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Tuesday, 23 April, 2024
होममत-विमत3 चुनाव, 3 पार्टियां, 3 नतीजे- यह BJP, AAP और कांग्रेस के लिए थोड़ा खुश, थोड़ा दुखी होने का मौका है

3 चुनाव, 3 पार्टियां, 3 नतीजे- यह BJP, AAP और कांग्रेस के लिए थोड़ा खुश, थोड़ा दुखी होने का मौका है

जैसे मोदी गुजरात के बाहर इतने ज्यादा वोट बटोरने वाले नहीं हैं, उसी तरह केजरीवाल के लिए भी दिल्ली से बाहर ऐसा कर पाना बहुत मुमकिन नहीं है. और हिमाचल में गांधी परिवार एक तरह से मौजूद ही नहीं था, लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने एकजुट होकर जंग जीत ही ली.

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तीन चुनाव— दो राज्यों के और एक प्रमुख नगर निगम का—सम्पन्न हुए. इन तीनों के नतीजे हमारी तीनों अखिल-राष्ट्रीय पार्टियों के भविष्य पर असर डालने वाले हैं. वैसे अलग-अलग देखें तो इन तीनों चुनावों के नतीजे एक स्पष्ट तस्वीर सामने रखते हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर बात करें तो कुछ पेचीदा तस्वीर उभरकर सामने आती है.

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए इसका कोई सुस्पष्ट विश्लेषण कर पाना मुश्किल है, और ऐसे कोई तीन केंद्रीय निष्कर्ष भी सामने नहीं आते जिनसे आप इन्हें सीधे तौर पर एक-दूसरे से जोड़ पाएं. भारतीय राजनीति वैसे कभी इतनी सीधी-सपाट नहीं रही. फिर भी, कह सकते हैं कि नतीजे तीनों ही दावेदारों के लिए मिले-जुले अनुभव वाले रहे हैं.

आइए, भारत में सियासी मैदान के सबसे बड़े महारथी भाजपा से शुरू करें. गुजरात में इसकी एकतरफा जीत ने 1985 में माधव सिंह सोलंकी के बनाए सबसे बड़े रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया. यह पार्टी के लिए जश्न मनाने की एक बड़ी वजह है. जीत का अनुमान तो पहले से ही लगाया जा रहा था, यहां तक कि उसके विरोधी भी ऐसा मान रहे थे. हालांकि, दिल्ली (एमसीडी) और हिमाचल प्रदेश—जो पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का गृह राज्य है—की हार ने जरूर निराश किया है.

गुजरात में आंकड़े बेहद शानदार रहे हैं. यह लेख लिखने के समय तक मतगणना का अंतिम दौर चल रहा था लेकिन पार्टी पहले ही 52-प्लस का वोट प्रतिशत हासिल कर चुकी थी जो 2017 में 49 फीसदी से थोड़ा अधिक है. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार पांचवे चुनाव में भी वोट प्रतिशत बढ़ना पार्टी के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है. हालांकि, यही अंतिम बिंदु एक कड़ा रियल्टी चेक है.

एक ही चुनावी मौसम में, एक राज्य में तो भाजपा ने मोदी और सिर्फ मोदी के नाम पर अपना परचम लहरा दिया और शानदार जीत हासिल की. वहीं, दूसरे राज्य हिमाचल प्रदेश में मोदी के नाम का जलवा नहीं दिखा. वो भी तब जब खुद मोदी ने सियासी स्थिति भांपकर अपनी प्रतिष्ठा तक दांव पर लगा दी थी. उन्होंने खुलकर यह कहने से भी परहेज नहीं किया था कि उम्मीदवार मत देखिये. केवल सिंबल देखें और मेरे नाम पर वोट करें. अगर गुजरात में लोग केवल मोदी के नाम पर वोट करते हैं और हिमाचल में उनके बार-बार कहने के बावजूद लोग उनके नाम पर वोट नहीं करते, तो यह भाजपा को साफ तौर पर यही बताता है कि मोदी के करिश्मे की भी कुछ सीमाएं हैं.

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एमसीडी चुनाव में मोदी ने प्रचार भले ही नहीं किया लेकिन उनके नाम का खुलकर इस्तेमाल किया गया. पार्टी ने संपत्ति कर बकाएदारों के जुर्माने और बकाये की राशि माफ करने पर धन्यवाद जताते हुए मोदी के बड़े पोर्ट्रेट वाले होर्डिंग्स भी लगाए थे. लेकिन यह कवायद भी हवा का रुख नहीं बदल पाई. ये तथ्य, कि मोदी जब सीधे तौर पर खुद मैदान में न हों या चुनाव उनके गृह राज्य का न हो तो उनकी वोट बटोरने की क्षमताएं भी सीमित हैं, भाजपा को थोड़ा परेशान कर सकता है, खासकर तब जब 2023 में उसे पांच प्रमुख राज्यों कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में चुनाव में उतरना है. इनमें पहले चार राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होना है.


