Monday, 27 June, 2022
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बैंकों को सरकारी चंगुल से मुक्त कराने का साहस दिखाएं मोदी

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अगर प्रधानमंत्री मोदी सचमुच अपनी कुछ विरासत छोड़ जाना चाहते हैं तो बैंकों के राष्ट्रीयकरण के इंदिरा गांधी के फैसले को पलटें.

भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जिमी नागरवाला को 60 लाख रु. दिए जाने से लेकर पंजाब नेशनल बैंक द्वारा नीरव मोदी को 11,000 करोड़ रु. दिए जाने तक भारत में सरकारी बैंकों में घोटालें का इतिहास 47 साल पुराना रहा है. आपमें से कई को उबाने का खतरा मोल लेते हुए मैं एक पुरानी कहावत दोहराना चाहूंगा कि किसी संकट को यों ही मत गंवाइए. लेकिन इस कहावत पर प्रायः इसलिए अमल नहीं किया जाता कि इसके लिए हिम्मत चाहिए. यह नौकरशाहों, वक्त काटने वालों या जोखिम से बचने वालों के बस में नहीं है. हम इसकी याद फिर से इसलिए दिला रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इनमें से नहीं हैं. इंदिरा गांधी के बाद हमारी राजनीति में भारी जोखिम उठाने वाला दूसरा कोई नहीं नजर आता. दिलचस्प बात यह है कि हम उनसे जिस दुस्साहस की अपेक्षा कर रहे हैं वह और किसी के नहीं बल्कि इंदिरा गांधी के ही सबसे जोखिम भरे और विनाशकारी कदम को उलटने का है.

अपने समाजवादी जुनून में इंदिरा गांधी ने 1969 में कांग्रेस को तोड़ने के बाद बड़े व्यावसायिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण की नाटकीय घोषणा की थी. 1991 के आर्थिक सुधारों को लागू करने तक और भी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. बीमा कंपनियों से लेकर विकास वित्त संस्थानों (डीएफआइ) को सरकारी कब्जे में डाल कर उन्होंने भारत के औपचारिक वित्तीय व्यवस्था को सरकारी नियंत्रण में डाल दिया. अपने इस फर्जी, धन विनाशक समाजवाद का उन्हें पुरस्कार भी मिला. उन्होंने गरीबों को एहसास करा दिया कि वे अमीरों पर लगाम कस रही हैं, उनके लिए कुछ कर रही हैं और चुनाव दर चुनाव जीतती चली गईं.

लेकिन वैसा कुछ हुआ नहीं, गरीब बेवकूफ बनते रहे और वे चुनाव जीतती रहीं. समाजवादी समृद्धि कपोल कल्पना बनती गई और 1973 में (योम किप्पुर युद्ध के बाद) तेल संकट आ गया. इसके साथ ही कुछ और कारणों से मुद्रास्फीति की दर चढ़कर 20 के स्तर पर पहुंच गई. उनकी अर्थनीति का फरेब खुल कर सामने आ गया. उसके बाद से 40 वर्षों तक भारत उनके जुनूनी समाजवादी दौर के कारण झुलस चुकी धरती को उपजाऊ बनाने की जद्देजहद में जुटा रहा. उनक भी अपनी गलती का एहसास हुआ मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी, जैसा कि मैं अपने इसी स्तंभ में बता चुका हूं.

राजनीति का इतिहास बताता है कि राज्यतंत्रीय लोकलुभावनवाद कितना आसान, जोखिम मुक्त और आकर्षक लगता है और इसे उलटना कितना चुनौतीपूर्ण, जोखिम भरा और आम तौर पर अलोकप्रिय होता है. सबसे साहसी सुधारक ही ऐसे पंगे लेते हैं या कहें तो बारूदी सुरंगों से पटे रास्ते पर चलते हैं. नरसिंहराव और मनमोहन सिंह ने 1991 में और अटल बिहारी वाजपेयी तथा यशवंत सिन्हा एवं जसवंत सिंह ने बाद में यही किया.

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मोदी से उम्मीद थी कि वे कुछ और नाटकीय करेंगे. उन्हें दिवालिया हाल में वे बैंक मिलें जिन्हें इंदिरा ने अधिग्रहीत किया. चार साल बाद वे उनमें और नई पूंजी डालेंगे. इस तरह करदाताओं का और पैसा सबसे भ्रष्ट तथा बेलगाम अमीरों को दिए जाने वाले बुरे कर्जों पर बरबाद होगा.

