एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में नेपाल की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार की अंतरिम कैबिनेट में ऊर्जा मंत्री कुलमान घिसिंग ने 7 जनवरी को अपना इस्तीफा सौंप दिया. यह इस्तीफा ऐसे समय में आया, जब उन पर दबाव बढ़ रहा था. रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने रवि लामिछाने के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) में शामिल होकर अपनी उज्यालो नेपाल पार्टी का उसमें विलय कर दिया था. उज्यालो नेपाल पार्टी को 3 दिसंबर 2025 को ही लॉन्च किया गया था.
हालांकि, घिसिंग ने किसी भी पार्टी में शामिल होने से इनकार किया है, लेकिन राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष लामिछाने के साथ हाल की बैठकों ने पार्टी विलय को लेकर सुर्खियां ज़रूर बटोरी हैं. वहीं, विलय और आरएसपी में घिसिंग की भूमिका को लेकर बातचीत अब भी साफ नहीं है. बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने अंतरिम सरकार की निष्पक्ष और गैर-दलीय छवि बनाए रखने के लिए घिसिंग से इस्तीफा देने को कहा था.
अब, जब नेपाल में 5 मार्च को होने वाले चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, तो पारंपरिक राजनीतिक दल चुनाव में उतरने से पहले अलग-अलग समीकरण बनाने की कोशिशों में जुट गए हैं. जेन-ज़ी आंदोलन के नतीजों को नेपाली राजनीति में नए लोगों के लिए एक मौके के रूप में देखा जा रहा है, ताकि वे अपनी पहचान बना सकें और केंद्र में आ सकें.
हालांकि, एक बड़ा सवाल यह है कि आगे कौन सबसे आगे रहेगा—पुराने नेता या नए चेहरे? या फिर नतीजों के बाद देश एक बार फिर किसी नए राजनीतिक उभार का गवाह बनेगा?
पुराने बनाम नए
नए दलों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को चुनाव में साफ बढ़त मिलती दिख रही है, क्योंकि यह पार्टी अच्छे शैक्षणिक और पेशेवर रिकॉर्ड वाले युवा उम्मीदवारों पर भरोसा कर रही है. आरएसपी की स्थापना जुलाई 2022 में हुई थी—नवंबर 2022 में हुए चौथे आम चुनाव से सिर्फ चार महीने पहले. लोकप्रिय मीडिया हस्ती से नेता बने रवि लामिछाने शुरुआत से ही इस पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं.
कई लोगों को चौंकाते हुए, 2022 के संघीय चुनावों में यह पार्टी देश की चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. प्रतिनिधि सभा की 272 सीटों में से पार्टी ने 20 सीटें जीतीं. लामिछाने प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल, जिन्हें प्रचंड भी कहा जाता है, की गठबंधन सरकार में अहम सहयोगी बने और कैबिनेट में उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री के पद पर रहे.
दिलचस्प बात यह है कि 2008 में नेपाल के लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद से देश में राष्ट्रीय स्तर पर दर्जनों नई पार्टियां बनी हैं. 2016 में पूर्व प्रधानमंत्री और लंबे समय तक माओवादी नेता रहे बाबूराम भट्टराई ने प्रचंड के नेतृत्व वाले माओवादी सेंटर को छोड़कर नई शक्ति पार्टी बनाई थी, लेकिन यह पार्टी कोई खास पहचान नहीं बना सकी और जल्दी ही खत्म हो गई.
इसी तरह, 2017 में पत्रकार से नेता बने रवींद्र मिश्र द्वारा बनाई गई बिबेकशील साझा पार्टी का भी वही हाल हुआ और अब यह आरएसपी में विलय हो चुकी है.
नए दल क्यों असफल होते हैं?
इसके दो मुख्य कारण हैं. पहला, साफ एजेंडा न होने और सिर्फ लोकप्रियता के सहारे चलने से ये दल जनता का भरोसा खो देते हैं. दूसरा, ये पार्टियां एक-व्यक्ति केंद्रित बन जाती हैं और इनके पास मजबूत संगठनात्मक ढांचा नहीं होता. स्पष्ट सोच, आम लोगों से जुड़े मुद्दे और मजबूत दूसरी पंक्ति का नेतृत्व न होने से शुरुआती जोश धीरे-धीरे खत्म हो जाता है और आंदोलन की विश्वसनीयता व अहमियत बनी नहीं रह पाती.
