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Sunday, 14 July, 2024
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अमेरिकी शहर में बने जातिवाद-निरोधक कानून से जातिवादियों के अलावा किसी को डरने की जरूरत नहीं

सिएटल में भेदभाव विरोधी कानून पहले से था, जिसमें नस्ल, रंग, लिंग, जन्म की पृष्ठभूमि आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध था.

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अमेरिका के सिएटल (Seattle) शहर में जातिभेद विरोधी कानून पारित हुआ है. इसकी व्यापक चर्चा अंतरराष्ट्रीय और भारतीय मीडिया में हुई है. चूंकि इस कानून के पक्ष और विपक्ष में काफी कुछ लिखा जा चुका है, इसलिए इस लेख में मैं इस कानून के बारे में विस्तार में जाने की जगह, संक्षेप में ही कानून की चर्चा करुंगा.

सिएटल में भेदभाव विरोधी कानून पहले से था, जिसमें नस्ल, रंग, लिंग, जन्म की पृष्ठभूमि आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध था. वर्तमान संशोधन के बाद इनमें जाति शब्द जोड़ दिया गया है. यानी अब जाति के आधार पर अगर कोई किसी से भेदभाव करता है और ये बात साबित होती है, तो वह कानून की नजर में दोषी होगा.

ये कानून दक्षिण एशिया के साथ ही अफ्रीका और जापान जैसे एशियाई देशों से अमेरिका जाकर बसे लोगों पर लागू होगा. इस कानून के दायरे में सभी धर्म के लोग हैं. ये माना गया है कि विभिन्न धर्म के लोग जातिभेद कर सकते हैं.

इस लेख में मैं ये बताने की कोशिश करूंगा कि इस कानून को लेकर विरोध में कौन-से मुख्य तर्क आए हैं और क्या वे तर्क वाजिब हैं.

जब सिएटल में कौन्सिलर क्षमा सावंत ने भेदभाव के आधार के तौर पर जाति को शामिल करने का विधेयक पेश किया, उसके बाद से कई अमेरिकी हिंदू संगठनों, जिसमें हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन और कोएलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका प्रमुख हैं, ने सिटी काउंसिल को पत्र लिखकर इसका विरोध किया.

ये महत्वपूर्ण है कि इन पत्रों में, पहले से चले आ रहे लोकप्रिय तर्कों को आधार नहीं बनाया गया कि वर्ण और जाति अलग हैं. या कि हिंदुओं में वर्ण है, जाति नहीं है और वर्ण का आधार तो कर्म है, जाति नहीं. या कि वर्ण व्यवस्था तो कर्म के आधार पर समाज का विभाजन है.

ये तर्क अब व्यापक तौर पर खारिज हो चुके हैं और हिंदू सवर्ण संगठनों को एहसास है कि इन बातों के आधार पर अमेरिका में बात नहीं बनेगी. इसलिए अब जो तर्क लाए गए हैं, उसकी भाषा अलग हैं. ये तर्क ही आगे भी बार-बार लाए जाएंगे क्योंकि इस बात की पूरी संभावना है कि सिएटल के बाद कई और अमेरिकी शहर और संभव है कि कई राज्य भी आगे चलकर जातिभेद विरोधी कानून बनाएंगे, उनके तर्क इस प्रकार हैं, जिन्हें मैंने उनके ही पत्रों से लिया है (1, 2, 3).

1. पहला और सबसे ज्यादा दोहराया जाने वाला तर्क ये है कि अमेरिका में बस गए हिंदू तो जाति और जातिवाद को मानते नहीं हैं. उनमें से कई तो अपनी जाति जानते भी नहीं हैं. ऐसे में सिएटल में नए कानून के तहत जाति पर पाबंदी कैसे लगेगी क्योंकि इस बात का तो पता ही नहीं चल पाएगा कि दक्षिण एशियाई लोगों में किसकी जाति कौन-सी है.

2. दूसरा तर्क है कि जातिभेद विरोधी कानून भेदभाव मूलक हैं क्योंकि ये हर किसी भी लागू नहीं है. इसे सिर्फ दक्षिण एशियाई, कुछ अफ्रीकी और एशियाई देशों से आए प्रवासियों के लिए लागू किया जा रहा है.

3. ये भी तर्क दिया जा रहा है कि जाति एक जटिल सामाजिक श्रेणी है और इसे समझना आसान नहीं है. इसे समझने और इसकी व्याख्या करने में लोग अक्सर गलतियां करते हैं.

4. चौथा तर्क ये है कि दक्षिण एशिया का कोई भी धर्म जाति या जातिभेद को स्वीकृति नहीं देता, इसलिए जाति के बारे में ये कहना गलत है कि इसे धार्मिक स्वीकृति प्राप्त है.


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अमेरिका में सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों का कहना है हिंदू प्रवासी तो जाति पीछे छोड़ आए हैं, ऐसे में जातिभेद को प्रतिबंधित करने का कानून क्यों. ये एक खोखला तर्क है क्योंकि किसी आदमी का ये कहना कि वो जाति को नहीं मानता, उसे जातिवाद से मुक्त नहीं करता. ऐसा बोलने वाला व्यक्ति जाति से मिले आत्मविश्वास और जाति के संपर्क-सूत्रों का लाभार्थी हो सकता है और इस क्रम में वह अन्य जाति के लोगों से भेदभाव कर सकता है. जाति मुक्त होना वैसे भी एक दुर्लभ घटना है. जाति बचपन में परिवार और समाज में सिखा दी जाती है और ये दक्षिण एशिया में अक्सर बच्चों के प्राथमिक समाजीकरण का हिस्सा होता है.

