Monday, 27 June, 2022
होममत-विमतजाते जाते अब निकल ही गया: कैसे नरेंद्र मोदी के हाथों से फिसला सियासी अफसाना

जाते जाते अब निकल ही गया: कैसे नरेंद्र मोदी के हाथों से फिसला सियासी अफसाना

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सरकार के लिए यह कोई असाधारण बात नहीं है कि वह अपने अंतिम या अंतिम के दो सालों में अलोकप्रिय हो। असाधारण क्या है? हमने कभी नहीं सोचा था कि यह सब,मास्टर कम्युनिकेटर नरेन्द्र मोदी के साथ होगा।

महिलाओं के साथ हो रही क्रूरता पे भीषण हो रहे बयानो से हैरान लोग महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा के बारे में नाराज हैं। प्रधानमंत्री कुछ हफ्तों तक चुप्पी साधे रहे, जनता के विरोध के बाद उन्होंने चुप्पी तोड़ दी, लेकिन सरकार के जागने के बाद भी विरोध प्रदर्शन जारी है। अप्रैल 2018, दिसंबर 2012 हो सकता है।

उस समय प्रबलता अधिक थी,लेकिन उदहारण समान है। सरकार नियंत्रण से बाहर हो रही है क्योंकि सियासी तौर पर सरकार की पकड़ खो गई है। प्रत्येक सप्ताह यहाँ पर एक नया संकट खड़ा हो रहा है,इससे सरकार पिछले सप्ताह के अंत से भी बुरी हालत में दिख रही है। हालात अलग हो गए हैं, मूलकारण को पकड़ा नहीं जा सकता। नकारात्मक सुर्खियां प्रधानमंत्री मोदी की छवी से बाहर निकल रही हैं; प्रायः वह संलाप से गैरहाजिर दिखाई देते हैं।

अंतिम या अंतिम दो सालों में अलोकप्रिय होना सरकार के लिए असाधारण बात नहीं है,असाधारण क्या है, जो हमने कभी सोचा ही नहीं था कि यह सब, प्रमुख संचारक, कथा के सुल्तान, प्रतिद्वंद्विओं को असफल करने वाले नरेंन्द्र मोदी, जो आगामी लक्ष्य निर्धारित करते है, जिसने डेमोनेटाइज़शन (नोटबंदी) की विफलता के बावजूद यूपी जीत लिया, और कौन जानता कि कितने सारे दावं अभी भी वह अपनी टोपी से बाहर निकाल सकते है, के साथ होगा।

एक साल पहले, अप्रेल 2017 के आस-पास मोदी सरकार इतनी शसक्त दिख रही थी, कि लोग सोच रहे थे कि यह सरकार हमेशा शासन करेगी। हर कोई कह रहा था कि ये अजेय है।

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उत्तर प्रदेश में तीन-चौथाई के बहुमत से जीतने के बाद, सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुकाबले में सभी विरोधियों का सफाया करने के साथ 2014 के बाद से अभी तक उनके सामने किसी भी प्रकार का कोई राजनीतिक संघर्ष नहीं है और मोदी और शाह की जोड़ी ने अपना दबदबा कायम रखा हुआ है।

31 जुलाई को, पटना के पथिक स्थानीय राजकुमार बाबू नीतीश कुमार,आकर्षण के कारण मुह के बल भाजपा प्रतिक्षित हाथों में गिरने को मजबूर हो गए। 2019 में मोदी को कोई भी हार नहीं सकती, उन्होंने भाजपा को विजयी घोषित करते हुए कहा था।

असली अपराध

ठीक एक महीने बाद 31 अगस्त को 2017-18 की पहली तिमाही के जीडीपी नंबर प्रकाशित किए गए। भारत का सकल घरेलू उत्पाद 5.7% तक गिर गया था, जिसका कारण डेमोनेटाइज़शन का प्रभाव बड़े पैमाने पर दिखाई देना था। यह बिल्कुल स्पष्ट था कि चीजें जल्द ही सुधरती हुई नहीं जा रही थी क्योंकि जल्द ही माल और सेवा कर (जीएसटी) 1 जुलाई से कार्यान्वयित कर दिया गया, जिसके कार्यान्वयन में कुछ कमियां थी, जिसकी वजह से व्यावसायिक गतिविधियों में जाम लग गई और नौकरी सृजन में भी भारी कमीं आई।

यह सब तब शुरू हुआ जब डेमोनेटाइज़शन लागू किया गया, जो एक असली अपराध (बड़ी गलती या सबसे बड़ी चूक ) था। दिल्ली के विद्वानों (पंडितों) ने बताया कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत मिलना डेमोनेटाइज़शन का ही परिणाम है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि 2017 में उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को पता था कि डेमोनेटाइज़शन किसी भी प्रकार के काले धन को बचाने में असफल रहा है। उन्होंने डेमोनेटाइज़शन के विफल हो जाने के बावजूद भी भाजपा को वोट दिया, क्योंकि इसके कुछ अन्य कारण थे।

