Friday, 30 September, 2022
होममत-विमतअपनी विफलताओं की सफाई देने के लिए इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना बंद कीजिए अमित शाह जी : शशि थरूर

अपनी विफलताओं की सफाई देने के लिए इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना बंद कीजिए अमित शाह जी : शशि थरूर

गृह मंत्री का यह कहना कि नागरिकता का नया कानून जरूरी है क्योंकि कांग्रेस ने देश का धर्म के आधार पर बंटवारा किया, बताता है कि वे इतिहास के फिसड्डी छात्र रहे हैं.

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नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय, लगभग पूरे उत्तर-पूर्व भारत और देश के दूसरे हिस्सों में जो आंदोलन भड़क उठा है वह भारतीय इतिहास के बारे भाजपा की कुटिल व्याख्याओं और देश को पाकिस्तान का हिंदू संस्कारण बनाने की उसकी चालों का ही सीधा नतीजा है. लेकिन फिलहाल जो हंगामा और संकट खड़ा हुआ है उसके शोर में बुनियादी बातों को ओझल न किया जाए तो बेहतर! अफसोस की बात है कि हम अपने उबाऊ राजनीतिक विवादों के, और इतिहास को बलि का बकरा बनाने की भाजपा की चालों के आदी हो चुके हैं. वैसे तो यह पार्टी हमें खींच कर 16वीं शताब्दी में ले जाने पर आमादा है, लेकिन फिलहाल वह 20वीं सदी तक ही सीमित है.

लेकिन संसद में सवाल के जवाब में गृह मंत्री अमित शाह ने आश्चर्यजनक टिप्पणी की कि नागरिकता संशोधन विधेयक, जो अब एक कानून बन गया है, केवल इसलिए जरूरी है क्योंकि काँग्रेस ने 1947 में देश का धर्म के आधार पर बंटवारा कर दिया. यह टिप्पणी इतनी गुस्ताखी भरी है कि इसका जवाब देना बहुत जरूरी है.

इस पर मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि अमित शाह शायद बचपन में स्कूल की इतिहास की कक्षा में ध्यान नहीं देते होंगे. क्या उन्होंने कभी मोहम्मद अली जिन्ना का नाम नहीं सुना? ‘द्विराष्ट्र के सिद्धान्त’ के बारे में या पाकिस्तान को लेकर मुस्लिम लीग के 1940 के प्रस्ताव के बारे में नहीं सुना? क्या वे गंभीरता से यह मानते हैं कि बंटवारा लीग की मांग नहीं थी, और क्या 1946 में भारत के ज़्यादातर मुसलमानों ने इसके पक्ष में वोट नहीं दिया था? क्या शाह वास्तव में यह मानते हैं कि महात्मा गांधी की भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस, छह दशकों तक एकजुट राष्ट्रीय आंदोलन का परचम लेकर आगे-आगे चलने वाली पार्टी, कई बार मुसलमानों के नेतृत्व में चलने वाली और 1940 से 1945 के बीच के निर्णायक दौर में एक मुस्लिम अध्यक्ष (मौलाना आज़ाद) के अधीन काम करने वाली पार्टी भारत को धर्म के आधार बांटने की सोच सकती है?


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लेकिन मुझे यह भी एहसास हुआ कि अमित शाह क्या सोचते और मानते हैं इससे खास फर्क नहीं पड़ता. फर्क इससे पड़ता है कि उन्होंने ऐसा कहा. और यह कह कर वी.डी. सावरकर (जिन्होंने हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में जिन्ना से पहले ‘द्विराष्ट्र के सिद्धान्त’ को प्रस्तुत किया और जिसे जिन्ना ने बाद में लपक लिया) पूजा करने वाली भाजपा ने भारत के ऊपर धब्बा लगाने वाली हर गलती, त्रासदी या घटना के लिए कांग्रेस पार्टी को जिम्मेदार ठहराने की उबाऊ राजनीतिक चाल को ही आगे बढ़ाया है. बंटवारा हुआ, बुरा हुआ, तो इसका दोष भी कांग्रेस के मत्थे मढ़ दो!