इसलिए अमेरिका में जाकर बसने भर से कोई जातिमुक्त नहीं हो जाता है. दुनिया की प्रमुख सर्वे फर्म प्यू रिसर्च ने पाया कि “भारतीय लोग अपना सामाजिक व्यवहार मुख्य रूप से जाति के दायरे के अंदर ही करते हैं.” एक भारतीय थोड़े समय के सामाजिक व्यवहार के बाद अक्सर ये समझ लेता है कि सामने वाला व्यक्ति उसकी जाति का है कि नहीं. वैसे भी ये कहावत है कि भारतीय विदेश जाते हैं तो भी अपने साथ अचार, गंगाजल और जाति लेकर जाते हैं!

डॉ. बी.आर. आंबेडकर का प्रसिद्ध कथन है कि – “अगर हिंदू दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाएंगे तो भारतीय जाति एक विश्व समस्या बन जाएगी.” इसे हम होता हुआ देख रहे हैं. अमेरिका में बसे भारतीय अपनी जाति में शादी करने के लिए कई बार भारत लौटते हैं और अमेरिका में भी उन्होंने अपने जातियों के क्लब और एसोसिएशन बना लिए हैं. ऐसा ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत बाकी देशों में भी हो रहा है.

एक महत्वपूर्ण बात ये है कि सिएटल का कानून जाति की पहचान करने के लिए नहीं है, न ही इसमें ये कहा गया है कि कौन-कौन सी जाति के लोग भेदभाव करेंगे तो उन पर कानून लागू होगा. ये कानून हर तरह के जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ है. इसलिए जाति की पहचान होना या न होना एक गौण मसला है.,

दूसरा तर्क ये है कि ये कानून सिर्फ दक्षिण एशिया, और कुछ अन्य एशियाई तथा अफ्रीकी देशों से गए लोगों पर ही क्यों लागू है. इस आधार पर कहा जा रहा है कि ये कानून समानता के सिद्धांत के खिलाफ है. दरअसल ये समझने की जरूरत है कि ये कानून जातिभेद के खिलाफ है, इसलिए जिन देशों में जातिभेद है या जहां से जाति संस्था की शुरुआत हुई, उन देशों से आए लोगों के लिए ही इसे प्रभावी किया गया है. इस देशों में जन्मजात और पेशा आधारित ऊंच-नीच की एक स्थापित सामाजिक व्यवस्था है, जिसे परंपरा, समाज और धर्म की मान्यता है. जाहिर है ये कानून उनके लिए ही हो सकता है. यही वे समाज हैं जो स्वभाव से भेदभाववादी हैं. कौंसिल सदस्य क्षमा सावंत ने भी यही तर्क दिया है कि इन इलाकों से आए लोग ही अपने यहां से आए दूसरे लोगों के साथ जाति के आधार पर भेदभाव करते हैं. ये बात भी गौर करने की है वहां धर्म, लिंग, विचार, जन्म आदि के आधार पर भेदभाव रोकने का कानून पहले से है. जाति का पहलू शामिल न होने से जातिभेद के मामलों में ये कानून प्रभावी नहीं था. उसे अब सुधार लिया गया है.

तीसरा तर्क ये है कि जाति को लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं तो जातिभेद को रोकने का कानून क्यों. ये कहा जा रहा है कि जाति को तो धार्मिक ग्रंथों के आधार पर ही समझा जा सकता है, जिनकी व्याख्याएं बेहद जटिल हैं और इन्हें समझ पाना सबके लिए संभव नहीं है. ये सही है कि जाति को ग्रंथों के आधार पर समझ पाना बेहद जटिल है. हिंदुओ का कोई एक ग्रंथ नहीं है और हर ग्रंथ के हर अंश की कई व्याख्या हैं. इसलिए जो एक ग्रंथ में है, उसका विपरीत किसी और ग्रंथ में मिल जाएगा. जाति और वर्ण को लेकर भी दर्जनों व्य़ाख्याएं हैं. इस नजरिए से जाति रहस्यमय है.

लेकिन जातिवाद के पीड़ित किसी आदमी से पूछिए तो वह फौरन जाति का अर्थ समझा देगा. जाति को समाज व्यवस्था की निचली श्रेणी के लोगों के नजरिए से देखने से फिर उसमें रहस्यमय कुछ भी नहीं रह जाता. वैसे भी सिएटल में जब जातिभेद के मामले आएंगे, तो पीड़ित पक्ष अपने सबूत लेकर ही जाएगा, वरना उनके केस ऐसे भी खारिज हो जाएंगे. वहां जिन कार्यालयों और अधिकारियों को जातिभेद पर नजर रखने या मामलों की सुनवाई करने के लिए रखा जाएगा, वे भेदभाव की मीमांसा करेंगे. शास्त्रों की मीमांसा उनको करनी नहीं है.

चौथे तर्क पर कि धर्म से जाति को मान्यता नहीं मिलती को लेकर काफी बातें की जा सकती हैं. इस बारे में डॉ. आंबेडकर समेत कई विद्वानों ने हजारों पन्ने लिखे हैं. लेकिन इस बारे में. इस कानून के संदर्भ में बात करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ये बात कानून को लागू करने का आधार नहीं है. ये बात सिर्फ जाति की परिभाषा के संदर्भ में कही गई है और इसे लेकर आगे भी तर्क वितर्क होते रह सकते हैं कि जाति को धार्मिक मान्यता है या नहीं.

(दिलीप मंडल इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका के पूर्व प्रबंध संपादक हैं. उनका ट्विटर हैंडल @Profdilipmandal है. दोनों के विचार व्यक्तिगत हैं.)

(संपादन/ आशा शाह )


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