युद्ध अगर दूसरे साधनों के बूते सियासत को आगे बढ़ाने का जरिया मानें तो यह राजनीतिक-सैन्य तालमेल की निर्णायक भूमिका को रेखांकित करता है. इसके साथ ही यह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रभावी रणनीतिक निर्णय प्रक्रिया को मजबूती देता है. ये सिद्धांत लागू रहें इसके लिए जरूरी है कि समकालीन चुनौतियों से स्पष्ट रूप से जुड़े रहें. ये चुनौतियां ‘ग्रे जोन’ (गैर-पारंपरिक) युद्ध, साइबर खतरों, और मिश्रित चालों के रूप में हैं. इस तरह ये उनकी प्रासंगिकता और दिशानिर्देशक रणनीतिक सोच को मजबूत करती हैं. यह संबंध इस समझ को मजबूत करता है कि इतिहास के सबक चालू नीतियों और ऑपरेशन संबंधी नजरिए को किस तरह स्वरूप प्रदान करते हैं.
भारत में रणनीतिक फैसले राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) से सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी (सीसीएस) को प्रेषित होते हैं और इस तरह एक राजनीतिक-सैन्य निर्देश के रूप में चीफ़्स ऑफ स्टाफ कमिटी (सीओएससी) को मिलते हैं. संयुक्त फैसले कारगर तरीके से लागू हों इसके लिए जरूरी है कि प्रोटोकॉल और संवाद के माध्यम स्पष्ट हों ताकि राजनीतिक लक्ष्य सैन्य रणनीति और ऑपरेशन की योजनाओं में सीधे समाहित हो जाएं. इन प्रक्रियाओं को ‘ग्रे ज़ोन’ जैसी सामरिक चालों के रूप में उभरते खतरों के अनुरूप स्वरूप प्रदान करने के उपाय भी अपनाए जाएं ताकि नेतृत्व उनकी प्रासंगिकता और फिर से मजबूत हो जाने की क्षमता को लेकर आश्वस्त हो सके.
इसके बाद निर्देश को इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के मुख्यालय और संबंधित सेनाओं के मुख्यालयों में ऐसा रूप दिया जाता है कि वह हासिल किए जाने योग्य सैन्य लक्ष्यों में तब्दील हो जाए. यह प्रक्रिया खतरों को अहमियत देती है, संसाधन आवंटित करती है, समयसीमाएं तय करती है. राजनीतिक नेतृत्व ‘क्यों’ और ‘क्या’ का जवाब उपलब्ध कराता है, सैन्य नेतृत्व ‘कैसे’ को परिभाषित करता है. ‘सीओएससी’ की बैठकों की अध्यक्षता करने वाले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के तहत संयुक्त कमान का मकसद इन दायरों में समरसता बनाना होता है. भारत में, जैसा कि कई मामलों में देखा गया है, राजनीतिक-सैन्य निर्देश लिखित रूप में नहीं बल्कि मौखिक या गुप्त संदेश के रूप में दिया जाता है.
प्रभावी निर्देश स्पष्टता की मांग करते हैं. जब निर्देश सलाह जैसे होते हैं और आपसी भरोसे से तय होते हैं तब वे दावेदारों में आत्मविश्वास पैदा करते हैं, राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को अपने साझा मकसद में के लिए आश्वस्त करते हैं, जो कि रणनीतिक सामंजस्य के लिए महत्वपूर्ण होता है.
निर्देश कैसे बनेंगे लक्ष्य
राजनीतिक मिलते ही ‘सीओएससी’ उसे अलग-अलग थिएटर के लक्ष्यों में बदल देता है. ऐसा वह खुफिया आकलनों, साजोसामान, इलाके के स्वरूप, और जोखिम का हिसाब रखते हुए करता है. इसके बाद तीनों सेनाओं के मुख्यालय निर्देश के अनुरूप ऑपरेशन की योजना बनाते हैं. योजना लागू होने लायक हो यह मुख्य बात होती है; लक्ष्य पहुंच से दूर न हो इससे बचने के लिए उनका स्पष्ट होना, मापे जाने लायक होना, और पर्याप्त संसाधन से लैस होना जरूरी है. आकस्मिक योजना कमांड के हर स्तर के साथ जुड़ी होती है.