विडम्बना यह है कि अमित शाह को समर्थन सबसे अप्रत्याशित जगह— सीमा पार— से मिला. पाकिस्तान के उदारपंथियों ने मेरे उस बयान की निंदा की जिसमें मैंने कहा था कि भाजपा भारत को पाकिस्तान का हिंदुत्ववादी संस्करण बनाने पर आमादा है. असद रहीम खान ने ‘डॉन’ अखबार में और यासिर लतीफ़ हमदानी ने ‘दप्रिंट’ में मेरा नाम लेकर मेरी इसलिए निंदा की क्योंकि मैंने बंटवारे के लिए जिन्ना को दोषी बताने की जुर्रत की थी. इन दोनों का कहना था कि जिस शख्स को सरोजिनी नायडू ने हिन्दू-मुस्लिम एकता का दूत बताया था वह निर्दोष था; यह तो हिंदू कट्टरता, और जनता को आंदोलित करने के लिए गांधीजी द्वारा हिंदू धार्मिक मान्यताओं के इस्तेमाल का नतीजा था कि जिन्ना को अलग मुल्क की मांग करनी पड़ी.

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पाकिस्तान के इन उदारपंथियों के लिए क़ायदे आज़म शालीनता, धर्मनिरपेक्षता और उदारता की प्रतिमूर्ति थे, वे पाकिस्तान को एक ऐसा मुल्क बनाना चाहते थे जहां अल्पसंख्यक खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करें. लेकिन वे यह नहीं बताते कि जिन्ना अपने मुल्क का आस्थाजनित आधार क्यों चाहते थे. ‘द्विराष्ट्र के सिद्धान्त’ वाले जुमले का कभी जिक्र नहीं किया जाता और न कभी यह बताया जाता है कि जिन्ना अपने भाषणों में मुसलमानों को एक अलग कौम बताने जैसी कट्टरपंथी बातें किया करते थे. ये उदारपंथी आज भी इस बात का कोई जवाब नहीं दे सकते कि पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिक के पासपोर्ट पर ‘गैर-मुस्लिम’ शब्दों की मुहर क्यों लगाई जाती है. यह डेविड के ‘यलो स्टार’ जैसा ही मामला है जिसमें यहूदियों को नाजी कब्जे वाले डेनमार्क में इस चिन्ह को लगाना पड़ता था.

पाकिस्तान को प्रबुद्ध उदारवादी बताने की कोई भी कोशिश इसकी चालू विचारधारा, मजहब और फिरके के आधार पर भेदभाव की इसकी घिनौनी प्रथाओं, ईशनिन्दा के इसके भेदभावपूर्ण कानूनों और इसके कारण गरीब अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न, हिंदुओं और ईसाइयों के जबरन धर्म परिवर्तनों, और तमाम तरह के इस्लामी आतंकवादी संगठनों को शरण देने की इसकी उदारता के चलते सफल नहीं हो सकती. पाकिस्तान के ये उदारपंथी इन हकीकतों से छुटकारा पाना चाह सकते हैं. भारत के उदारपंथियों को गर्व है कि वे ऐसे असहिष्णु प्रेत नहीं थे और वे तहेदिल से मानते हैं कि न आगे कभी ऐसे होंगे.

इसलिए, जिन्ना के बचाव की फिक्र में पाकिस्तान के ये उदारपंथी जाने-अनजाने अमित शाह की सियासी सनक को बल देते हैं, जो उस पार्टी के अध्यक्ष हैं जिसने जिन्ना को हीरो कहने वाले अदम्य जसवंत सिंह को निकाल बाहर किया था. जिन्ना में कई खूबियां थीं लेकिन फिरकापरस्त कट्टरता से मुक्त होने की खूबी नहीं थी. वे व्हिस्की पीते थे, सूअर का मांस खाते थे, उन्होंने एक पारसी से शादी की थी मगर इस सबसे वे उदारपंथी नहीं हो जाते, बस एक ढोंगी ही साबित होते हैं.

इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने पर आमादा भाजपा

काँग्रेस को दूसरों के पापों का दोषी बताने के लिए इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का काम केवल अमित शाह नहीं कर रहे हैं. भाजपा इस चाल के लिए दूसरे रास्तों का भी इस्तेमाल करती है. वह कहती है कि काँग्रेस जो खुद कर चुकी है वही काम आज भाजपा करती है तो वह उस पर हमले करती है. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने कहा कि ‘सीएबी’ जैसा एक विधेयक “नेहरू की सरकार ने भी पास किया था” और काँग्रेस का 1950 का ‘प्रवासी (असम से निष्कासन) कानून’ ‘साबित’ करता है कि जवाहरलाल नेहरू ने असम से अल्पसंख्यकों को निष्कासित किए जाने से खास छूट दी थी. माधव ने कथित तौर पर कहा कि ‘1950 में नेहरू सरकार ने मुख्यतः पूर्व पाकिस्तान से आए अवैध प्रवासियों के निष्कासन के लिए इसी तरह का विधेयक पारित किया था और साफ-साफ कहा था कि पूर्वी पाकिस्तान के अल्पसंख्यक इस विधेयक के दायरे से बाहर रहेंगे.’

यह कहने की शायद ही जरूरत है कि यह भी झूठा और भ्रामक बयान है, कि 1950 के कानून और ‘सीएबी’ की तुलना से बिलकुल उलटे तथ्य उभरते हैं. 1950 के कानून की धारा 2 (‘कुछ प्रवासियों के निष्कासन का आदेश देने का अधिकार’) में कहा गया है कि ‘यह धारा उस किसी व्यक्ति पर लागू नहीं होगी, जो पाकिस्तान के किसी हिस्से में नागरिक उपद्रव या उसकी आशंका के कारण अपने गृह स्थान से विस्थापित हुआ हो और असम में रह रहा हो.’


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इस धारा से साफ है कि ऐसे लोग वे कोई भी होंगे, जिन्हें पाकिस्तान से निकाले जाने का डर होगा, इस वर्ग में सभी धर्मों के लोग होंगे, केवल गैर-मुस्लिम नहीं. इसलिए, माधव का यह दावा झूठा है कि नेहरू के विधेयक की तरह भाजपा का विधेयक भी केवल पूर्वी पाकिस्तान के केवल अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देता है. जब मैंने लोकसभा में एक संशोधन पेश करते हुए बताया कि 1950 के विधेयक में वास्तव क्या था और सुझाव दिया कि खास मजहब का नाम लिये बिना और किसी को वंचित किए बिना ‘सीएबी’ केवल ‘उत्पीड़ित व्यक्तियों’ की बात करे, तो भाजपा के सांसदों ने शोर मचाकर संशोधन को गिरा दिया. 2019 में क्षुद्र राजनीतिक लाभ के लिए कॉंग्रेस के 1947 या 1950 के फैसले को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का भाजपा को कोई अधिकार नहीं है.

भाजपा-नेतृत्व से मेरी सीधी-सी गुजारिश यह है कि अपनी आज की विफलताओं की सफाई देने के लिए अतीत को तोड़-मरोड़ कर पेश करना बंद करे. भारत को इससे बेहतर सफाई चाहिए. समय आ गया है कि इतिहास की व्याख्याओं पर उलझने की जगह आज की समस्याओं को हल किया जाए.

(लेखक तिरुवनंतपुरम से सांसद हैं और पूर्व विदेश तथा मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री हैं. वे तीन दशकों तक यूएन में एडमिनिस्ट्रेटर तथा पीसकीपर रहे हैं. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास की और टफ्ट्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों की पढ़ाई की. वे कुल 18 पुस्तकें लिख चुके हैं, उनकी सबसे नई पुस्तक है—‘द पाराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर’. ये लेख उनका निजी विचार है.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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