Wednesday, 5 October, 2022
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अटल बिहारी वाजपेयी का लीडरशिप फार्मूला: बड़ा दिल व सुलझा नेतृत्व

अटल बिहारी वाजपेयी जी की 93वीं वर्षगांठ पर एक नज़र उन बातों पर जो उन्हें महान नेता बनाती है: इरादे मजबूत लेकिन दिल से कवि.

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अटल बिहारी वाजपेयी जी की 93वीं वर्षगांठ पर एक नज़र उन बातों पर जो उन्हें महान नेता बनाती है: इरादे मजबूत लेकिन दिल से कवि.

डॉ. मनमोहन सिंह की राजनीतिक कूवत और अधिकार में कमी तब से शुरू हुई जब उन्होंने अपने पाकिस्तानी समकक्ष के साथ शर्म-अल-शेख में संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए. यह कोई अचरज की बात नहीं थी कि उन्होंने वाजपेयी के नाम का सहारा लिया अपनी चाल प्रेरणा और वैधता के लिए.

यह आश्चर्यजनक है क्योंकि वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ तीन बार शांति स्थापना के बेहद गंभीर प्रयास किए, हरेक बार बुरी तरह भड़काए जाने के बावजूद, सीमा से आगे बढ़कर. हरेक बार उनको पाकिस्तानियों ने नीचा दिखाया. जनता ने हालांकि हर बार उनका समर्थन किया. यहां तक कि जयराम रमेश ने कहा था कि 2004 के प्रचार में निवर्तमान सत्ताधारी का सबसे बड़ा सफल मुद्दा हाइवे निर्माण और पाकिस्तान के साथ शांति ही था.

वाजपेयी का पहला कदम लाहौर की बस-यात्रा के साथ था. यह 18 वर्ष पहले हुआ था, हालांकि इतना अधिक समय भी नहीं गुज़रा कि उस कदम की आंतिरिक कहानी मैं बता सकूं, -जिसने दोनों ही तरफ के विदेश मंत्रियों को चौंका दिया था-, या किसी बातचीत का खुलासा कर दूं. हालांकि, उस दौरान भी घाटी में हमलों में कमी नहीं आयी थी, बल्कि जब वाजपेयी लाहौर में थे, तब भी एक बड़ा नरसंहार हुआ था.

हालांकि, फिर भी उन्होंने मीनार-ए-पाकिस्तान का दौरा किया और कहा कि एक स्थायी और समृद्ध पाकिस्तान ही भारत के हित में है. एक भाजपाई प्रधानमंत्री का यह बयान कितना अहम है, इसे पाकिस्तानी जानते थे. यह उतना ही ऐतिहासिक था जितना बाद में आडवाणी ने जिन्ना को एक आधुनिक नेता के तौर पर स्थापित करना. वाजपेयी को इस बयान पर कभी झुकना भी नहीं पड़ा, हालांकि शर्मनाक और राजनीतिक तौर पर लगभग संघातक यह खुलासा था कि मुशर्रफ के घुसपैठिए उसी वक्त कारगिल हथिया रहे थे जब वह लाहौर में शांति स्थापित कर रहे थे.

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यह इसलिए कि पाकिस्तान से शांति कभी भी उनके दिमाग में एक रणनीतिक, अल्पकालिक योजना थी ही नहीं. यह एक बड़ा औऱ शानदार विचार था. दरअसल, यह महान विचार पूरी तरह उनके स्टेट्समैन वाले मिजाज से मेल खाता था. जब वह मई 2004 में चुनावी बाजी हार गए, तो उनका सबसे बड़ा दुख यही था कि वह इसे एक तार्किक परिणति नहीं दे पायेंगे.

उन्होंने जुलाई 2001 के पहले सप्ताह में अपने विचार इतने तार्किक ढंग से रखे थे, कि वे मुझे आज भी याद हैं. मैं उनसे यह जानना चाहता था, समझना चाहता था कि उन्होंने पूरी तरह से अनपेक्षित और अव्याख्येय कदम क्यों उठाया और मुशर्रफ को आगरा वार्ता के लिए क्यों आमंत्रित किया. उस वक्त मुशर्रफ की वैधानिकता पर भी सवाल थे. कश्मीर में घुसपैठ चरम पर थी और भारतीय मानसिकता अब भी कंधार में आइसी-814 के अपहरण से जूझ रही थी. मई के अंतिम सप्ताह में जब वाजपेयी ने अपने वार्षिक समर रिट्रीट से मुशर्रफ को बुलावा भेजा, तो मुशर्रफ ने उनको पर्याप्त कारण दिए थे कि वाजपेयी अगर पूरी तरह निमंत्रण को खारिज न करें, तो भी धीमे तो चलें ही.

