Friday, 21 January, 2022
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मोदी को अब और स्वीकार करना क्रूरता को स्वीकार करना है

यह कहना है कि महामारी एक ‘अनदेखे दुश्मन’ का काम है, जिसके खिलाफ सरकार दुर्भाग्यवश ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही है, कुछ और नहीं ये स्वीकारना ही है कि सरकार विफल रही है.

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इस हफ्ते एक बार फिर मौतें ही सुर्खियों में छाई रही हैं. उत्तर भारत की नदियों में तैरते शवों के फोटो अब सामूहिक अंतिम संस्कार वाली उन तस्वीरों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं जो पिछले हफ्ते ही महामारी की ग्लोबल इमेज बने हुए थे. इसमें कोई दो राय नहीं कि शवों की ये तस्वीरें जो दिखा रहीं है, वो क्रूरता है.

बड़ी संख्या में हुई मौतों और इसकी सिहरा देने वाली तस्वीरों ने सरकार के खिलाफ भावनाओं को एकदम भड़का दिया है.

विश्लेषकों ने कोविड के कारण बड़े पैमाने पर हुई मौतों की इन तस्वीरों को सरकार की नाकामी के सबूत के तौर पर सामने रखने में तनिक भी देरी नहीं लगाई और ऐसा करना सही भी था. वैक्सीन की कमी, वायरस की रोकथाम पर जागरूकता के लिए सार्वजनिक अभियान की कमी और पहले लॉकडाउन के दौरान इलाज और अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने में चूक जाना—ये सब सरकार की विफलता की ओर ही इशारा करते हैं. राजनेताओं का अपने कर्तव्य पूरी तरह भूल जाना और उनकी तरफ से बड़ी जनसभाओं और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करना और भी ज्यादा घातक साबित हुआ है.

बड़े पैमाने पर मौतों के बीच शक्तिशाली सरकार और इसके लोकप्रिय चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रियता नदारद रही है. इसके बजाय, सरकार की ओर से उठने वाली तमाम आवाजें अभागे और बेदम नागरिकों को सकारात्मक बने रहने और प्रार्थना की शक्ति पर भरोसा करने की नसीहत दे रही हैं. इस सब पर सरकार की चुप्पी किसी क्रूरता से कम नहीं है.


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राजनीतिक सत्ता और क्रूरता

अत्याचार और शासन में कोई बहुत अंतर नहीं है. हमेशा से ऐसा होता आया है. अनंतकाल से राजाओं, दार्शनिकों, जन नैतिकतावादियों और राजनीतिक नेताओं की नजर में राजनीतिक शासन और क्रूरता के बीच गहरा रिश्ता रहा है, बल्कि अपनी सामर्थ्य भर उन्होंने इस पर अमल भी किया है.

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हाल के समय में राजनीतिक दार्शनिक जूडिथ श्कलर हमें इस बारे में आगाह करने वाली पहली शख्स थीं कि क्रूरता के पीछे कुछ भी स्वाभाविक नहीं है. वास्तव में क्रूरता सभी दोषों से ऊपर है.

अपने संक्षिप्त लेकिन सशक्त निबंध, पुटिंग क्रुएल्टी फर्स्ट, में श्कलर ने कम से कम तीन बड़े प्वाइंट सामने रखे हैं. सबसे पहला, क्रूरता की अहमियत इसलिए नहीं है क्योंकि ये हर जगह है और बदशक्ल है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि यह मानव व्यवहार पर मानवीय फैसले से जुड़ी है. इस पर तो भगवान या फिर भाग्य या नियति की भी आवाज नहीं उठ सकती. दूसरा, क्रूरता मानवता को किसी अन्य बुराई की तुलना में ज्यादा नीचे गिरा सकती है. और अंतत: सबसे महत्वपूर्ण बात, क्रूरता ‘कारगर’ होती है क्योंकि इसे कुछ सुरक्षात्मक हथियार मिले हुए हैं. जबसे मैक्यावली के कुटिलतापूर्ण विचार शासकों और राजाओं के लिए आदर्श बने, तब से राजनीति या सत्ता ने सिद्धांतों और नैतिकता को ताक पर रख दिया. शक्ति और प्रसिद्धि हासिल करने की शासकों की अनथक कोशिशों ने उन्हें विशेष तौर पर क्रूर बना दिया.

हालांकि, शासकों में क्रूरता केवल आत्म-मुग्धता के कारण ही संभव है. हम साधारण शब्दों में इसे भव्यता को लेकर भ्रम की स्थिति कह सकते हैं जो अक्सर बहुत गहरे तक जड़ें जमाए होती है. इस तरह के भ्रम की खास बात यह है कि कई बार पीड़ितों के दुख को भी अपने शासक के प्रति प्रेम समझ लिया जाता है. यह तो अब न असामान्य है और न ही अप्रासंगिक है कि प्रधानमंत्री मोदी की जन लोकप्रियता को अक्सर ज़हरीली भक्ति तक कहा जाने लगा है.

मोदी भी तेजी से फैलती महामारी और मौतों के बीच अपनी विरासत समृद्ध करने या सालों-साल अमर रहने का आधार बनाने में जुटे हैं. हर दिन कोविड के कारण मौतों का आंकड़ा 4,000 से अधिक होने के बावजूद 2 बिलियन डॉलर की लागत वाली सेंट्रल विस्टा परियोजना पर काम जारी रहना प्रधानमंत्री की प्राथमिकता का सबूत है.

