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Tuesday, 23 April, 2024
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क्या मुफ्त सुविधा देने के चुनावी वादे से मतदाता प्रभावित होते हैं

चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा अपने-अपने घोषणा पत्रों में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिये मुफ्त में सुविधायें देने या रेवड़िया बांटने का प्रलोभन देने की प्रवृत्ति से उच्चतम न्यायालय भी सहमत नहीं है.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिले प्रचण्ड बहुमत के बाद से ही राजनीतिक हलकों में यह चर्चा हो रही है कि मुफ्त बिजली, पानी और बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा जैसी सुविधाओं को आगे भी जानी रखने के वायदे की वजह से यह नतीजे आये हैं.

यह सही है कि कोई भी सरकार अपने प्रदेश की जनता के कल्याण के लिये सभी उचित कदम उठाने और निर्णय लेेने के लिये स्वतंत्र है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता हासिल करने के लिये मतदाताओं को मुफ्त सुविधायें प्रदान करने का वायदा या प्रलोभन दिया जा सकता है? क्या ऐसा करना लोकतांत्रिक शुचिता के अनुरूप है?

चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा अपने-अपने घोषणा पत्रों में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिये मुफ्त में सुविधायें देने या रेवड़िया बांटने का प्रलोभन देने की प्रवृत्ति से उच्चतम न्यायालय भी सहमत नहीं है.

उच्चतम न्यायालय का मानना है कि राजनीतिक दलों को चुनाव के दौरान अपने घोषणा पत्रों में मुफ्त में रेवडियां बांटने का प्रलोभन मतदाताओं को नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद ही कमजोर होती है.
शीर्ष अदालत ने करीब सात साल पहले 2013 में अपने एक फैसले में कहा था कि हालांकि चुनाव घोषणा पत्रों मे किये गये वायदे जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ नहीं होते हैं. परंतु इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बड़े पैमाने पर मुफ्त मे रेवडियां बांटने के वायदे समाज के सभी लोगों को प्रभावित करते हैं. इस तरह की गतिविधियां बड़े पैमाने पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ो को हिला देती हैं.

न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई दोनों ही बाद में देश के प्रधान न्यायाधीश बने. उन्होंने पांच जुलाई 2013 को अपने फैसले निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया था कि आदर्श आचार संहिता में अलग से एक शीर्षक के तहत राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों के बारे में प्रावधान करे.

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यही नहीं, न्यायालय ने तो मुफ्त में रेवड़ियां बांटने के वायदे की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुये देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल राजनीतिक दलों शासित करने के संबंध में अलग से कानून बनाने का भी सुझाव दिया था.

शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु विधानसभा के मई 2006 के चुनावों में विजयी हुई द्रमुक के सत्ता में आने के बाद इन वायदों को इन वायदों पर अमल करने के लिये बनायी गयी योजनाओं के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अपने फैसले में ये टिप्पणियां की थी.


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संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है और वह इसके लिये लगातार सरकार और राजनीतिक दलों को आदेश और निर्देश देता रहता है.

निर्वाचन आयोग जानता है कि सरकार की कीमत पर इस तरह से मुफ्त रेवडियां देने के वायदों से निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया प्रभावित होती है और इसीलिए उसने भी इस संबंध में न्यायालय के निर्देशों या निर्णय को लागू करने के प्रति इच्छा व्यक्त की थी.

आयोग ऐसा कोई आदेश या निर्देश नहीं दे सकता जो कानून के दायरे में नहीं हो. मुफ्त रेवडियां बांटने के वायदे पर अंकुश लगाने के बारे में चूंकि कोई कानून नहीं है. इसलिए राजनीकि दल एक सीमा तक पानी, बिजली मुफ्त देने के अलावा स्मार्ट फोन, मिक्सर, कुपोषित बच्चों के लिये हर महीने एक किलो देसी धी और दूध का पाउडर, मुफ्त खाद्यान्न, पे्रशर कुकर और लैपटाप से लेकर रंगीन टेलीविजन देने जैसे वायदे करने में संकोच नहीं करते हैं.