क्या यह मुशर्रफ को वार्ता के लिए आमंत्रित करने का सही समय था? मैंने पूछा कि इतने उकसावों के बावजूद, मूर्खतापूर्ण पूर्व-शर्तों के बाद भी, एक ऐसी प्रतिक्रिया के बावजूद जो इतना अपरिपक्व था कि इंदर कुमार गुजराल जैसे शाश्वत शांतिवादी ने भी कहा कि मुशर्रफ तो ऐसे बर्ताव कर रहे हैं, जैसे वह किसी पराजित देश में आ रहे हैं, अड़ने का क्या मतलब था?

वाजपेयी ने कहा, ‘देखिए, अगर भारत और पाकिस्तान के नेता शांति के लिए सही मुहूर्त का इंतजार करेंगे तो शायद वह कभी यह मौका न पाएं’.

हालांकि, मैं उनकी टाइमिंग पर सवाल पूछता रहाः अभी ही क्यों? यह कोई मानसिक तरंग थी या प्रेरणा, अंतरराष्ट्रीय दबाव, मुशर्रफ के साथ वार्ता के लिए इतनी मांगों को क्यों मान लेना जरूरी था?

इसके बाद वाजपेयी का बहुचर्चित लंबा मौन आया, जिसके दो ही अर्थ होते थे. या तो वह जवाब नहीं देना चाहते, या फिर वह सोच रहे हैं. मैंने उनको बीच में ही न टोकने की ट्रिक जान ली थी. मुझे इसका पुरस्कार भी मिला.

वाजपेयी बोले, ‘ईमानदारी से कहूं तो मेरे मन में भी दूसरे विचार आए. हालांकि, देखिए लखनऊ में एक सक्सेना परिवार है, जिनका एक बेटा मेजर था और कश्मीर में लड़ते हुए शहीद हुआ. (हमारे रक्षा संपादक मनु पुब्बी बताते हैं कि 8 सिख रेजिमेंट के मेजर अंशु सक्सेना की लश्कर आतंकियों से मुठभेड़ में 25 जून को मौत हो गयी थी और उनको मरणोपरांत सेना का मेडल मिला था) चूंकि लखनऊ मेरा संसदीय क्षेत्र है, तो मैंने संवेदना प्रकट करने के लिए उनके पिता को फोन लगाया. और आप जानते हैं? उनके पिता रो नहीं रहे थे, टूटे नहीं थे.


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वह ठंडे दिमाग से बोल रहे थे, दृढ़ थे. उन्होंने कहा कि केवल एक ही बेटा क्यों वे तो देश के लिए अपनी और संतानों को भी कुर्बान कर सकते हैं. उस समय मैंने सोचा कि उनका घाव अभी ताज़ा है. कुछ दिनों में वह और उनका परिवार बेटे की अनुपस्थिति को महसूस करेगा, उनके नुकसान की भयावहता समझेगा.

वे शिकायत नहीं करेंगे, क्योंकि हमारे साधारण लोग इसी तरह देशभक्त हैं. हालांकि, यह कब तक चलेगा? दोनों ही तरफ कितने परिवारों को यह दारुण दुख इतने दशकों में झेलना पड़ा? और कितनी पीढ़ियों को इसके साथ रहना पड़ेगा.. इसीलिए, मैने सोचा. सारी क्षुद्रताओं को भूलें, हमारी पीढ़ी के नेताओं पर भविष्य का यह कर्ज है कि इसे ईमानदारी से निबटा डालें’.

आगरा में मुशर्रफ से उनकी निराशा गंभीर थी. वह मुशर्फ की अपरिपक्वता और उतावलेपन से उतने ही हैरान थे, जितना मुशर्रफ उनकी गंभीरता से. उसके बाद, वह क्रोध से भरे हुए थे, जब संसद पर हमला हुआ. उस हमले के बस दो सप्ताह बाद हमारी सेनाओं का अभूतपूर्व जमावड़ा हो रहा था, तब मेरी उनसे फिर एक बार बात हुई थी, जिसे मैं बड़ी शिद्दत से याद करता हूं और अब साझा कर सकता हूं.

