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Friday, 19 July, 2024
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पूर्वोत्तर भारत में महिलाओं को अधिकार तो ज्यादा हैं लेकिन अत्याचार कम नहीं

परिवार और समाज में अहम फैसलों में उनकी भूमिका काफी न के बराबर है. राजनीति में भी हाशिए पर हैं.

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कोलकाता: सामाजिक भूमिका, जिम्मेदारियों और अधिकारों के मामले में सात बहनों के नाम से मशहूर पूर्वोत्तर राज्यों में देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले महिलाओं की स्थिति बेहतर है. लेकिन आम जनजीवन में उनको ज्यादा अधिकार नहीं हैं. वे वहां निर्णायक स्थिति में नहीं हैं. न तो राजनीति में उनकी कोई चलती है और न ही समाज में. मणिपुर की राजधानी इंफाल में महिलाओं का एक अनूठा बाजार भी है, जो देश में अपनी तरह का अकेला ऐसा बाजार है जहां मालिक भी महिलाएं हैं और दुकानदार भी.

इसी तरह मेघालय में पैतृक संपत्ति पर छोटी बेटी का अधिकार होता है. मिजोरम समेत बाकी राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति है. विडंबना यह है कि पुरुषों पर भारी होने के बावजूद समाज में ये महिलाएं बेचारी ही हैं. राजनीति में महिलाएं हाशिए पर हैं. इसी तरह पारिवारिक या सामाजिक मुद्दे पर उनको फैसले का अधिकार भी नहीं हैं. यही नहीं, उनको पुरुषों का अत्याचार भी झेलना पड़ता है.


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जिस राज्य में महिलाओं को दूसरे राज्यों के मुक़ाबले ज्यादा अधिकार मिले हों, वहां उन पर अत्याचार की कल्पना तक नहीं की जा सकती है लेकिन यह इलाके की कड़वी हकीकत है. ‘पूर्वोत्तर भारत का स्कॉटलैंड’ कहे जाने वाले पर्वतीय राज्य मेघालय में मातृसत्ता वाला समाज है. यानी समाज में महिलाओं की हैसियत व अधिकार मर्दों से ज्यादा हैं. छोटी पुत्री ही घर व संपत्ति की मालकिन होती है और उसी के नाम पर वंश आगे चलता है. उससे शादी करने वाले लड़के को घरजमाई बनना पड़ता है. इसके बावजूद यह विडंबना ही है कि राज्य व समाज के विकास से जुड़े किसी भी महत्वपूर्ण फैसले में उनकी कोई भूमिका नहीं है. यही नहीं, इन महिलाओं को अब घरेलू हिंसा का भी शिकार होना पड़ रहा है. राज्य में बढ़ती शराबखोरी इसकी सबसे बड़ी वजह है.

मेघालय के अलावा, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के कई कबीलों और जनजातियों में तो महिलाएं ही परिवार की मुखिया होती हैं. बावजूद इसके ज्यादातर मामलों में वे अपने अधिकारों का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पातीं या उनको ऐसा करने नहीं दिया जाता. परिवार और समाज में अहम फैसलों में उनकी भूमिका काफी नगण्य है. राजनीति में भी महिलाएं हाशिए पर हैं.

यही वजह है कि अक्सर विधानसभा समेत दूसरे प्रशासनिक निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठती रही है. लेकिन हर बार पुरुष–प्रधान समाज की ओर से इनका विरोध किया जाता रहा है. नतीजतन अक्सर हिंसा होती रही है. नागालैंड में तीन साल पहले होने वाली हिंसा इसकी मिसाल है.

उगते सूरज की धरती कहे जाने वाले अरुणाचल प्रदेश में लंबे अरसे से विधानसभा और सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठती रही है. अब महिला आयोग ने बीते साल सरकारी नौकरियों और विधानसभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की मांग उठाई थी.

आयोग की अध्यक्ष राधिलू चाई कहती हैं, ‘यहां महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अधिकार मिले हैं और उनकी आबादी भी ज्यादा है. बावजूद इसके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होने के कारण उनको परिवार और समाज में उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.’

इसी तरह मिजोरम के आम जनजीवन में महिलाओं की भूमिका काफी अहम है. ईसाई बहुल राज्य मिजोरम की अर्थव्यवस्था, घरेलू और सामाजिक मामलों में महिलाओं का योगदान बेहद अहम है. राजधानी आइजल के किसी भी बाजार में ज्यादातर दुकानों पर महिलाएं ही नजर आती हैं. सरकारी दफ्तरों में भी उनकी ही तादात ज्यादा है. बावजूद इसके परिवार या समाज में किसी अहम फैसले में उनकी राय नहीं ली जाती.

मणिपुर व नगालैंड में तो उग्रवादी गतिविधियों के चलते महिलाओं का जीवन नरक हो गया है. यह हालत तब है जबकि मणिपुर में दुनिया का इकलौता ऐसा बाजार (एम्मा मार्केट) है जहां तमाम दुकानदार महिलाएं ही हैं. सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) के विरोध में मणिपुरी महिलाओं का विरोध और आंदोलन देश ही नहीं पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरता रहा है. एक युवती से बलात्कार और हत्या के बाद सशस्त्र बल विशेधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) खिलाफ वर्ष 2004 में राज्य की महिलाओं की नग्न रैली ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं. महिला मानवाधिकार कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला भी इस कानून के विरोध में बरसों तक भूख हड़ताल पर रही थीं.

महिलाओं के एक संगठन नार्थ ईस्ट नेटवर्क की ओर से किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि तमाम अधिकारों के बावजूद पूर्वोत्तर की महिलाएं घर-परिवार में उत्पीड़न की शिकार हैं. संगठन के एक प्रवक्ता बताते हैं, ‘अब यहां घरेलू हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं की तादात बढ़ रही है लेकिन ऐसे ज्यादातर मामले दबा दिए जाते हैं. पंचायतें भी इसे निजी मामला मानते हुए इनमें हस्तक्षेप नहीं करतीं. खासकर ग्रामीण इलाकों में ऐसी घटनाओं में तेजी आई है.’

मेघालय की पूर्व पुलिस अधिकारी आई. नोंगरांग कहती हैं कि जब भी महिलाओं पर अत्याचार का मुद्दा उठता है, सरकार और सामाजिक संगठन यह दलील देते हुए इसे दबाने का प्रयास करते हैं कि मातृसत्तात्मक समाज में यह संभव नहीं है. पूर्वोत्तर इलाके में सक्रिय तमाम महिला संगठन इन मुद्दों पर आवाज भले उठाते रहे हों, यह नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर ही रह जाती है.


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मणिपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ओ. दोरेंद्र सिंह कहते हैं, ‘जब तक राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक समाज में उनकी बातों का कोई खास असर नहीं होगा. इसके लिए जागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है.’ वह कहते हैं कि देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले ज्यादा अधिकार होने के बावजूद अत्याचार की शिकार महिलाओं की तादात बढ़ना मातृसत्तात्मक समाज का एक स्याह पहलू है.इस तस्वीर को बदलने के लिए राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा.

वह कहते हैं कि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस मातृसत्तात्मक समाज में भी पुरुष-प्रधान मानसिकता बुरी तरह हावी है. इस मानसिकता के नहीं बदलने तक महिलाओं की स्थिति में सुधार संभव नहीं है. जब तक राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक समाज में उनकी बातों का कोई खास असर नहीं होगा लेकिन यह स्थिति कब बदलेगी, लाख टके के इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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