बांग्लादेश 5 अगस्त 2024 को अपने आज़ादी के बाद के इतिहास के सबसे गंभीर दौर में दाखिल हुआ. प्रधानमंत्री शेख हसीना को गैरकानूनी तरीके से हटाया गया और 8 अगस्त 2024 को मोहम्मद यूनुस की एक ऐसी सरकार बनाई गई, जिसे जनता ने नहीं चुना था और जिसे बाहर से तैयार किया गया था. इससे संविधानिक व्यवस्था टूट गई और राज्य व नागरिक के बीच नैतिक रिश्ता कमजोर पड़ गया. इस का सबसे गहरा असर हिंदू समुदाय पर पड़ा है, जिनका दुख तब से लगातार, एक तय पैटर्न में और बड़े पैमाने पर नजरअंदाज किया गया है.
पिछले सोलह महीनों से ज़्यादा समय से देश भर के हिंदू परिवार एक तरह की खामोश घेराबंदी में जी रहे हैं. उनके घर तोड़े गए, मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया, रोज़ी-रोटी छीनी गई और डराने-धमकाने व निशाना बनाकर की गई हिंसा से उनकी ज़िंदगी दहशत में डाल दी गई. ये अलग-अलग जगहों पर हुई बिखरी घटनाएं नहीं हैं. ये एक लगातार चल रहे उत्पीड़न को दिखाती हैं, जिसे सरकारी सुस्ती ने बढ़ावा दिया है. जब सत्ता चुप रहती है, तो वह चुप्पी मिलीभगत बन जाती है और लापरवाही एक चलन का रूप ले लेती है.
यूनुस द्वारा बैठाई गई कठपुतली सरकार, जिसके पास न तो जनता का जनादेश है और न ही संविधानिक वैधता, ने सुरक्षा की बार-बार की गई अपीलों के प्रति चिंताजनक उदासीनता दिखाई है. सरकार की प्रतिक्रियाएं कभी फाइलों में टालने तक सीमित रहीं, तो कभी सीधे इनकार में बदल गईं. बराबरी, धर्मनिरपेक्षता और मानव गरिमा पर बनी एक गणराज्य में ऐसा रवैया सिर्फ प्रशासनिक नाकामी नहीं, बल्कि देश के मूल मूल्यों से गद्दारी है.
जवाबदेही के इस खालीपन ने कट्टरपंथी और उग्र नेटवर्कों को हौसला दिया है, जिनमें जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी छात्र शिबिर और उनके नए नामों से चल रहे संगठन शामिल हैं. ये समूह अलग-अलग नामों के तहत डर और धमकी की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं. उनका मकसद साफ है. बहुलतावाद को कमजोर करना और बांग्लादेश को एक ऐसे एकरूप धार्मिक राज्य में बदलना, जहां अल्पसंख्यक अधिकार से नहीं, बल्कि बर्दाश्त किए जाने के भरोसे जिएं.
एक नेशनल इमरजेंसी
इस त्रासदी को इतिहास की एक कड़वी विडंबना और गहरा करती है. हिंदू बांग्लादेश के बाहर के लोग नहीं हैं. वे इसके निर्माण के सह-निर्माता हैं. मुसलमानों, बौद्धों, ईसाइयों और आदिवासी समुदायों के साथ मिलकर उन्होंने 1971 की मुक्ति संग्राम में लड़ाई लड़ी थी. पड़ोसी भारत के निर्णायक समर्थन से यह देश एक धर्मनिरपेक्ष, मानवीय और समावेशी राष्ट्र के रूप में उभरा था. आज उसी संस्थापक समुदाय को बेदखल किया जाना, आज़ादी के लिए दिए गए बलिदानों को नकारने जैसा है.
आज का बांग्लादेश एक गहरी और उदास अंधेरे में उतरता जा रहा है, जहां डर फैला हुआ है और इंसाफ लड़खड़ा रहा है. जिन संस्थाओं की जिम्मेदारी बहुलतावाद की रक्षा करने की है, वे या तो जड़ हो चुकी हैं या राजनीति की गिरफ्त में हैं. पुलिस आंखें फेर लेती है. अफसर हिचकिचाते हैं. सत्ता में बैठी व्यवस्था नागरिकों की सुरक्षा से ज्यादा बाहरी सरपरस्ती को तरजीह देती दिखती है. ऐसे हालात भरोसे को खोखला करते हैं और बेखौफ अपराध को सामान्य बना देते हैं.