पुराने अनुभव निर्णायक भूमिका निभाते हैं. पिछले ऑपरेशनों से मिले सबक को योजना प्रक्रिया, पूर्वाभ्यासों आदि में समाहित किया जाता है ताकि संयुक्त तालमेल, और तेज तैनाती की जा सके. ‘सीओएससी’ और राजनीतिक प्रमुखों के बीच फीडबैक जरूरी है और यह सफलता दिलाता है. रणनीतिक निर्देश स्थिर नहीं रहते, वे जमीनी स्थितियों के मुताबिक बदलते रहते हैं.
1967 की झड़पों और 1971 के युद्ध के सबक
ले. जनरल सगत सिंह के साहस से एक बेहद महत्वपूर्ण सबक उभरता है. नाथु ला और चो ला में 1967 में जो झड़पें हुई थीं उनमें सिंह ने चीनी हमले का मुक़ाबला किया था. यह हमला तब किया गया था जब भारतीय सैनिक बाड़ लगा रहे थे और ऊपर से निर्देश न मिलने के बावजूद अग्रिम मोर्चे पर तैनात होकर घुसपैठ की कोशिशों को रोक रहे थे. उस हमले में कई भारतीय सैनिक मारे गए थे.
1971 में उन्हें पूर्वी कमांड के लक्ष्यों को हासिल करने का कम सौंपा गया था और वे सावधानी के लिए बिना रुके सीधे ढाका की ओर चल पड़े थे और उन्होंने मुहिम को तेजी से अंजाम तक पहुंचाया था. युद्धक्षेत्र के आकलन पर आधारित और ऑपरेशन की स्पष्टता के साथ उठाए गए उनके कदम बताते हैं कि व्यापक राजनीतिक इरादे के मद्देनजर सेना को सोची-समझी आज़ादी मिले तो नतीजे निर्णायक स्वरूप ले लेते हैं.
1971 का युद्ध प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सेना अध्यक्ष सैम मानेकशॉ के नेतृत्व में राजनीतिक-सैन्य तालमेल का आदर्श प्रस्तुत करता है. राजनीतिक स्पष्टता और सैन्य तैयारी ने साथ मिलकर काम किया.
1971 में, इंदिरा गांधी ने यह तय कर दिया था कि सैन्य ऑपरेशन के लिए उनकी मंजूरी जरूरी नहीं थी; केवल उन्हें उनके बारे में सूचना दी जानी चाहिए. वे अपना सामान्य कामकाज कर रही थीं, यहां तक कि संसदीय कमिटी की बैठकों में भी शामिल हो रही थीं. इन्हीं बैठकों के दौरान उनके किसी सहायक ने उन्हें एक नोट दियाया था जिसमें लिखा था कि छंब पर कब्जा हो गया है. उन्होंने बिना कोई प्रतिक्रिया किए उसे मोड़कर अपने बैग में रख लिया था. 1971 का युद्ध इस बात की एक मिसाल है कि राजनीतिक नेतृत्व ने किस तरह स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य तय कर दिए थे और बाकी काम सेना पर छोड़ दिया था. पहले दिन भारतीय वायुसेना को 20 जेट विमानों को गंवाने पड़े थे लेकिन उसने बिना विचलित हुए अपनी सुपर आक्रामकता और दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाने के तेवर बनाए रखे.
राजनीतिक कूटनीति ने सैन्य तैयारी में मदद की. इंदिरा गांधी ने विश्व जनमत को अपने पक्ष में किया, भारत-सोवियत संघ संधि के जरिए रणनीतिक मजबूती बनाई और संसदीय पारदर्शिता बनाए रखी. मानेकशॉ की स्पष्ट सलाह ने समय से पहले सैन्य कार्रवाई को रोका. इस सबका सीधा सबक यह है की राजनीतिक सत्ता और सैन्य नेतृत्व पर भरोसा के साथ सैन्य तैयारी और कार्रवाई के समय की पहचान रणनीतिक सफलता को सुनिश्चित करती है.