शीर्ष अदालत के संज्ञान में यह तथ्य भी था कि चुनावी घोषणा पत्रों के मसौदे को प्रत्यक्ष रूप में शासित करने वाला कोई कानून नहीं है, इसीलिये उसने चुनाव के दौरान मुफ्त में रेवड़ियां बांटने के वायदा करने की राजनीतिक दलों में बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिये निर्वाचन आयोग को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ परामर्श करके इस बारे में दिशानिर्देश बनाने का निर्देश दिया था.

न्यायालय के इस फैसले के बाद फरवरी, 2014 में आयोग ने आदर्श आचार संहिता में एक नया प्रावधान जोड़ा था, जिसमें मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के दौरान उन्हें प्रभावित करने वाली घोषणायें करने से बाज आने के लिये कई प्रतिबध लगाये थे. यही नहीं, आयोग ने इस तरह के सबसे अधिक वायदे करने वाले राजनीतिक दलों को नोटिस भी जारी किये थे. लेकिन इसके बावजूद स्थिति में विशेष बदलाव नहीं आया.

आयोग ने राजनीतिक दलों से कहा था कि वे चुनाव में वायदे कर सकते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने की वजह और इन्हें पूरा करने के लिये धन की व्यवस्था के बारे में भी बताना चाहिए, ताकि यह महज चुनावी वायदे ही बनकर नहीं रह जायें. आयोग ने यह भी कहा था कि राजनीतिक दलों को ऐसे वायदे करने से बचना चाहिए जिनसे चुनावों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित होने के साथ ही मतदाताओं पर इनका अनावश्यक प्रभाव पड़ने की संभावना है.

न्यायालय के इस फैसले के सात साल बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है और राजनीतिक दल चुनाव में जनता से ऐसे ऐसे वायदे करते हैं जिन्हें पूरा करना शायद व्यावहारिक नहीं होता है.

शायद ही किसी राजनीतिक दल के पास ऐसी कोई ठोस योजना होती है कि अगर वे सत्ता में आये तो विकास कार्यों से इतर इस तरह के वायदों को किस तरह पूरा किया जायेगा और इन पर कितना धन खर्च होगा? परंतु राजनीतिक लाभ के लिये मतदाताओ को आकर्षित करने वाले मुफ्त में सुविधायें देने के वायदे करने का सिलसिला आज भी जारी है.

चुनाव के दौरान मुफ्त मे नाना प्रकार की चीजें और सुविधायें देने का वायदा करने के बाद सत्ता में आने वाले राजनीति दल या गठबंधन से अपेक्षा होती है कि वे इन्हें पूरा करेंगे. परंतु हकीकत यह है कि कोई भी राजनीतिक दल या गठबंधन सत्ता में आने पर इन वायदों को अपने कोष से नहीं बल्कि सरकार के राजस्व से पूरा करने की कोशिश करता है.


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इसका नतीजा यह होता है कि सरकारी धन का उपयोग विकास कार्यो की बजाये मतदाताओं को संतुष्ट करने या कहें तो अपने वोट बैंक को एकजुट बनाये रखने के लिये अनावश्यक और अनुत्पादक कार्यों पर होता है.

हालांकि, निर्वाचन आयोग लगातार स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने का प्रयास करता आ रहा है और उसे इसमें काफी सफलता भी मिली है. लेकिन, किसी कानून के अभाव में आयोग को अभी तक मुफ्त की रेवडियां बांटने के वायदो पर अंकुश लगाने की दिशा में विशेष सफलता नहीं मिली है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के चुनावी वायदे की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की आवश्यकता पर देर सवेर निर्वाचन आयोग सभी राजनीतिक दलों में आम सहमति कायम करने और इसके लिये कानूनी प्रावधान हेतु सरकार को तैयार करने में कामयाब होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं .जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं. इस लेख में उनके विचार निजी हैं)

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