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Friday, 14 June, 2024
होममत-विमतट्रंप के बाद अब कंगना को भी ट्विटर पर अनब्लॉक करना चाहिए, असहमति है सोशल मीडिया की जान

ट्रंप के बाद अब कंगना को भी ट्विटर पर अनब्लॉक करना चाहिए, असहमति है सोशल मीडिया की जान

मैं मानता हूं कि कंगना रनौत और ऐसे तमाम लोगों को जिन्हें सोशल मीडिया ने बिना किसी कानूनी कार्रवाई के ब्लॉक या रिस्ट्रिक्ट किया है, उन्हें अनब्लॉक किया जाए.

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ट्विटर पर एक ओपिनियन पोल, जिसमें डेढ़ करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया, के बाद ट्विटर के नए मालिक एलन मस्क ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अनब्लॉक कर दिया. यानी ट्रंप की ट्विटर पर वापसी हो गई है. अब वे न सिर्फ अपनी बात ट्विटर पर लिख और बोल पाएंगे बल्कि लोग भी उनसे जुड़ पाएंगे.

मेरा मानना है कि भारत में भी जिन लोगों को ट्विटर ने बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के ब्लॉक या रिस्ट्रिक्ट किया है, उन्हें अनब्लॉक करके वापस लाना चाहिए. उनमें फिल्म स्टार कंगना रनौत प्रमुख हैं. उन्हें ‘नफरत फैलाने‘ का आरोप लगाकर पिछले साल मई महीने में स्थायी तौर पर ट्विटर से हटा दिया गया था.

ट्रंप का मामला उससे कुछ पहले का है. 6 जनवरी 2021 को अमेरिका की राजधानी और वहां की सत्ता के केंद्र कैपिटॉल में हिंसा भड़की गई. ऐसा माना गया कि हिंसा करने वाले राष्ट्रपति चुनाव हार चुके ट्रंप के समर्थक थे और ट्रंप सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके उन्हें भड़का रहे थे. वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके हिंसा न भड़का सकें, इस आधार पर ट्विटर ने 8 जनवरी, 2021 को अपने प्लेटफॉर्म से उन्हें बैन कर दिया. इसके लिए उनके दो ट्वीट को आधार बनाया गया, जिसमें ट्रंप ने नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण में न जाने की बात की थी और चुनाव प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. ट्विटर ने माना कि इस तरह से हिंसा बढ़ सकती है. इसी समय ट्विटर ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खमैनी से जुड़े एक अकाउंट को भी बैन कर दिया था.

भारत में भी ट्विटर विभिन्न कारणों से या कारण बताए बगैर भी अकाउंट को ब्लॉक या सस्पेंड करता रहा है. इनमें से कंगना रनौत का अकाउंट बैन किया जाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे फिल्म जगत की लोकप्रिय हस्ती है और सोशल मीडिया में उनकी अच्छी पहुंच है. कंगना ट्विटर पर मुझसे अक्सर टकराती रही हैं और उन्होंने अपने जातिवादी और सांप्रदायिक विचारों को कभी छिपाया भी नहीं है. इसके बावजूद मेरा मानना है कि उन्हें ब्लॉक करना गलत और अलोकतांत्रिक है.

मेरा तर्क है कि सोशल मीडिया अगर अबाध विचार-विमर्श-चर्चाओं के आदान-प्रदान की जगह है तो इसमें किसी असहमत विचार या असहमत विचार वाले को प्लेटफॉर्म द्वारा बैन किया जाना न सिर्फ गलत है, बल्कि ऐसा होता रहा तो ये प्लेटफॉर्म के लिए भी आत्मघाती है. ट्रंप के मामले में यही काम फेसबुक और इंस्टाग्राम ने भी किया है और ये उनके लिए भी नुकसानदेह साबित हो रहा है क्योंकि अगर परस्पर विरोधी विचार सोशल मीडिया पर एक दूसरे से नहीं टकराएंगे तो सोशल मीडिया का मतलब ही क्या रह जाएगा?

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सोशल मीडिया की बुनियाद ही इस वादे पर टिकी है कि यहां हर किसी को अपनी बात कहने या रखने का मौका मिलेगा. ट्रंप के मामले में सोशल मीडिया कंपनियों ने जो किया था, उससे सोशल मीडिया की बुनियाद हिल गई थी. अच्छा है कि एलन मस्क उसे फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.

अमेरिका के राष्ट्रपति और फिर पूर्व राष्ट्रपति के नाते ट्रंप ने जो कुछ कहा या कह रहे हैं, उसे मुख्यधारा का परंपरागत मीडिया रिपोर्ट करता रहा है. ऐसे में सोशल मीडिया में ये बातें न आएं, इसका कोई तर्क हो ही नहीं सकता.

ट्विटर और फेसबुक पर मुझे कई बार ब्लॉक या रिस्ट्रिक्ट किया गया है. मैं ये नहीं कह रहा हूं कि इसमें किसी की शरारत है. ये भी जरूरी नहीं है कि इसमें सोशल मीडिया कंपनियों का कोई व्यक्ति शामिल रहा हो. ये भी मुमकिन है कि अगर किसी अकाउंट या किसी ट्वीट या पोस्ट की अगर मास रिपोर्टिंग हुई हो तो उसे ब्लॉक या रिस्ट्रिक्ट कर दिया जाता होगा. किसी विरोधी विचार को ढेर सारे लोग मिलकर इस तरह से ब्लॉक कराते होंगे. लेकिन सोशल मीडिया कंपनियों को इस बारे में नए सिरे से सोचना चाहिए कि क्या इस तरह से कई लोग अपनी बात कह ही नहीं पाएंगे, सिर्फ इसलिए कि ढेर सारे लोग उसकी बात को नापसंद करते हैं.

