Monday, 27 June, 2022
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तड़का क्यों हुआ इतना महंगा? खाद्य तेल आयात पर भारत की निर्भरता का है सारा दोष

फिलहाल भारतीय लोग खाद्य तेल पर पिछले साल की तुलना में 14% अधिक खर्च कर रहे हैं. विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अगर कोई और झटका नहीं लगा तो जल्द ही यह तेजी ठंडी पर जायेगी, वहीँ सरकार का कहना है कि 'स्थिति अभी नियंत्रण में है'.

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नई दिल्ली: किसी भी भारतीय रसोई में खाना पकाने के तेल की एक बोतल का होना तयशुदा है, लेकिन इसकी कीमतें नहीं.

उपभोक्ता मामलों के विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 16 मई तक, देश का आम उपभोक्ता एक साल पहले की तुलना में खाद्य तेल पर औसतन 14 प्रतिशत अधिक या यूँ कहें कि 22 रुपये प्रति किलोग्राम अतिरिक्त, खर्च कर रहा था.

यह औसत विभाग द्वारा नजर रखे जाने वाले खाद्य तेलों की छह किस्मों – मूंगफली, सरसों, ताड़, वनस्पति, सोया और सूरजमुखी – के तेल की कीमतों पर आधारित है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) द्वारा जारी खुदरा मुद्रास्फीति पर नवीनतम डेटा – जो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित है – से पता चलता है कि खाद्य तेल की कीमतों में मुद्रास्फीति (बढ़ी हुई महंगाई) देश की समग्र मुद्रास्फीति दर के अनुपात में नहीं है.

इस साल अप्रैल में, खुदरा मुद्रास्फीति में 7.79 प्रतिशत की वृद्धि हुई (जिसका अर्थ है कि देश भर में सामान्य वस्तुओं की कीमतें पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 7.79 प्रतिशत अधिक हैं). हालांकि, इसी अवधि के लिए खाद्य तेलों की कीमतों में 17 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. एमओएसपीआई के आंकड़ों के अनुसार, यह सामान्य कीमतों की तुलना में दोगुने से अधिक की वृद्धि है.

जब तक कोविड -19 महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को बाधित नहीं किया, तब तक खाना पकाने के तेल की बढ़ती कीमतें किसी बड़ी चिंता का विषय नहीं थीं. साल 2019 तक, खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सामान्य कीमतों में वृद्धि की तुलना में लगभग हमेशा कम ही रहीं थीं.

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एमओएसपीआई के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2020 के आसपास खाद्य तेल की मुद्रास्फीति सामान्य मुद्रास्फीति दर के लगभग बराबर ही थी और तब से यह दोहरे अंकों वाले आंकड़ों में बनी हुई है.

रमनदीप कौर / दिप्रिंट

भारत का खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हो पाने का मुख्य कारण इसके आयात पर इसकी भारी निर्भरता है.

खाद्य तेलों पर नजर रखने वाली एजेंसी सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) से प्राप्त 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार, हमारा देश जिन तीन तरह के तेलों का आयात करता है, उसमें सबसे आगे है ताड़ का तेल (पाम आयल), जो भारत के खाद्य तेल की खपत का 36 प्रतिशत है. इसके बाद सोयाबीन और सूरजमुखी तेल का स्थान है, जो कुल मांग का क्रमशः22 प्रतिशत और 12 प्रतिशत हैं.

हाल फ़िलहाल में, इनकी आपूर्ति कई वजहों से प्रभावित हुई है. इनमें इंडोनेशिया, जो उन देशों में से एक है जिन पर भारत पाम आयल के आयात के लिए मुख्य रूप से निर्भर है, द्वारा पाम आयल के निर्यात पर अप्रैल के अंत में लगाया गया प्रतिबंध; अर्जेंटीना द्वारा सोयामील के निर्यात पर मार्च में लगाया गया प्रतिबंध और रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से यूक्रेन से सूरजमुखी तेल की आपूर्ति का प्रभावित होना शामिल है.

हालात इस वजह से और भी खराब हो गए क्योंकि कोविड लॉकडाउन के बाद चीजें अब सामान्य होने लगीं हैं और खाद्य एवं पेय उद्योग में पाम आयल की मांग में वृद्धि देखी गई है. इसने मांग और आपूर्ति के बीच एक बड़ा अंतर पैदा कर दिया है.

एक तरफ जहां खाद्य तेल की खुदरा कीमतों से उपभोक्ताओं की जेबें कट रहीं है, वहीँ केंद्र सरकार का कहना है कि हालत अभी भी काफी हद तक काबू में है.