1999 के करगिल युद्ध के सबक
करगिल युद्ध ने खुफिया तंत्र की खामियों को और परवेज़ मुशर्रफ की दोरंगी चाल को उजागर किया था, जबकि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज़ शरीफ सुलह की मिसाल पेश कर रहे थे. वाजपेयी ने 7 जून को एक निर्देश जारी किया था कि घुसपैठियों को भगाने के लिए सीमित ऑपरेशन किया जाए लेकिन एलओसी का उल्लंघन न किया जाए. यह निर्देश सेना को नियंत्रित करता था लेकिन होशियारी भरा था. इसने भारत की वैश्विक साख को मजबूत किया और पाकिस्तान को आक्रमणकर्ता के रूप में स्थापित कर दिया.
बाहरी दबाव, खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दबाव ने पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर किया. मोर्चे पर वायुसेना और थलसेना के बीच तालमेल ने सेना के जूनियर नेतृत्व की सामरिक उत्कृष्टता की मिसाल पेश की. इस युद्ध ने निगरानी तंत्र की कमजोरियों को भी उजागर किया, जिन्हें बाद में बेहतर और निरंतर खुफिया कार्रवाई और दुश्मन में खौफ पैदा करने के सक्रिय उपायों के जरिए सैद्धांतिक विकास के बूते दूर किया गया .
रणनीतिक मकसद के साथ सैन्य ऑपरेशन को नियंत्रित किया जाए तो दीर्घकालिक लाभ हासिल होते हैं. बाद में उरी और बालाकोट समेत दूसरे मौकों पर जो नियंत्रित ऑपरेशन किए गए वे इस सैद्धांतिक विकास को उजागर करते हैं. ऑपरेशन सिंदूर ने इस बात को रेखांकित किया कि राजनीतिक-सैन्य तालमेल किस तरह युद्ध को नियंत्रित करने की ताकत के साथ-साथ दुश्मन में खौफ पैदा करने की ताकत भी बढ़ाता है.
‘ग्रे जोन’ युद्ध की चुनौतियां
आज सुरक्षा को लेकर जो चुनौतियां हैं वे शांति और खुले युद्ध के बीच के अस्पष्ट क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा केंद्रित होती जा रही हैं. सीमा पर छोटी-मोटी घुसपैठ, जमीन पर दावेदारियों में वृद्धि, सूचना युद्ध और छद्म युद्ध जैसी चालें ऐसे जवाब की मांग करती हैं जिनमें सैन्य तैयारी के साथ कूटनीतिक और आर्थिक उपायों का मेल भी हो.
भारत को 2020 के बाद से पूर्वी लद्दाख के डेप्संग और डेमचोक जैसे इलाकों में निरंतर संघर्ष का सामना करना पड़ा है. इसके अलावा चीनी सेना पीएलए रडार स्थापित करने के साथ-साथ सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत भी करती रही है. इस सबका जवाब देने के लिए इलाके के बारे में सजगता, सीमा पर गश्ती की मजबूत व्यवस्था, दौलत बेग ओल्डी रोड जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास, और चीन के साथ निरंतर कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं. ‘ग्रे ज़ोन’ कौशल की मांग करता है: सेना की तेज तैनाती, सटीक सिग्नलिंग, और जवाबी आर्थिक उपायों की मांग करता है, जो युद्ध में तेजी लाए बिना दुश्मन को दहशत में डालें.
लद्दाख में 2020 में परीक्षा
मई 2020 में पीएलए ने पूर्वी लद्दाख में कई स्थानों पर घुसपैठ शुरू की और पैंगोंग त्सो, गलवान, गोगरा, और डेप्संग को निशाना बनाया. भारत ने बराबरी की तैनाती और साहसिक जवाबी कार्रवाई की, कैलास पर्वत के सामरिक महत्व की चोटियों पर कब्जा जमाया. गलवान में 15 जून को हुई मुठभेड़ में 20 भारतीय सैनिक मारे गए. इसके बाद सेना की तैनाती बढ़ाई गई और इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में तेजी लाई गई.
राजनीतिक-सैन्य तालमेल का इम्तिहान लिया गया लेकिन वह मजबूत बना रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तनाव कम करने के साथ-साथ दृढ़ता पर ज़ोर दिया, जबकि ‘सीडीएस’ बिपिन रावत ने सैन्य तैयारी बनाए रखी. दोनों तरफ निरंतर तैनाती के साथ-साथ वार्ता के 17 दौर चले.