इस बीच, राजनीति में कम समय होने के बावजूद आरएसपी ने काफी प्रगति की है. पार्टी के लिए सबसे कारगर रहा योग्य उम्मीदवारों का चयन और शहरी इलाकों में इसकी व्यापक स्वीकार्यता. हालांकि, पार्टी विवादों से अछूती नहीं रही है.
लामिछाने पर धन के दुरुपयोग के आरोप लगे और उन्हें जेल भी जाना पड़ा. 2023 में उन्हें गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री के पद से भी इस्तीफा देना पड़ा, जब शीर्ष अदालत के फैसले के बाद उन पर अमेरिकी नागरिक होने के आरोप लगे.
फिर भी, नेपाल के मतदाताओं के सामने मौजूद विकल्पों में—खासकर युवा मतदाताओं के बीच, जो जेन-ज़ी आंदोलन की मुख्य ताकत थे—आरएसपी एक बड़ा गेम-चेंजर बनकर उभर सकती है.
जहां आरएसपी का मूल एजेंडा भ्रष्टाचार से लड़ना, युवाओं को मुख्यधारा की राजनीति में लाना और भाई-भतीजावाद की जगह योग्य उम्मीदवारों को आगे बढ़ाना था, वहीं बालेन शाह को पार्टी में शामिल करना राजनीतिक रूप से फायदेमंद माना जा रहा है. बालेन शाह युवाओं में काफी लोकप्रिय हैं. उन्होंने मई 2022 में काठमांडू के मेयर का चुनाव एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जीता था और नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार को 20,000 से ज्यादा वोटों से हराया था.
बालेन युवाओं में बेहद लोकप्रिय हैं और मधेश क्षेत्र से आने वाले जनजाति नेता के रूप में उनकी पहचान उनकी लोकप्रियता को और बढ़ा सकती है. सितंबर 2025 में जेन-ज़ी आंदोलन के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री की दौड़ में भी बालेन आगे चल रहे थे, लेकिन अंत में उन्होंने सुशीला कार्की को समर्थन दिया.
हालांकि, पारंपरिक दलों के मजबूत वोटरों को अपने पक्ष में करना आरएसपी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. जेन-ज़ी आंदोलन में युवाओं ने अपनी आवाज़ उठाई और जीत भी हासिल की, लेकिन राष्ट्रीय चुनावों में अलग-अलग पीढ़ियों के लोग हिस्सा लेते हैं और जीत के लिए सभी का समर्थन ज़रूरी होता है.
पुराने नेता अब भी वही पुराने हैं
जेन-ज़ी आंदोलन के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली का इस्तीफा देना नेपाली राजनीति के पारंपरिक ढांचे के लिए एक बड़ा झटका था. ओली की सीपीएन-यूएमएल से लेकर नेपाली कांग्रेस और माओवादी सेंटर तक, आंदोलन के दौरान सभी बड़े दलों को विरोध का सामना करना पड़ा. जनता के गुस्से और नाराज़गी, खासकर युवाओं की भावनाओं को देखते हुए, पारंपरिक पार्टियों में नेतृत्व बदलने की उम्मीद की जा रही थी.
हालांकि, लगभग सभी बड़े पारंपरिक दल—सीपीएन-यूएमएल और नेपाली कांग्रेस, ने अपना वही पुराना नेतृत्व बनाए रखा. यहां तक कि पार्टियों के अंदर मौजूद गुट भी नया नेतृत्व सामने लाने में नाकाम रहे. जब यह सोच जोर पकड़ने लगी कि जेन-ज़ी आंदोलन के बाद ओली को पीछे हटकर नए नेतृत्व के लिए रास्ता बनाना चाहिए, तब भी दिसंबर 2025 में सीपीएन-यूएमएल के 11वें महाधिवेशन में ओली लगातार तीसरी बार पार्टी अध्यक्ष चुने गए.
सीपीएन-यूएमएल के भीतर किसी भी गुट, यहां तक कि नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी के नेतृत्व वाले गुट—ओली की अध्यक्षता को चुनौती नहीं दे सका. अब यह भी कम ही लगता है कि मार्च में होने वाले चुनाव के बाद ओली फिर से प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा छोड़ेंगे.
दूसरी ओर, नेपाली कांग्रेस पार्टी अपने ही अंदर अनुशासन बनाए रखने के लिए जूझ रही है. शीर्ष नेतृत्व के बीच साफ मतभेद नज़र आ रहे हैं. पार्टी के महासचिव गगन थापा और विश्वप्रकाश शर्मा ने नेतृत्व में बदलाव के लिए विशेष महाधिवेशन बुलाने की मांग की है. उनका मुख्य जोर नेतृत्व परिवर्तन पर है—खासतौर पर पार्टी पर देउबा की पकड़ खत्म करने और अगर युवा नहीं तो कम से कम नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे लाने पर.