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 1 मई को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा था, ‘देश में सभी प्रकार के खाद्य तेलों का वर्तमान भंडार (स्टॉक) लगभग 21 एलएमटी (लाख मीट्रिक टन) है, और लगभग 12 एलएमटी ट्रांजिट (बीच रास्ते) में है जो मई 2022 में आने वाला है. इसलिए, इंडोनेशिया द्वारा निर्यात पर प्रतिबंध के कारण पैदा नाजुक अवधि को कवर करने के लिए देश के पास पर्याप्त स्टॉक है.’

इसमें आगे कहा गया था, ‘खाद्य तेलों की कीमतों पर दिन-प्रतिदिन के आधार पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है, ताकि खाद्य तेल की कीमतों पर काबू रखने के लिए उचित उपाय किए जा सकें और जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि कीमतें स्थिर रहे और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा हो.‘

एसईए के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता ने दिप्रिंट को बताया कि इस साल की दूसरी छमाही तक खाद्य तेल की कीमतों में गिरावट आने की उम्मीद है.

यह उम्मीद जिस मुख्य कारक पर टिकी हुई है, वह है इंडोनेशियाई राष्ट्रपति जोको विडोडो द्वारा गुरुवार को की गई यह घोषणा कि उनका देश 23 मई से पाम तेल के निर्यात पर लगे प्रतिबंध को हटा देगा.

मेहता ने कहा, ‘हम 2022 की दूसरी छमाही, ज्यादा-से-ज्यादा जुलाई या अगस्त के करीब, तक कीमतों में कमी की उम्मीद कर रहे हैं. हो सकता है कि कीमतें सामान्य स्तर पर वापस न आएं, लेकिन 15-20 फीसदी की कटौती की उम्मीद की जा सकती है, बशर्ते कोई और झटका न लगे.’

हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि भारत को खाद्य तेल आपूर्ति के लिए एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण (लम्बी अवधि वाले नजरिये) की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी मांग बढ़ने ही वाली है.


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किन तेलों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं?

भारत में, खाद्य तेल के सस्ते विकल्प, वनस्पति और ताड़ का तेल जो खाना पकाने के तेल की अधिकांश जरूरतों को पूरा करते हैं, सबसे अधिक दबाव में हैं.

उपभोक्ता मामलों के विभाग से प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि 18 मई तक, वनस्पति तेल की कीमत लगभग 165 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जबकि एक साल पहले इसकी लागत 129 रुपये थी और इस तरह इसमें 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

इसी तरह पाम आयल की कीमत अब 16.31 फीसदी अधिक है, जबकि सोया तेल पिछले साल की तुलना में 16 फीसदी महंगा हो गया है. उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक सूरजमुखी, सरसों और मूंगफली तेल की कीमतों में भी क्रमश: करीब 13.2, 8.6 और 6.91 फीसदी की तेजी आई है.

रमनदीप कौर / दिप्रिंट

खाना पकाने के तेल का भू राजनैतिक खेल

एसईए द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश की खाद्य तेल की कुल मांग का 63 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है, जिसमें से अधिकांश पाम आयल होता है.

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा नवंबर 2021 में जारी की गई एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि भारत ने साल 2020-21 में 133 लाख टन खाद्य तेल का आयात किया, जिसमें से 56 प्रतिशत पाम आयल था.

बाजार में उपलब्ध अन्य विकल्पों की तुलना में सस्ता और अधिक स्वादहीन यह विकल्प (ताड़ का तेल) देश के खाद्य और पेय उद्योग द्वारा काफी पसंद किया जाता है.

ताड़ के तेल की खपत में घरेलू उपयोगकर्ताओं की हिस्सेदारी केवल 18 प्रतिशत है, जबकि शेष हिस्सा होटल, रेस्तरां और कैफे (33 प्रतिशत), बेकरी एवं वनस्पति (18 प्रतिशत), और बिस्कुट एवं तले हुई खाद्य उत्पाद (18 प्रतिशत) वाले उद्योग में जाता है. एसईए के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 13 प्रतिशत ताड़ के तेल का उपयोग गैर-खाद्य उद्योग द्वारा किया जाता है.

कोविड के बाद सामान्य स्थिति की बहाली के रूप में खाद्य और पेय उद्योग की मांग में वृद्धि देखी गई है और इस उद्योग के विकास के लिए ताड़ का तेल एक महत्वपूर्ण आगत (इनपुट) बन गया है.

पाम आयल के आयात हेतु भारत मुख्य रूप से दो देशों – इंडोनेशिया और मलेशिया – पर निर्भर है जहां का उष्णकटिबंधीय मौसम उन्हें थोक मात्रा में ताड़ का उत्पादन करने की अनुमति देता है. वैश्विक रूप से पाम आयल की आपूर्ति में अकेले इन दोनों देशों का हिस्सा लगभग 84 प्रतिशत है.

