Wednesday, 29 June, 2022
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भारतीय लोकतंत्र के शोर में कैसे दब रहा है ‘गणतंत्र का विचार’

लोकतंत्र और गणतंत्र कमजोर ढांचे होते हैं जिन्हें निरंतर निगरानी और साज-संभाल की जरूरत होती है क्योंकि वे मामूली कुत्सित हस्तक्षेपों से भी आसानी से ध्वस्त हो सकते हैं.

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इस साल गणतंत्र दिवस परेड मलबों के बीच से गुज़रेगी, जिन्हें नज़रों से ओझल कर दिया गया होगा. नरेंद्र मोदी की सरकार जिसे इस अगस्त में स्वतंत्र राष्ट्रीयता की 75वीं वर्षगांठ के वास्तविक जश्न का प्रतीक बता रही है, उसके निर्माण का काम चल रहा है. ये तुलनात्मक प्राथमिकताएं हमें यह सवाल करने को मजबूर कर सकती हैं कि आखिर गणतंत्र दिवस पर हम किस चीज का जश्न मनाते हैं. भारतीय गणतंत्र वास्तव में है क्या?

आज़ादी के बाद 75 वर्षों में भारतीय लोकतंत्र के विश्लेषण पर काफी स्याही खर्च की जा चुकी है और भारतीय लोकतंत्र के वैचारिक सूत्रों, इसके संस्थागत ढांचे, इसके चुनावों और उनके नतीजों के बारे में कई अध्येता अध्ययन कर चुके हैं.

‘भारतीय लोकतंत्र’ के नाम से संदर्भ ग्रंथों की सूची पर नज़र डालें तो हजारों नहीं तो सैकड़ों पुस्तकों और लेखों की सूची तैयार हो जाएगी. और इनमें से तीन चौथाई तो पूरी तरह चुनावों पर केंद्रित होंगे.

इसके विपरीत, एक गणतंत्र के रूप में भारत की साख और इसकी विशेषताओं के सैद्धांतिक विश्लेषण पर बहुत कम ध्यान दिया गया है. ऐसा क्यों है? आखिर, 1950 की जनवरी में भारत को एक ‘संप्रभुता संपन्न, लोकतांत्रिक गणतंत्र’ घोषित किया गया था. तो एक से ज्यादा ज़ोर दूसरे पर क्यों दिया गया? क्या भारतीय गणतंत्र पर ज्यादा ध्यान देने से भारतीय लोकतंत्र को कोई फर्क पड़ जाता?


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गणतंत्र के नागरिक बनाम लोकतंत्र के नागरिक

‘गणतंत्र’ शब्द के प्रयोग के पीछे मूल मंशा यह थी कि भारत अब एक उपनिवेशवादी सरकार के माध्यम से एक राजशाही के अधीन नहीं रहना चाहता बल्कि वह लोकतांत्रिक तरीके से अपने नेता चुनने में सक्षम हो गया है. इसलिए, लोकतंत्र ‘गणतंत्र’ शब्द में समाहित हो गया, जो इसके राजशाही विरोधी रुख और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्वरूप की ओर संकेत करता है. लेकिन गणतंत्रवाद ने नागरिकता की उस भावना को भी संहिताबद्ध किया, जो केवल राज्य और नागरिकों के बीच ही नहीं बल्कि नागरिक और नागरिक के बीच भी मौजूद होती है.

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इसलिए, ‘लोकतंत्र’ शब्द राजनीतिक लोकतंत्र की ओर संकेत करता है और ‘गणतंत्र’ शब्द लोकतांत्रिक संस्कृति वाले नये तरह के समाज की ओर संकेत करता है. इस तरह का समाज 1947 में जातियों, धर्मों और वर्गों के आधार पर बुरी तरह बंटे हुए भारत के लिए मुख्यतः एक सपना था. इसलिए भाईचारा और गरिमा जैसे संवैधानिक लक्ष्य कल्पना में बसी इस नयी नागरिकता के मूल तत्व थे.

गणतंत्र शब्द यह याद दिलाता है कि भाईचारा और लोकतांत्रिक संस्कृति जनता की उत्साहपूर्वक भागीदारी के बिना नहीं स्थापित हो सकती है. एक राजनीतिक लोकतंत्र में जनता को एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए सक्रिय नागरिकों की भूमिका निभानी होगी.