सीपीएन-यूएमएल और नेपाली कांग्रेस से अलग, माओवादी सेंटर पार्टी जेन-ज़ी आंदोलन के बाद वैकल्पिक राजनीतिक एकता बनाने वाली पहली पार्टी बनी. जेन-ज़ी आंदोलन को चेतावनी के रूप में लेते हुए और आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए, प्रचंड के नेतृत्व वाले माओवादी सेंटर ने माधव नेपाल की सीपीएन (यूनिफाइड सोशलिस्ट) और अन्य छोटे वाम दलों के साथ मिलकर एक संयुक्त नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का फैसला किया.
2008 में हुए पहले लोकतांत्रिक चुनाव जीतने से लेकर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनने तक, माओवादियों ने पिछले एक दशक में मतदाताओं के बीच अपनी बड़ी पकड़ खो दी है.
प्रचंड के नेतृत्व में माओवादी सेंटर ने 2022 के संसदीय चुनावों के बाद सीपीएन-यूएमएल और नेपाली कांग्रेस के साथ अलग-अलग गठबंधनों में दो बार सरकार बनाई. वहीं, स्पष्ट राजनीतिक जनादेश न होने के बावजूद सत्ता में बने रहने की प्रचंड की कोशिश और विपक्ष में बैठने की उनकी अनिच्छा ने कई बार नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ाया है. साथ ही, उनके नेतृत्व में भाई-भतीजावाद के आरोपों ने भी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया है.
फिर भी, प्रचंड कई बार शीर्ष पद तक पहुंचने में सफल रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर गठबंधन सरकारों में उनके पास निर्णायक संख्या रहती है.
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब प्रचंड ने माओवादी सेंटर को एक संयुक्त कम्युनिस्ट मोर्चे में मिलाया हो. 2018 में प्रचंड और ओली ने अपनी-अपनी पार्टियों का विलय कर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनाई थी. भले ही वाम एकता ऐसे प्रयासों का वैचारिक आधार रही हो, लेकिन इनमें से किसी भी नेता ने सरकार में अपनी व्यक्तिगत नेतृत्व की महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ी. यही वजह है कि नेपाल में गठबंधन और एकताएं उम्मीद से कहीं जल्दी टूट जाती हैं.
आगे का रास्ता
जेन-ज़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि में नए राजनीतिक समीकरण उभरने के बावजूद, राजनीति के प्रति राजनीतिक दलों का व्यवहार—चाहे वे पुराने हों या नए—अब भी लगभग वही बना हुआ है. सत्ता-केंद्रित राजनीति, संरक्षण (पैट्रोनेज) और अल्पकालिक राजनीतिक चालें आज भी राजनीतिक आचरण को परिभाषित करती हैं. यह प्रवृत्ति पुराने नेताओं और नई पीढ़ी—दोनों में साफ दिखाई देती है, जिससे बदलाव वास्तविक कम और भाषणों तक सीमित ज्यादा लगता है.
इसी कारण, भले ही आरएसपी बालेन शाह की लोकप्रियता का लाभ उठाना चाहती हो, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती शाह और लामिछाने के बीच सत्ता संघर्ष को संभालना है, क्योंकि दोनों ही लोकप्रिय युवा नेताओं की एक ही श्रेणी में आते हैं. वहीं, पुराने नेता अब भी पारंपरिक राजनीति में ही उम्मीद देखते हैं और चुनावों में अपने वोट बैंक को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं. मार्च के चुनावों के बाद अगर नए नेता भी पुराने नेताओं के साथ मिलकर एक बार फिर गठबंधन बनाएं, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होगी.
हालांकि, एक स्थिर और समृद्ध नेपाल के लिए आगे का रास्ता लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, समावेशी संवाद के जरिए राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने और कानून के शासन को बनाए रखने में ही है. जनता का भरोसा फिर से जीतने और देश को बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में सही दिशा देने के लिए आर्थिक सुधार, सुशासन और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देना ज़रूरी है. यह तब तक संभव नहीं है, जब तक राजनीतिक दल खुद में सुधार नहीं करते और जनता-केंद्रित दृष्टिकोण नहीं अपनाते.
(ऋषि गुप्ता ग्लोबल अफेयर्स पर कॉमेंटेटर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
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