लेकिन निराशा को किस्मत नहीं बनना चाहिए. बांग्लादेश का इतिहास बार-बार यह साबित करता है कि यह देश नागरिक साहस के जरिए डर को मात देने की ताकत रखता है. हिंदुओं पर हो रहा उत्पीड़न किसी एक समुदाय की समस्या नहीं है. यह एक राष्ट्रीय आपातकाल है. जब किसी एक समुदाय को निशाना बनाया जाता है, तो पूरी गणराज्य घायल होती है. आज की खामोशी कल और बड़े अत्याचार को न्योता देती है.
उबरने के लिए ज़मीर को दोबारा जगाना होगा. नागरिक समाज, विद्वानों, पत्रकारों और आम लोगों को साफ और लगातार नैतिक आवाज़ में बोलना होगा. डर को सीख से बाहर करना होगा. 1971 की भावना — धर्मनिरपेक्ष, समावेशी और उत्पीड़न के खिलाफ खड़ी — को सिर्फ यादों में नहीं, व्यवहार में फिर से जिंदा करना होगा. बांग्लादेश नरसंहार और तबाही से इसलिए नहीं उठा था कि वह कट्टरता का मंच बने या विदेशी दखल का प्रयोगशाला बने. यह देश सबके लिए गरिमा सुनिश्चित करने के लिए पैदा हुआ था.
हिंदू नागरिकों का दुख देश की सामूहिक इज़्ज़त पर एक दाग है. इस दाग को मिटाने के लिए उदासीनता के खिलाफ खड़ा होना होगा, कट्टरता को ठुकराना होगा और संविधानिक वैधता समेत नैतिक शासन को बहाल करना होगा. तभी बांग्लादेश इस साये से बाहर निकलकर अपने इतिहास और अपने वादे के प्रति सच्चा बन सकेगा.
इन पंक्तियों को लिखते वक्त गम मुझे डुबो रहा है. साझा संघर्ष से जुड़े दोस्त चुपचाप अपना वतन छोड़ रहे हैं, टूटे सपनों के साथ. दर्द इसलिए और गहरा है क्योंकि 1971 में हमने पाकिस्तानी सेना और उसके स्थानीय सहयोगियों — जिनमें जमात-ए-इस्लामी और अल-बद्र शामिल थे — के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी. एक साथी स्वतंत्रता सेनानी, बाबुल सरकार, ने अपनी जान दे दी ताकि बांग्लादेश आज़ाद हो सके. उनका और अनगिनत लोगों का बलिदान इस मिट्टी को पवित्र बनाता है.
आज उन्हीं ताकतों के वैचारिक वारिस, अलग-अलग शाखाओं के जरिए काम करते हुए, देश को मध्ययुगीन अंधेरे की ओर घसीट लाए हैं, जहां डर ज़मीर पर भारी है और क्रूरता को धर्म का रूप दिया जा रहा है. एक अग्रिम पंक्ति के स्वतंत्रता सेनानी के रूप में, मैं लगातार खतरे में जी रहा हूं. साधारण यात्राएं भी सतर्कता की परीक्षा बन गई हैं. यह उन लोगों के लिए एक कड़वा इनाम है, जिन्होंने कभी इस गणराज्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था.
अंतरराष्ट्रीय नियम और संधियां, जिनका बांग्लादेश हिस्सा है, सुरक्षा, जांच और न्याय की साफ जिम्मेदारियां तय करती हैं. इन दायित्वों को निभाने में नाकामी से देश की साख को नुकसान, आर्थिक असर और कानून के राज के कमजोर पड़ने का खतरा है. क्षेत्रीय स्थिरता भी तब प्रभावित होती है, जब अल्पसंख्यकों पर अत्याचार विस्थापन और असंतोष को बढ़ाता है.
इसलिए एक सिद्धांत आधारित रास्ता नैतिकता को हित से जोड़ता है. अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से संप्रभुता मजबूत होती है, सामाजिक एकता बढ़ती है और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता कायम रहती है. साथ ही यह देश के नागरिकों और दुनिया के सामने बांग्लादेश की संविधानिक प्रतिबद्धताओं को दोहराता है. ऐसा कदम मुक्ति संग्राम के आदर्शों का सम्मान करता है और पूरे देश में जवाबदेह संस्थाओं के जरिए दंडहीनता को रोकता है.
वक्त कम है, लेकिन सुधार अब भी मुमकिन है. बांग्लादेश का भविष्य उस साहस का इंतजार कर रहा है, जिसकी जरूरत उसे हासिल करने के लिए है.
अनवर ए खान 1971 के बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानी हैं और ढाका में रहने वाले एक स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक हैं. वह राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर लिखते हैं. विचार निजी हैं.
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