इसलिए, ‘लोकतंत्र’ में नागरिकों की भूमिका एक ‘गणतंत्र’ में उनकी भूमिका से भिन्न होती है. लोकतंत्र में वे अधिकारों से लैस नागरिक होते हैं, जो मुख्यतः चुनावों में ‘मतदाताओं’ के रूप में उभरकर सामने आता है. इसके विपरीत, गणतंत्र में नागरिकों को हमेशा सतर्क रहने, पहल करने, सार्वजनिकता की भावना रखने, अपने सामाजिक समूह से आगे बढ़कर दूसरे नागरिकों के साथ एकता स्थापित करने, संस्थाओं का ख्याल रखने और जिस तरह का समाज वे बनाना चाहते हैं उसके लिए निरंतर सजग रहने की जरूरत होती है. अरस्तू ने कहा था, ‘एक नागरिक और दूसरे नागरिक में अंतर होता है लेकिन समुदाय की मुक्ति उन सबका साझा उपक्रम है.’

गणतंत्र में नागरिक सतर्क होते हैं, स्वयंभू पहरुए नहीं होते.


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गणतंत्र की उपेक्षा के नतीजे

तो हम भारतीय गणतंत्र से ज्यादा भारतीय लोकतंत्र के बारे में चर्चा करने पर इतनी ऊर्जा क्यों खर्च करते हैं? क्या इसलिए कि चुनाव क्रिकेट की तरह मनोरंजक लगते हैं, जिनमें आंकड़ों, ग्राफ, रुझानों की जुगाली करने का मजा मिलता है?

चुनावों से उभरने वाले आंकड़ों और जानकारियों के कारण, पुराने मुकाबलों से तुलना करने, जानकारों की याददाश्त का इम्तिहान लेने, रिकॉर्ड बनाने, मैदान में अचानक कूदने वालों, हार-जीत के अंतरों, व्यक्तिगत रिकॉर्डों आदि के कारण वैसा ही ग्लेमर और जोश पैदा होता है जैसा क्रिकेट में होता है. लेकिन इन सबमें आम नागरिक सक्रिय भागीदारी नहीं करता, वह सिर्फ ताली बजाने और शोर मचाने वाला निष्क्रिय दर्शक बना रहता है.

लेकिन, गणतंत्र में नागरिक ही सितारे होते हैं इसलिए गणतंत्र का अध्ययन करने के लिए अलग तरह का कौशल चाहिए, जो शोरशराबे भरे चुनावी नाटकों से हट कर समाज, समुदायों, विभाजनों और एकता स्थापित करने के प्रयासों पर नज़र डाले. भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति के ऐसे अध्ययन हुए भी हैं लेकिन उन्हें लोकतंत्र के अध्ययन के तौर पर शायद ही मान्यता दी जाती है. हमने बस चुनावों के लिए मैदान खाली कर दिया है.

गणतंत्र की ऐसी उपेक्षा के कम-से-कम तीन गंभीर नतीजे हुए हैं. पहला, अगर हम यह मान लेते हैं कि गणतंत्र, समाज, और नागरिकों का अध्ययन लोकतंत्र का भी अध्ययन है, तो यह लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित मानने से रोकता है. वर्तमान संदर्भ में, जब भारत चुनावी अधिनायकवादी लोकतंत्र में तब्दील होता जा रहा है और कुछ लोगों के लिए बस चुनाव ही साध्य बन गया है, तब इस तरह का अध्ययन खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है.

दूसरे, गणतंत्र पर ध्यान देना यह याद दिलाएगा कि सजग नागरिकों को संस्थाओं (मसलन, चुनाव आयोग, जिसके बिना सबसे बुनियादी राजनीतिक लोकतंत्र तक मुमकिन नहीं है) और उनकी निष्ठा पर निगरानी रखना और उसकी रक्षा करना जरूरी है.

अंत में, लोकतंत्र और गणतंत्र, दोनों का अध्ययन करके हम इस बात को समझ सकेंगे कि राजनीति सिर्फ चुनाव लड़ना और जीतना ही नहीं है बल्कि नयी रचना और संरक्षण करना भी है. और यह समझ, राजनीति क्या है इसकी हमारी जो परिभाषा है उसे विस्तार देगा. इसलिए, नागरिकों के एक समूह ने कहा है कि ‘गणतंत्र को मजबूत करना’ खुद लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जरूरी है.

इस साल गणतंत्र दिवस परेड के रास्ते पर जो निर्माण हो रहा है वह काश हमें याद दिलाए कि लोकतंत्र और गणतंत्र कमजोर ढांचे होते हैं जिन्हें निरंतर निगरानी और साज-संभाल की जरूरत होती है क्योंकि वे मामूली कुत्सित हस्तक्षेपों से भी आसानी से ध्वस्त हो सकते हैं.

(मुकुलिका बनर्जी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में एंथ्रोपोलॉजी पढ़ाती हैं. उनकी नयी किताब ‘कल्टीवेटिंग डेमोक्रेसी: पॉलिटिक्स एंड सिटिज़नशिप इन एग्रेरियन इंडिया ’ हाल में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित की है. उनका ट्वीटर हैंडल @MukulikaB है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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