इसलिए, इन दोनों देशों द्वारा लिया गया कोई भी नीतिगत निर्णय वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित करता है. इंडोनेशिया, जो वैश्विक ताड़ के तेल की आपूर्ति का लगभग 57 प्रतिशत हिस्सा रखता है, ने ताड़ के निर्यात पर रोक लगा दी है. कच्चे ईंधन के तेल (क्रूड आयल) के अपने आयात में कटौती करने के लिए, इंडोनेशिया और मलेशिया दोनों इसमें पाम मिलाते हैं. इस साल अप्रैल के अंत में इंडोनेशिया ने पाम आयल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था.

अपने स्वयं के प्रसंस्करण उद्योगों की रक्षा के लिए मलेशिया अपने कच्चे पाम आयल के निर्यात पर 8 प्रतिशत का कर लगाता है. हालांकि, इंडोनेशिया द्वारा लगाए गए प्रतिबंध की वजह से वैश्विक आपूर्ति में आयी कमी को देखते हुए मलेशिया इसे घटाकर 4-6 फीसदी करने पर विचार कर रहा है.

पाम आयल के अलावा भारत सोयाबीन तेल के आयात पर भी निर्भर है. यहां भी, दो ही देश – अर्जेंटीना और ब्राजील – भारत की आपूर्ति श्रृंखला पर हावी हैं.

एसईए के अनुसार, भारत हर साल औसतन 24 लाख मीट्रिक टन (एमएमटी) सोयाबीन तेल का आयात करता है, जिसमें से आधे की मांग अर्जेंटीना द्वारा पूरी की जाती है. इस देश ने मार्च में घरेलू खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के मकसद से इस तेल को बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख घटक ‘सोयामील’ के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी.

नतीजतन, भारत ने दुनिया में सोयाबीन के शीर्ष उत्पादक ब्राजील की तरफ रुख किया. हालांकि, द हिंदू बिजनेसलाइन की एक खबर के अनुसार, इस देश ने आगाह किया है कि इसकी आपूर्ति क्षमता सीमित है.

इस बीच रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से सनफ्लावर आयल (सूरजमुखी के तेल) की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है. भारत को यूक्रेन से लगभग 2 एमएमटी सनफ्लावर आयल प्राप्त होता था, जो भारत के कुल सनफ्लावर आयल के आयात का लगभग 85-90 प्रतिशत है. अब इसे अन्य विकल्प तलाशने होंगे.

सरसों का तेल, जिसमें भारत में खाद्य तेलों की खपत का लगभग 12 प्रतिशत शामिल है, घरेलू स्तर पर उगाया जाता है और अन्य खाद्य तेलों की तुलना में इसकी कीमतों में नाटकीय रूप से वृद्धि नहीं हुई है.

यह दौर भी बीत जायेगा

चूंकि इंडोनेशिया भारत के खाद्य तेल आयात के एक बड़े हिस्से की आपूर्ति करता है, इसलिए कम कीमतों के मामले में राहत मिलना इस बात पर निर्भर करता है कि पाम आयल के निर्यात पर लगा प्रतिबंध हटा दिया जाए.

एसईए के कार्यकारी निदेशक मेहता ने कहा कि भारत को अपने खाद्य तेलों को बेहतर तरीके से प्राप्त करने के लिए लम्बी अवधि वाली योजना की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी मांग सिर्फ और अधिक बढ़ने ही वाली है, तथा इसे इनकी जगह लेने वाले (स्थानापन्न) तिलहन उगाने की भी जरूरत है.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘हमारे पास 200 लाख टन की खपत है और हमें 130 लाख टन आयात करना पड़ता है. ऐसे कई रास्ते हैं जिनसे भारत स्थानापन्न तिलहन उगा सकता है, हमें उन अवसरों को भुनाने की जरूरत है.’

पिछले साल, केंद्र ने कच्चे पाम आयल के उत्पादन को बढ़ाने के मकसद से 11,040 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ नेशनल मिशन ऑफ़ एडिबल आयलस – आयल पाम (खाद्य तेलों के लिए राष्ट्रीय अभियान- आयल पाम) की शुरुआत की, जिसके लिए वित्तीय वर्ष 2021-22 हेतु लगभग 11 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी.

सितंबर 2021 में, केंद्र सरकार ने तिलहन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में भी गेहूं की तुलना में कहीं ज्यादा वृद्धि की पेशकश की थी.

एसईए ने पिछले साल दिसंबर में केंद्र सरकार से पंजाब और हरियाणा में भी तिलहन की खेती को प्रोत्साहित करने का अनुरोध किया था ताकि अतिरिक्त गेहूं और चावल के उत्पादन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भूमि को तिलहन के लिए इस्तेमाल किया जा सके. एसईए के अनुसार इसके माध्यम से भारत को हर साल 25 लाख टन अधिक खाद्य तेल प्राप्त हो सकता है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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