नदियों में तैरते शव और घाटों और अन्य जगहों पर जलती चिताएं, जैसा कि अनुमान है, कुछ समय बाद मिट जाएंगी. लेकिन सियासी राजधानी में मोदी के सांचे में ढले नए स्मारक मजबूती से आकार लेते जाएंगे और आने वाले समय में कायम भी रहेंगे. एक तरफ जहां श्मशान और कब्रिस्तान के लिए जगह की कमी पड़ रही है, वहीं भारत की सबसे महत्वपूर्ण जगह पर अतीत को मिटाकर भारत के दीर्घकालिक इतिहास में मोदी की मौजूदगी को दर्ज कराने के लिए दिन-रात खुदाई चल रही है. ऐसे में सेंट्रल विस्टा मृतकों का एक स्मारक जैसा लगने लगा है.


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औपनिवेशिक क्रूरता के खिलाफ थे गांधी

भारत तो पहले भी यही था. अकाल, अन्य महामारियों के अलावा 1918 की इन्फ्लूएंजा महामारी, छोटी-बड़ी अनगिनत जंग के बीच दो विश्व युद्धों ने औपनिवेशिक साम्राज्य को बहुत सारी मौतों का गवाह बनाया. अभी की तरह उस समय भी साम्राज्य की शक्ति को प्रतिबिंबित करने के लिए दिल्ली का स्वरूप बदला जा रहा था.

इस क्रूरता को नजदीकी से देखकर महात्मा ने अपनी राजनीति के जरिये इसका जवाब दिया. जगजाहिर है कि गांधी ने सिद्धांत और नैतिकता की ऐसी राजनीति को धार दी जिसे सिर्फ विशुद्ध राजनीतिक आकलनों या साधारण रूप से शासन करने तक सीमित नहीं रखा जा सका. वास्तव में महात्मा ने अपनी राजनीति से मौतों की गरिमा लौटाई. औपनिवेशिक शासन की क्रूर अनदेखी के कारण मौतों के साथ बर्बरता और उपेक्षा हो रही थी.

गांधीजी ने अपनी वैचारिकतापूर्ण राजनीति में मौत को मुख्यत: गरिमामय और ऊंचा स्थान देकर अपनी राजनीति का आधार बनाया. अंग्रेजों ने व्यापक उदासीनता दिखाते हुए अकाल के कारण हुई मौतों को अज्ञातों और आंकड़ों के तौर पर दर्ज करके निश्चित तौर पर मरने वालों के साथ अमानवीय व्यवहार किया था. इसके विपरीत, गांधी ने मृत्यु को सर्वोच्च व्यक्तिगत क्षमता के तौर पर सामने रखा. गांधी के लिए मृत्यु ही एकमात्र संपत्ति थी जो किसी व्यक्ति की अपनी थी. मौत को गले लगाने को आत्म बलिदान का दर्जा देकर गांधी ने निरंतर ताकत और अपना लाभ खोजने वालों के खिलाफ नैतिक सिद्धांतों को ऊंचाई पर पहुंचाया.

बलिदान बड़ा या छोटा हो सकता है. उपवास की व्यक्तिगत आदतों के जरिये किसी को भूखे होने पर भी संतुष्ट रहना सिखाना उनकी राजनीति का एक प्रमुख उदाहरण था. वास्तव में उपवास और भूख पर काबू पाना सीधे तौर पर औपनिवेशिक शासन के भूख के खेल में सामूहिक मौतों को रोकने का उपाय था. इस तरह भूख के व्यक्तिगत अनुभव ने आंकड़ों के कमजोर तर्क की जगह ले ली. ऐसी राजनीति ने क्रूरता के कारण मृत्यु के प्रति उदासीनता को अस्वीकार कर दिया.

मृत्यु को गरिमामयी बनाने वाला गांधी का पूरा दर्शन केवल नैतिक साहस पर आधारित था. यही मुख्य विचार था जिसने सुनिश्चित किया कि ‘राजनीति सामान्य’ हो या फिर सत्ता, हित और गौरव हासिल करने के पीछे भागने वाली, और जैसा कि हुआ एक सदी से ज्यादा समय तक कायम रहे उपेक्षा और क्रूरता के साम्राज्य का खात्मा हो गया.

निश्चय ही आज हमारे बीच कोई महात्मा नहीं है. लेकिन गांधी का यह महत्वपूर्ण सबक कि क्रूर शक्ति के खिलाफ केवल गरिमा के लिए ही जान देना सार्थक है, अब से ज्यादा शायद कभी प्रासंगिक नहीं रहा. सामूहिक मौतों के प्रति राजनीतिक उदासीनता विशुद्ध रूप से क्रूरता है.

आम लोगों की सोच को सकारात्मक रखने के लिए कहना या फिर यह बताना कि महामारी एक ‘अनदेखे दुश्मन’ का काम है, जिसके खिलाफ सरकार दुर्भाग्यवश बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही, यह स्वीकार करना ही है कि सरकार वास्तव में नाकाम हो चुकी है. सबसे बड़ी बात यह विफलता नहीं बल्कि अत्याचार है.

सरकार के अत्याचारों को सामने लाने, दोषी ठहराए जाने और दंडित किए जाने की आवश्यकता है. इससे ही भारत के लिए अभिशाप बनी मौतों को सम्मान मिल सकता है. शासन फिर सफलता हासिल कर सकता है. लेकिन मोदी को अब और ज्यादा बर्दाश्त करने का मतलब क्रूरता को स्वीकार करना होगा.

(श्रुति कपिला कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री और ग्लोबल पॉलिटिकल थॉट के बारे में पढ़ाती हैं. ट्विटर हैंडल @shrutikapila है. व्यक्त विचार निजी हैं.)

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