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भीख-उधार और चोरी-छिपे अपने पाले में लाए गए विधायकों के साथ मिलकर बनी कर्नाटक की मौजूदा भाजपा सरकार शायद अभी देश में सबसे अलोकप्रिय है. सीधे तौर पर कटाक्ष में न लें तो मुख्यमंत्री का कद बहुत हल्का है. हर कोई एक-दूसरे से लड़ रहा है और कांग्रेस फिलहाल एकजुट बनी हुई है. अगर भाजपा मई में प्रस्तावित यह चुनाव हार जाती है तो यह एक बड़ा झटका होगा. मोदी इसके एकमात्र वोट-कैचर हैं. और भाजपा यह देखते हुए थोड़ी चिंतित तो होगी ही कि कैसे हिमाचल के नतीजे ने यह साफ कर दिया है कि अपने गृह राज्य को छोड़कर चुनावों में उनके करिश्मे की अपनी सीमाएं हैं.

तथ्य यह भी है कि 2018 की सर्दियों के बाद से किसी भी बड़े राज्य चुनाव (गुजरात और उत्तर प्रदेश को छोड़कर) में मोदी बहुमत हासिल नहीं कर पाए हैं. कर्नाटक (2018), हरियाणा, झारखंड में 2019 और फिर पश्चिम बंगाल. यह हतोत्साहित करने वाली सीमा 2023 में भी भाजपा की राजनीति और पसंद-नापसंद पर असर जरूर डालेगी. क्या यह एमपी में शिवराज सिंह चौहान को डंप करने का जोखिम उठा पाएगी, जैसा कि वह चाहती है और जैसा कि राज्य में सुपर-वोकल पसंदीदा नेताओं की मांग रही है?

क्या यह राजस्थान में वसुंधरा राजे को दरकिनार करने की हिम्मत कर सकती है? हम जानते हैं कि उसे ऐसा करना पसंद आएगा लेकिन इसके क्या नुकसान हैं? और छत्तीसगढ़ में अगर रमन सिंह नहीं—जिनके बारे में इसकी कोई खास मजबूत राय नहीं है—तो और कौन? जब नेता का नाम ही आपको जिताने के लिए काफी हो जाए, जैसा मोदी के कारण लोकसभा या गुजरात चुनाव में होता है, तो आपके सारे दोष भुला दिए जाते हैं. या, कुछ उसी तरह जैसा हम कहते हैं, ‘सात खून माफ.’ लेकिन जब ऐसा नहीं होता? वह तेलंगाना के मैदान में उतरने से पहले कितना आश्वस्त हैं, जो कि बहुत लुभा रहा है? हिमाचल और कुछ हद तक एमसीडी ने इस सच्चाई को सामने ला दिया है.

हम इस विश्लेषण के क्रम में आप को कांग्रेस से आगे सिर्फ इसलिए रखना चाहेंगे क्योंकि यह एक उभरती राजनीतिक ताकत है. वैसे इस मामले में यह पूरी तरह खरी नहीं उतरती. हम जानते हैं कि उसके नेता अरविंद केजरीवाल ने पूरे गर्व से ऐलान किया है कि गुजरात में अपने साधारण प्रदर्शन के बावजूद आप ने एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने की योग्यता हासिल कर ली है. लेकिन इतने तामझाम के साथ प्रचार और भारी-भरकम खर्च के बाद महज चार-पांच सीटें हासिल करना निर्रथक नजर आता है.

एमसीडी चुनाव में जीत एक बड़ी सफलता है, भले ही कुल सीटों के मामले में वो एग्जिट पोलर्स के पूर्वानुमानों से काफी पीछे ही रही और भाजपा अपने संख्याबल के बूते उसके लिए परेशानियां खड़ी करने की स्थिति में आ गई है. खासकर यह देखते हुए कि नगरपालिका सदन में दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होता और मेयर का चुनाव सीधे तौर पर होता है. इसके अलावा, मोदी सरकार की तरफ से पारित नए कानून के तहत तो एमसीडी की अधिकांश शक्तियां भी छिन चुकी हैं.