भारत के 21 सरकारी बैंक आज भी देश की वित्तीय व्यवस्था के लिए केंद्रीय महत्व रखते हैं. कुल भारतीय बाजार में उनका हिस्ता 55 से 60 फीसदी तक है. इनमें अधिकतर शेयर बाजारों में सूचीबद्ध हैं. लेकिन सांसें रोक कर इस तथ्य पर गौर कीजिए कि सम्मानित भारतीय स्टेट बैंक समेत इन सबकी कुल बाजार पूंजी एचडीएफसी बैंक की बाजार पूंजी से आज 50,000 करोड़ रु. से भी कम है जबकि उसे बने अभी 23 साल ही हुए हैं.

सरकारी बैंकों ने कितना धन बरबाद किया है, इसकी यह एक बानगी है.

किसी भी कंपनी के शेयरधारक से पूछ लीजिए. अगर आपका प्रबंधन आपके पैसे को लेकर इतना लापरवाह है तो क्या आप उस कंपनी को छूना भी चाहेंगे? आप यह चाहेंगे, तभी जब आप सरकार हों. तब तो आप विनाश को और मुकम्मिल करने के लिए और भी पैसे उसमें लगा देंगे. क्यों? क्योंकि आप जानते हैं कि यह आपका पैसा नहीं है. पैसा तो कमजोर, नासमझ मूर्खों का है. तो मैं यह भ्रम पैदा करने के लिए और भी पैसे फूंकूगा कि इससे बाद में लाभ होगा.

इंदिरा के उत्कर्ष के दिनों में जो कुछ चला वैसा कुछ नहीं चलेगा. ज्वेलर मोदी, फायदा केवल माल्या सरीखे दूसरे अमीर घोटालेबाजों को ही होगा, जो अपने भुगतान योग्य न रह गए अपने कर्जों को भारी छूट पर पटाएंगे. और इसे कर्ज देने वालों का मामूली ‘हेयरकट’ कहना बात को काफी हल्का करके कहना होगा. कई महाजनों का तो तिरुपति स्टाइल मुंडन ही हो जाएगा, सिर्फ चुटिया बच जाएगी.

यह सब इतना गैरबराबरीपूर्ण और अन्यायपूर्ण है कि कुछ वही डिफॉल्टर उन कंपनियों को भारी छूट पर खरीदने की बोली लगा रहे हैं जिन्हें उन्होंने दिवालिया कर दिया था. जरा मोदी की उस ग्रुप फोटो पर गौर कीजिए, जो दावोस में खींची गई थी. इसमें आप इन लोगों में से कुछ को खड़े पाएंगे. तब जरा शब्दकोश में गुस्ताखी का अर्थ खोज लीजिए.

भारतीय बैंकिंग समय-समय पर संकट से गुजरती रही है. ऐसे दौर में भारत के डिफॉल्टरों की बदनाम सूची पर ध्यान दीजिए तो आप पाएंगे कि वही-वही नाम बार-बार आ रहे हैं. इसकी एकमात्र वजह यह है कि वे उन्हीं सरकारी बैंकों में ऐसी परियोजनाओं के प्रस्ताव लेकर बार-बार जाते हैं जिनकी लागत बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई होती है. और वे कर्ज का भुगतान नहीं करते क्योंकि उन्हें पता है कि हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी रही है जिसमें कर्ज तो माफ होते ही रहे हैं.

इन सूचियों में दूसरी समानता यह है कि इन लोगों ने जिन बैंकों में डाका डाला है उनमें कुछ अपवादों को छोड़कर बाकी सारे बैंक सरकारी हैं. यहां तक कि माल्या से निजी बैंकों ने लगभग अपना सारा पैसा वसूल लिया है. इंदिरा की चाहे जो भी मंशा रही हो, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के उनके कदम से गरीबों को तो फायदा नहीं हुआ, बल्कि कई काॅरपोरेटों के लिए शानदार साबित हआ.

