके से संवाद करने का.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल सिर्फ कूटनीति का नहीं, घरेलू राजनीति का भी है. बांग्लादेश के इतिहास के बड़े हिस्से में पीढ़ियों ने दो वंशों—हसीना और ज़िया की प्रतिद्वंद्विता देखी है, जो 1991 से बारी-बारी सत्ता में आते रहे हैं. अब खालिदा जिया के निधन और हसीना के हाशिए पर जाने के बाद, देश एक बार फिर विरासत की राजनीति के नए दौर की ओर बढ़ता दिख रहा है, भले ही नाम कुछ और हो. अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि रहमान क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीति में कौन-सा रास्ता चुनते हैं.

(इस न्यूज़मेकर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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