दिसंबर की उस ढलती दोपहर मैं सुहानी धूप में उनके बगीचे में बातचीत करने का मौका मिला, नमक से भरे शाकाहारी सूप के साथ. अब तक मैं जान चुका था कि उन्हें बातचीत का अनौपचारिक यहां तक कि हल्का-फुल्का रवैया पसंद है, बनिस्बत उन सीधे सवालों के जिस पर वह कई बार लंबे मौन में चले जाते थे जिसे आपको ही आपके अगले सवाल से तोड़ना होता था. इसीलिए, मैंने उनसे कहा कि मैं तो बस उनसे पूछने आया था कि क्या मुझे परिवार के साथ लंबे समय से नियत केरल-प्रवास पर जाना चाहिए, क्योंकि अगर बीच में युद्ध शुरू हुआ और हवाई अड्डे बंद हो गए तो क्या मुझे अपने न्यूज़रूम से इतनी दूर फंसने के लिए जाना चाहिए.

‘यह भी कोई छुट्टी पर जाने का समय है?’- उन्होंने मुझसे पूछा.

तो, युद्ध की संभावना वास्तविक है? मैंने उनसे पूछा.

वह फिर से एक लंबे-लंबे मौन में चले गए. मैंने इंतज़ार किया.

उन्होंने पूरी तरह सूप पर ध्यान केंद्रित रखते हुए कहा, ‘हरेक व्यक्ति युद्ध चाहता है. सैन्यबल खासे गुस्से में है, लेकिन एक समस्या है. आप यह तो तय कर सकते हैं कि युद्ध कब शुरू हो, लेकिन एक बार शुरू हो जाने के बाद कोई नहीं जानता कि यह कब बंद होगा, कैसे बंद होगा. यह फैसला नेताओं को लेना होता है’.

एक बार फिर, किसी क्रोधित भारतीय की जगह यह एक स्टेट्समैन की वाणी थी. लगभग 16 महीनों तक सीमा पर तनातनी और समानांतर राजनय (डिप्लोमैसी) के बाद वाजपेयी ने फिर से नाटकीय मोड़ ले लिया. (इस दौरान एनडीटीवी के ‘वॉक द टॉक’ में ब्रजेश मिश्र ने मुझे बताया था कि लगभग दो मौकों पर संपूर्ण युद्ध भड़क ही चुका था)

वाजपेयी ने श्रीनगर में अप्रैल 2003 में भाषण देते हुए एक बार फिर अपने कश्मीरियों के साथ पाकिस्तान को भी एकतरफा शांति प्रस्ताव दिया और इसका परिणाम जनवरी 2004 में मुशर्रफ के साथ वार्ता के बाद इस्लामाबाद घोषणापत्र के तौर पर निकला.

मैंने फिर से उनसे पूछा कि वह इसका क्या तर्क देते हैं. मैं जानता था कि उन्होंने इस पर अपने प्रमुख कैबिनेट सहयोगियों से भी बातचीत नहीं की है. यह एक स्वतःस्फूर्त राजनीतिक फैसला था जिस पर ब्रजेश मिश्र भी आश्चर्यचकित थे. वाजपेयी ने बाद में कबूल किया कि यह इतना तेज़ फैसला था, कि बाद में वह खुद भी चौंक गए कि एक क्षण में उन्होंने फैसला कर लिया. वह क्षण क्या था?

उन्होंने कहा कि जब उन्होंने श्रीनगर की रैली में बोलते हुए कश्मीरियों की आंखों में देखा, ‘कोई भी ऐसा नहीं दिखा, जो हमसे युद्ध चाहता हो. वे सभी शांति चाहनेवाले दिखे, सामान्य हालात लौटाने की चाह रखनेवाले. इसीलिए, मैं एक और कदम चला. बिना किसी सलाह या अधिक विचार किए’.

राजनीति के ‘वाजपेयी’ ब्रांड से यह सीखने की जरूरत है- स्वतःस्फूर्ति और विशाल हृदय होना, जब हम उनके 93 वीं वर्षगांठ पर उनको याद कर रहे हैं और क्रूर नियति ने उनको मौन जीवन पर विवश कर रखा है.

(यह लेख 26 दिसंबर 2017 में प्रकाशित किया जा चुका है.)


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