ऐसी स्थितियां बन सकती हैं, इसका पूर्वानुमान किया जाना चाहिए था और ऑपरेशन के स्तर पर युद्ध की तैयारी की जानी चाहिए थी और राजनीतिक माहौल गरमाने से पहले आंतरिक बातचीत की जानी चाहिए थी. इसलिए आश्चर्य की बात यह है कि उच्च अधिकारियों को सूचित करते हुए इस सामरिक स्थिति से उपयुक्त सैनिक स्तर पर नहीं निबटा गया. एक उग्र सैन्य स्थिति को राजनीतिक सत्ता के पाले में डालना एक असामान्य कदम था. ‘चाइना स्टडी ग्रुप’ का काम उग्र स्थितियों में सैन्य ऑपरेशन के लिए निर्देश देना नहीं है बल्कि राजनीतिक-कूटनीतिक और सैन्य दिशानिर्देश देना है.
इस केस से यह गहरा सवाल उभरता है: दबाव वाली स्थितियों में दूसरी तरफ ताकने की प्रवृत्ति क्यों उभर जाया करती है, जबकि युद्ध की तैयारी पहले से चल रही होती है? स्पष्ट अधिकार क्षेत्रों में पेशेगत आत्मविश्वास जरूरी है. जो जायज रूप से सेना की ज़िम्मेदारी के दायरे में आते हैं उनके बारे में फैसले करने का बोझ राजनीतिक नेतृत्व पर नहीं डाला जाना चाहिए.
बहरहाल, 30 अगस्त 2020 को हालात सैन्य लिहाज से बेशक ‘उत्तेजनापूर्ण’ थे—हालांकि तत्कालीन ‘सीओएएस’ एम.एम. नरवणे ने अपनी अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में इसे ‘जटिल’ बताया है—और जरूरत सिर्फ मोर्चे पर सेना को सीधा आदेश देने की थी, कुछ इस तरह का आदेश देने की कि ‘सामने जाकर मुक़ाबला करो; वे गोली चलाएं तो उन्हें नष्ट करने को तैयार रहो’.
पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि राजनीतिक नेतृत्व ने 1971 की तरह 2020 में भी सही राजनीतिक निर्देश जारी किया, और रक्षा मंत्री ने सेना अध्यक्ष को सलाह दी कि “जो उचित समझो वो करो”.
शाश्वत सिद्धांत
तालमेल और स्वायत्तता राजनीतिक-सैन्य नेतृत्व का आधार है. राजनेता राष्ट्रीय लक्ष्य तय करते हैं; सेना उन्हें हासिल करने के तरीके और कार्रवाई की दिशा तय करती है. 1971 के युद्ध, करगिल युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर, और लद्दाख में आमना-सामना तैयारियों, स्पष्टता, भरोसे, और मांग के मुताबिक कार्रवाई की जरूरत को रेखांकित करते हैं.
भारत में सेना के थिएटरीकरण का लक्ष्य संयुक्त कार्रवाई और ऑपरेशन्स में सामंजस्य को मजबूत करना है. फिर भी, केवल ढांचागत सुधार काफी नहीं है. 21वीं सदी में सुरक्षा का जो माहौल है उसके मद्देनजर औपचारिक रूप से निर्धारित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अभाव एक महत्वपूर्ण कमजोरी है.
रणनीतिक निर्णय केवल प्रक्रिया के पालन की मांग नहीं करता. इसके लिए हर क्षेत्र के भीतर आत्मविश्वास, इरादे की स्पष्टता, संस्थागत स्मृति, और राष्ट्रीय उद्देश्य की साझा समझ जरूरी है. सिविल और सैन्य नेतृत्व को राजकाज में सैन्य क्षमता को समाहित करने की इस गतिशील और बारीक कला को अपनाने की जरूरत है. तभी भारत बहुआयामी संघर्ष के बदलते दबावों और शक्ति संतुलन की भारी होड़ के इस माहौल में अपनी संप्रभुता की रक्षा कर पाएगा.
लेफ्टिनेंट जनरल एके सिंह PVSM, AVSM, SM, VSM (रिटायर्ड) @AK7CAV पर ट्वीट करते हैं और लेफ्टिनेंट कर्नल मनोज के चन्नन (रिटायर्ड) @manojchannan पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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