मेरी राय ये है कि सिर्फ नापसंद होने या असहमत होने के कारण किसी को ब्लॉक या रिस्ट्रिक्ट न किया जाए. न कंपनी के स्टाफ के द्वारा और न ही मशीनी तरीके से अल्गोरिद्म द्वारा.


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प्लेटफॉर्म या पब्लिशर

इन घटनाओं से ये बहस भी तेज हुई है कि सोशल मीडिया कंपनियां दरअसल हैं क्या? अगर वे प्लेटफॉर्म हैं तो उसे कोई अधिकार नहीं है कि वहां होने वाली चर्चाओं या कंटेंट को मॉडरेट या प्रभावित करें. प्लेटफॉर्म का मतलब है कि हर व्यक्ति या संस्था अपनी बात कहे और उसकी जिम्मेदारी अकाउंट की हो. इसमें अकेला नियंत्रक संबंधित देश का या अंतरराष्ट्रीय कानून होना चाहिए.

अगर सोशल मीडिया कंपनी किसी अकाउंट की किसी खास बात को अपनी मर्जी से हटा देती है, तो वह अकाउंट वैसी बातें शायद आगे न लिखे. ये उसकी विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा. ऐसा करने की स्थिति में ट्विटर या फेसबुक प्लेटफॉर्म से आगे बढ़कर प्रकाशक या पब्लिशर बन जाते हैं. फिर उसे बहुत सारी जिम्मेदारियां लेनी पड़ेंगी, जिनसे वे बचते रहे हैं.

पब्लिशर चाहे वह कोई साधारण व्यक्ति हो या कोई मीडिया कंपनी, वह अपने कंटेंट के लिए हर तरह से जिम्मेदार होता है. वहां व्यक्ति के दिमाग में या संस्था के तौर पर कई गेटकीपर यानी कंट्रोल करने वाले व्यक्ति या प्रक्रियाएं होती हैं. यहां एकतरफा होने की गुंजाइश है और ये गलत भी नहीं है. लेकिन सोशल मीडिया कंपनियां प्लेटफॉर्म होने के नाते एकतरफा नहीं हो सकतीं.


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कानून हो अकेला नियंत्रक

विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निर्बाध यानी बेलगाम नहीं होती. होनी भी नहीं चाहिए. भारत के संविधान में मौलिक अधिकार के जिस अनुच्छेद में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है, वहीं पर उन परिस्थितियों का उल्लेख भी है, जब ये स्वतंत्रता प्रभावी नहीं है. ऐसा लगभग हर देश के कानून और संविधान में है. भारत में संविधान, भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी, मानहानि के कानून, संसदीय विशेषाधिकार, एससी-एसटी एक्ट और सूचना प्रौद्योगिकी कानून विचार और अभिव्यक्ति के नाम पर किसी व्यक्ति या संस्था के मनमाने होने पर रोक लगाते हैं.

ये कानून सोशल मीडिया पर भी लागू होते हैं और ये विचार-विमर्श को बेलगाम होने से रोकने में सक्षम हैं. सोशल मीडिया कंपनियों को इससे आगे बढ़कर मामलों को अपने हाथ में लेने या मनमानी करने की जरूरत नहीं है. खासकर ऐसे मामलों को अपने कर्मचारियों के हवाले नहीं करना चाहिए क्योंकि उनकी अपनी राय या विचार उनके फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं.

सोशल मीडिया युग में करोड़ों लोग एक दूसरे से इसी माध्यम से संवाद कर रहे हैं. विचार निर्माण की प्रक्रिया में इसका महत्व निर्विवाद है. इस तरह से जनमत निर्माण भी हो रहा है, जिसका सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं पर असर होता है. कहा तो यहां तक जाता है कि चुनाव भी इस तरह प्रभावित हो रहे हैं. ये एक हद तक सही भी जान पड़ता है, वरना राजनीतिक दल और नेता करोड़ों अरबों रुपए सोशल मीडिया टीम और आईटी सेल पर खर्च न करते.

जब राजनीति और समाज को सोशल मीडिया इस हद तक प्रभावित करने लगा है तो इनके ऑफिस में बैठे चंद लोगों पर ये जिम्मा नहीं छोड़ा जा सकता है कि कौन यहां अपनी बात रखेगा और कौन सी बात यहां बोली या लिखी जाएगी. या किन बातों को बोलने पर रोक होगी.

इसी आधार पर मैं मानता हूं कि कंगना रनौत और ऐसे तमाम लोगों को जिन्हें सोशल मीडिया ने बिना किसी कानूनी कार्रवाई के ब्लॉक या रिस्ट्रिक्ट किया है, उन्हें अनब्लॉक किया जाए.

आखिरी बात. अगर कोई सोशल मीडिया पर इस बात की वकालत करे कि दंगा होना चाहिए या किसी व्यक्ति या समुदाय की हत्या कर देनी चाहिए तो क्या सोशल मीडिया कंपनी को उसके विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी सम्मान करना चाहिए? मेरा जवाब है कि कानून ऐसे मामलों से निपटने के लिए सक्षम है. ऐसे समाजकंटकों को कानून सजा देगा. कानून उन्हें ब्लॉक करने के लिए भी कह सकता है. सोशल मीडिया कंपनियों को कानून के हिसाब से काम करना चाहिए.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(संपादन: कृष्ण मुरारी)


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