आप के लिए पहला बड़ा सबक यही है कि जिस तरह मोदी गुजरात के बाहर इतने ज्यादा वोट बटोरने वाले नहीं हैं, उसी तरह केजरीवाल के लिए भी दिल्ली के बाहर ऐसा कर पाना आसान नहीं है. मोदी के लिए उत्तर प्रदेश की तरह, केजरीवाल के पास पंजाब अपवाद है. वैसे भी इन दोनों राज्यों की अपनी-अपनी खासियतें भी हैं.

पंजाब की सीमा से ही सटे हिमाचल प्रदेश में आप को महज 1 फीसदी वोट मिलना इसे पुख्ता तरीके से स्पष्ट करता है. यहां तो उसके सभी उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई है. इसलिए, यह चुनाव केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेरने वाला भी है. कम से कम निकट भविष्य में तो है ही, हालांकि हम उन्हें निरंतर कोशिश करते रहने वाले के तौर पर जानते हैं. इसी ने उनकी पार्टी को कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर स्थापित भी किया है. गुजरात में इसे मिले लगभग 13 प्रतिशत वोट और कांग्रेस को मिले 28 प्रतिशत को जोड़ दिया जाए तो आंकड़ा 41 फीसदी होता है और 2017 में कांग्रेस ने लगभग इतना ही वोट प्रतिशत हासिल किया था.

क्या इसने केजरीवाल-आप की विचारधारा मुक्त राजनीति की सीमाओं को भी उजागर कर दिया है? दिल्ली में मुस्लिम और दलित वोटों में दिखी गिरावट इसका एक संकेत भर है. लेकिन, क्या आप मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, यह मुफ्त-वह मुफ्त के आधार पर राष्ट्रव्यापी राजनीति में अपनी राह बना सकते हैं? आप इनके साथ कितनी दूर जा सकते हैं जब हर कोई इसी तरह मुफ्त बांटने की होड़ में लगा है. यहां तक कि जो लोग इन्हें ‘रेवड़ी’ बताकर खारिज करते हैं, वो भी ऐसे उपहारों की पेशकश से नहीं चूकते. अब यह किसी का कॉपीराइट नहीं रहा है. कुल मिलाकर, अभी तो यह केजरीवाल की 2024 में मोदी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनने की महत्वाकांक्षा के लिए एक झटका ही है. बहरहाल, अभी 16 महीने बाकी हैं.

अब कांग्रेस की बात करें तो नतीजे सही मायने में यही बताते हैं कि मीठा और कड़वा अनुभव एक साथ कैसे होता है. गुजरात में तो इसे इतनी बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा कि कम से कम नेता विपक्ष का पद हासिल करने लायक 19 सीटें भी हासिल नहीं हो पाईं. दिल्ली-पंजाब की तरह यहां भी जो वोट उसने गंवाए, वे एक नए चैलेंजर के खाते में गए हैं. और यह उसकी दुर्दशा दिखाने वाली एक कड़वी सच्चाई है. तो, क्या गुजरात में संगठित तरीके से चुनाव प्रचार न करके पार्टी ने गलती की? क्या गांधी परिवार का चुनाव अभियान से किनारा कर लेना उसके लिए नुकसानदेह साबित हुआ?

अब, जरा हिमाचल का रुख करें. वहां आम तौर पर गांधी परिवार चुनाव परिदृश्य से नदारद ही था. लेकिन पार्टी के पास स्थानीय वरिष्ठ नेता थे जो एकजुट होकर लड़े. दूसरी तरफ, भाजपा को बड़े पैमाने पर आंतरिक असंतोष झेलना पड़ा और एक छोटे से राज्य में उसे अपने ही 19 बागी उम्मीदवारों से कड़ी चुनौती मिली. बहरहाल, कांग्रेस को तोहफे में अंतत: एक पूर्ण राज्य की सत्ता मिल गई है, भले ही वह कितना ही छोटा क्यों न हो.

गौर करने लायक बात यह है कि 2018 की सर्दियों के बाद से यह पार्टी की पहली चुनावी जीत है. यद्यपि प्रियंका गांधी ने कुछ रोड शो किए थे, लेकिन यह जीत आमतौर पर गांधी परिवार के बिना हासिल की गई है. तो क्या गांधी परिवार की चुनावी अप्रासंगिकता ही कांग्रेस पार्टी के लिए मुख्य सबक है? गांधी आपको जीतने लायक वोट नहीं दिला सकते; वे आपको मोदी-बनाम-राहुल की लड़ाई में उलझा देते हैं. लेकिन वे पार्टी और उसकी विचारधारा को एक साथ रखकर निश्चित तौर पर काफी अहम योगदान करते हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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