इसे दूसरी तरह से भी देखा जा सकता है. अगर, उदाहरण के लिए कर्ज के आकार को ही चुनें तो उसके आधे के बराबर भी सरकारी बैंकों की बाजार पूंजी होती तो भारत सरकार और करदाताओं को करीब 10 खरब रु. का फायदा तो होता ही. यह कहना गरीबों के प्रति अन्याय होगा कि सरकारी बैंक गरीबो या प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज देने के कारण घाटे में रहते हैं. गरीब या मध्यवर्ग तो लगभग पूरे कर्ज का भुगतान कर देते हैं. और जब गरीब लोग या खासकर किसान भुगतान नहीं कर पाते तो सरकार कर देती है ताकि चुनावों के समय वोट खरीदे जा सकें.

फरीद जकारिया ने नई दिल्ली में 13 नवंबर 2008 को वार्षिक जवाहरलाल नेहरू स्मृति व्याख्यान देते हुुए भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की तारीफ की थी कि उन्होंने अमीर देशों के विपरीत विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का असर अपने ऊपर नहीं होने दिया था. उस समय मेजबान के तौर पर बोलते हुए सेनिया गांधी ने इंदिरा गांधी की दूरदर्शिता की जमकर प्रशंसा की थी मानो भारतीय बैंक इस मंदी से केवल इसलिए अछूत रहे क्योंकि वे सरकारी नियंत्रण में थे, न कि इसलिए कि उनका बेहतर नियमन किया गया. सोनिया ने उस साल बाद में हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में भी यही बात दोहराई और लगभग समान विचार वाले श्रोताओं से कहा था, ‘‘मैं जानती हूं कि मैं जो कहने जा रही हूं उसे आप नहीं पसंद करेंगे.’’ गांधी परिवार अपनी सीनियर श्रीमती गांधी की सबसे बड़ी आर्थिक भूल पर इतना गर्व करती हैं कि कोई भी कांग्रेसी सरकार यह संकेत भी देना नहीं चाहेगी कि वह बैंकों के राष्ट्रीयकण को फीका करने जा रही है. लेकिन नरेंद्र मोदी भी इसी भावना में कैद क्यों हैं, यह समझ से परे है.

उनके बारे में सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि वे नेहरू के किए हर काम को उलटना चाहते हैं और उन्हें पूरी तरह से खारिज करना चाहते हैं, लेकिन उनकी बेटी की सबसे अविवेकपूर्ण नीतियों को छूने से कतरा रहे हैं. इसका बैंकों के राष्ट्रीयकरण से ज्यादा साफ उदाहरण नहीं हो सकता. 1969 में उन्होंने इन बैंकों को इसलिए अधिग्रहीत किया था क्योंकि वे अमीरों को पैसे दे रहे थे और गरीबों की अनदेखी कर रहे थे. इस राष्ट्रीयकरण के 50वें वर्ष में ये ही बैंक दिवालिया होने को हैं क्योंकि उन्होंने अमीरों को बिना कुछ पूछेताछे भारी रकम दे दी और कंगाल हो गए. अगर आप आलसी हैं तो भाग्य को दोष दे सकते हैं लेकिन इस नीति को जारी रखने की गलती को और इसके पीछे करदाताओं के 2.11 लाख करोड़ रु. बरबाद करने को क्या कहेंगे?

पंजाब नेशनल बैंक महाराष्ट्र के चीनी बेल्ट में किसी राजनीतिक ठग के कब्जे वाला कोई फालतू, छोटा-मोटा सहकारी बैंक नहीं है. यह देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैैंक है. ताजा घोटाला यही बताता है कि उसे दुनिया के सबसे अमीर चोरों ने इन वर्षों में कंगाल कर दिया है, जिसे न तो तमाम ऑडिटों में पकड़ा जा सका, न सरकार के बोर्ड (खासकर वित्त मंत्रालय) के नामजदों की पकड़ में आया. इस तरह का घपला, लापरवाही, लेखा/ऑडिट की कमजोरी एक भारी राष्ट्रीय शर्म है.

इसलिए मोदी को इसे खारिज कर देना चाहिए, भूल जाना जाना चाहिए. आज यह सबसे लोकप्रिय कदम होगा. और वे जिस परिवार से इतनी नफरत करते हैं उसके दूसरे सबसे महत्वपूर्ण सदस्य को इस सबके लिए जायज तौर पर दोषी ठहराने का उन्हें संतोष भी होगा. यह मौका उन्हे हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए.

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