Monday, 27 June, 2022
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दावोस में अपने पहले भाषण में मोदी ने इशारे से चीन और ट्रम्प पर साधा निशाना

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दावोस के भाषण में मोदी द्वारा डेटा को वैश्विक शक्ति की एक नई करेंसी बताना एक प्रमुख मुद्दा था और ऐसा करने वाले यह शायद पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं.

दावोसः जैसे सरकार या राज्यों के प्रमुख आमतौर पर दावोस में भाषण देते हैं वैसे ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसी भी प्रकार के विवाद और सुर्खियों से बचने के लिए अपने भाषण को बहुत सावधानी पूर्वक तैयार किया था. हालांकि, इस सावधानीपूर्ण भाषण के माध्यम से उन्होंने विश्व को कई महत्वपूर्ण संदेश दिए.

मेरी त्वरित व्याख्याओं और विश्लेषणों के अनुसार, उन्होंने बहुत ही चतुराई और सावधानी से चीन तथा डोनाल्ड ट्रम्प की आलोचना भी कर डाली.

मेरे हिसाब से उनके भाषण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वैश्वीकरण सिकुड़ रहा है और यह बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच बढ़ती संरक्षणवादी प्रवृत्तियों के कारण खतरे में है. वे शुल्क और गैर-शुल्क बाधाएं उत्पन्न करके वैश्विक आर्थिक प्रणाली और आपूर्ति श्रृंखलाओं को धमकी दे रहे हैं.

इसे और द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय व्यापार समझौतों को रद्द करने के संदर्भ में मोदी ने ट्रम्प, और इशारे से चीन को भी निर्देशित किया. एक भारतीय प्रधानमंत्री वैश्वीकरण के लिए एक सुदृढ़ भूमिका तैयार रहे हैं जो काफी महत्वपूर्ण है, हालांकि, हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि उनकी ही पार्टी और आरएसएस के संरक्षकों के बीच इसका क्या प्रभाव पड़ेगा.

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जलवायु परिवर्तन को सबसे बड़े वैश्विक खतरे के रूप में सूचीबद्ध करते हुए और ग्लोबल वार्मिंग को संतुलित करने के लिए गरीब देशों के आवश्यक विकास में बेहतर संपन्न देशों की अनिच्छा पर प्रकाश डालने के माध्यम से बड़ी आर्थिक शक्तियों को भी निर्देशित किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन को न मानने वाले लोग, खासकर ट्रम्प, को विशेष तौर पर निर्देशित किया. आइये देखते हैं कि इस हफ्ते के अंत में जलवायु परिवर्तन को लेकर ट्रम्प क्या रवैया अपनाते हैं.

चीन का नाम लिए बिना ही उस पर प्रहार किया गया. मोदी ने भारत द्वारा अपनी संपत्ति या संसाधनों की परवाह किए बिना अन्य देशों की मदद किए जाने के अपने दृष्टिकोण पर बात की। दूसरी ओर चीन- सड़कें, बंदरगाह, हवाई अड्डे और खनिज परिसंपत्तियों को प्राप्त करने में लगा हुआ है.

प्रधानमंत्री ने आतंकवाद का भी मुद्दा उठाया, उन्होंने कुछ आतंकवादियों को अच्छे और बुरे नजरिए से देखने की प्रवृत्ति पर निशाना साधा लेकिन उन्होंने विशेष रूप से कहा कि आतंकवाद को वह अब और बर्दाश्त नहीं करना चाहते.

उन्होंने अपने भाषण में सबसे दिलचस्प और आकर्षक बात यह बताई कि डेटा, वैश्विक शक्ति (ग्लोबल पावर) की नई मुद्रा का एक रूप है. उन्होंने कहा कि जो डेटा को नियंत्रित करेगा वही दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर सकेगा. अब हम अनुमान लगा सकते हैं और तर्क कर सकते हैं कि कहीं उनका संकेत फेसबुक और गूगल या उन देशों की ओर तो नहीं था जो विशाल सर्वरों की मेजबानी कर रहे हैं या चीनी लोग जो स्वयं इसका निर्माण कर रहे हैं या इनमें से सभी.

इस बात पर मुझे सौ फीसदी विश्वास नहीं हो पा रहा है क्योंकि मैंने पिछले 20 वर्षों से हमारे सभी प्रधानमंत्रियों के भाषणों पर ध्यान नहीं दिया है, यदि मेरे द्वारा कहा गया यह तथ्य गलत है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि एक भारतीय प्रधानमंत्री ने डेटा को ‘वैश्विक मुद्रा की सबसे बड़ी ताकत’ का नाम दिया है, तो कृपया मुझे सही तरीके से अपडेट करें.

मैं यह भी व्यक्त नहीं कर सकता कि जुनूनी और मुखर आधार-विरोधी समुदाय द्वारा यह किस परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा और उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी.

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