जीएसटी और डेमोनेटाइज़शन ने लगभग हर चीज को प्रभावित किया है, नौकरियां, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, निजी निवेश, सरकारी राजस्व, उपभोक्ता विश्वास और इसी तरह और भी बहुत कुछ। सरकार खुद को बचाने के लिए आर्थिक आंकड़ों को एकत्रित किया। शब्दों के हेरफेर में कुशल व्यक्ति आपको किसी भी झूठ पर विश्वास करा सकता है सिवाय इसके कि आपकी जेब में कितने पैसे हैं।

सरकार ने राजनैतिक कथाओं को माध्यम से डेमोनेटाइज़शन और जीएसटी की खूबियां फैलाने में कामयाब रही, जबकि सरकार की ये दोनो ही योजनाएं घटिया साबित हुई हैं, केवल तब तक जब तक जीडीपी के आंकड़े सामने नहीं आए थे।
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की शानदार जीत के एक साल के अंदर ही मोदी की लहर सत्ता विरोधी लहर के जालचक्र के सामने फीकी पड़ती हुई नजर आ रही है जिसकी निसंदेह रूप से देश की जनता द्वारा आशा की गई थी।

गुजरते समय के साथ-साथ बीजेपी का राजनीतिक युद्ध लड़ने का खोता हुआ अनुभव

गुजरते समय के साथ-साथ मोदी सरकार बड़े-बड़े नारों के जरिए किए गए अपने बड़े-बड़े वादों को पूरा करने में असफल
रही है।

बेटी बचाओ– जनवरी में एक आठ वर्षीय बक्करवाल लड़की की हत्या मात्र इसलिए कर दी गई थी क्योंकि कथित रूप से उस पीड़ित लड़की के समुदाय को उसी के गांव से बाहर निकालना था। हिंदुत्व समूहों द्वारा आरोपियों के बचाव में विरोध प्रदर्शन किए गए क्योंकि संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था। फिर भी यह मामला अप्रैल में एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा तब बन गया जब वकीलों ने इस मामले से संबंधित आरोप पत्र को अदालत में दायर करने पर प्रतिबंध लगा दिया।

कथित तौर पर पिछले साल जून में उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने एक नाबालिग लड़की से बलात्कार किया था। यह कहानी बड़ी तब बन गई जब कथित तौर पर पीड़िता के पिता की इसी महीने न्यायिक हिरासत में मौत हो गई। बीजेपी सरकार का ‘बेटी बचाओ’ का नारा देना और बेटियों के लिए संघर्ष करने का सिंहनाद अब एक जानबूझकर बोला गया झूठ लग रहा है, क्योंकि कैसे उन्हीं की पार्टी के लोग उन्नाव और कठुआ मामलों में बलात्कारियों को कथित तौर पर बचाते हुए पाए गए हैं।

डिजिटल इंडिया– ऐसी आशंका जताई जा रही है कि बीजेपी द्वारा लांच की गई नरेन्द्र मोदी ऐप का उद्देश्य निजी डेटा का संग्रहण करना था। जो कि हाल ही की एक बड़ी खबर बन गई।

रि-एग्जाम वॉरियर– पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं को लुभाने के लिए, प्रधान मंत्री मोदी ने एक पुस्तक के माध्यम से अपने समय के परीक्षा के तनाव को छात्रों के साथ साझा किया। लेकिन परीक्षा वारियर्स नामक पुस्तक प्रकाशित होने के तुरंत बाद ही, सीबीएसई के प्रश्नपत्रों के लीक होने का मामला सामने आया, जिसने परीक्षा को लेकर छात्रों के तनाव को और अधिक बढ़ा दिया।

सहकारी संघवाद? एक साल पहले, मोदी तमिलनाडु की राजनीति में एक्स फैक्टर (विशिष्ट व्यक्तित्व) बने हुए थे। अब, चेन्नई की जनता निश्चित रूप से मोदी को वापस जाते देखना चाहती है, क्योंकि उसे अब गलत और सही पता है और यहाँ तक कि शहर की सड़कों से गुजरने से भी परहेज किया। कावेरी मुद्दा दक्षिण भारत की परेशानियों का सबसे छोटा मुद्दा है। विशेष-स्थिति वाले वादों के विश्वासघात से परेशान होकर आंध्र प्रदेश के सत्तारूढ़ दल ने भी उन्हें छोड़ दिया। इस बीच, सभी दक्षिण भारतीय राज्यों ने 15 वें वित्त आयोग के खिलाफ एक साथ आना शुरू कर दिया, क्योंकि उनके वित्तीय आवंटन में कटौती की जाने वाली थी।

‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’: अभी तक मोदी सरकार के सबसे खराब आलोचकों को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि सरकार भ्रष्टाचार से मुक्त थी। आरोप सही हैं या नहीं, सरकार उन सवालों के साथ ग्रहणबोध की लड़ाई भी हार गयी जो सवाल पार्टी प्रमुख के उद्यमी बेटे जय शाह और मंत्री पीयूष गोयल के व्यापारिक सौदे के लिए पूछे गये थे। विपक्ष ने भी राफेल फाइटर जेट के सौदे में लीपापोती करने की कोशिश की है।

‘सार्वजनिक पैसे का चौकीदार’: वर्ष 2016 में सरकार की प्रतिष्ठा को थोड़ा नुकसान पहुंचा, जब जानबूझकर बैंक ऋण का गबन करने वाले विजय माल्या, सरकार की लंबी नाक के मातहत लंदन भाग गए। उस पर चौकसी के एक नोटिस को उसे बचाने के लिए चुपचाप संशोधित किया गया था; फिर भी सीबीआई की यह मूर्खता आसानी से भुला दी गयी। लेकिन गुजराती साथी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के आधी रात को पलायन ने मोदी की छवि को अपरिपक्व ढंग से खराब किया जिन्हें सार्वजनिक धन की रक्षा के लिए चौकीदार के रूप में समझा गया था।

‘भगवा अम्बेडकर’: नरेंद्र मोदी ने अंबेडकर की जितनी अधिक प्रशंसा की, उनकी सरकार और पार्टी ने उतना ही दलितों को विमुख कर दिया है। योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में अम्बेडकर की मूर्तियों को तोड़ दिया जाता है, आप कह सकते हैं मायावती की अपेक्षा अधिक तेजी से। यूपी में 2014 और 2017 में भाजपा को वोट देने वाले समुदाय के सदस्य अब समाजवादी पार्टी का समर्थन करते पाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में अम्बेडकर की प्रतिमा के भगवा रंग से रंगे जाने के बाद अम्बेडकर के प्रति सरकार की श्रद्धा निर्लज्ज स्वायत्तीकरण के स्तर तक पहुँच गई।

लोकतंत्र पर सवाल: आई एंड बी मंत्री स्मृती ईरानी ने फर्जी ख़बरों के साथ प्रेस पर प्रतिघात करने के प्रयास किए, जो उन्हें ही उल्टे पड़ गये। सुप्रीम कोर्ट के चार पदासीन न्यायाधीशों की एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये अटकलें लगाई गयीं कि क्या सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर रही थी। आम सहमति के बिना आधार को लोगों पर थोपकर सरकार ने अपनी लोकतंत्र विरोधी छवि को आगे बढ़ाया।

बीजेपी को किस तरह नुकसान हुआ

अपने आलोचकों को भाजपा का बड़ा जवाब है कि यह चुनाव के बाद चुनाव जीत रही है। पूर्वोत्तर में पार्टी का अच्छा प्रदर्शन तब फीका पड़ गया जब भाजपा को तीन दशकों में पहली बार गोरखपुर में हार का सामना करना पड़ा। योगी सरकार की दलितों से अलगाव की भावना ने बहुजन समाज पार्टी को समाजवादी पार्टी के साथ, भाजपा की चुनावी मशीन पर संदेह जताते हुए, गठजोड़ करने को बाध्य किया। भाजपा के अपने समर्थक स्पष्ट रुप से सामने नहीं आए।

गुजरात चुनाव परिणाम एक ऐसी जीत थी जो एक जीत की तरह महसूस नहीं हुई। गुजरात के अपने नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद गुजरात में भाजपा के प्रदर्शन में सुधार होना चाहिए था, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि जब से गुजरात में भाजपा सत्ता में आई, तब से पहली बार उसे 100 से कम सीटों के साथ संतोष करना पड़ा।

गुजरात में भाजपा की यह स्थिति गुजरात के ग्रामीण क्षेत्र में खेतों में आये संकट के कारण हुई। ठीक यही कहानी राजस्थान के उपचुनावों में अजमेर और अलवर में दोहराई गई। कृषि संकट और बेरोजगारी दोनों बड़ी समस्याएं एक कारण बन गईं जो सरकार के बड़े दावों पर भारी पड़ी। यह, किसी और चीज से ज्यादा पार्टी की अपराजेयता और उनकी 2019 की जीत की अनिवार्यता को संदेह के घेरे में लाती है।

2019 आम चुनावों में अभी भी एक साल का समय बाकी है. क्या नरेंद्र मोदी एक फिसलन भरी ढलान पर हैं या क्या वे फिर से उदित हो सकते हैं और चमक सकते हैं?

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