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Friday, 19 July, 2024
होमदेशजब इंदिरा गांधी को उग्र मिजो विद्रोह का सामना करना पड़ा था- वायुसेना का आइजोल पर हमला, नए राज्य का जन्म

जब इंदिरा गांधी को उग्र मिजो विद्रोह का सामना करना पड़ा था- वायुसेना का आइजोल पर हमला, नए राज्य का जन्म

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव का जवाब देते हुए मोदी ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्होंने पूर्वोत्तर के साथ 'अनुचित' व्यवहार किया और भारतीय वायु सेना के माध्यम से पूर्वोत्तर के 'नागरिकों पर हमला' करवाया.

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नई दिल्ली: संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान पूर्वोत्तर को लेकर कांग्रेस के शासन और नीतियों पर निशाना साधते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1966 में हुई उस घटना को याद किया जब भारतीय वायु सेना (आईएएफ) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर आइजोल में बम बरसाए थे.

पीएम ने गुरुवार को लोकसभा में कहा था, “5 मार्च 1966 को कांग्रेस ने मिजोरम में असहाय नागरिकों पर वायु सेना से हमला करवाया था. कांग्रेस को जवाब देना चाहिए कि क्या यह किसी अन्य देश की वायु सेना थी. क्या मिजोरम के लोग हमारे देश के नागरिक नहीं थे? क्या उनकी सुरक्षा भारत सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी.”

मोदी भारतीय वायुसेना द्वारा मिजोरम में किए गए हवाई हमलों को याद कर रहे थे. 11 जनवरी, 1966 को ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के लगभग छह सप्ताह बाद बाद भारतीय वायुसेना ने मिजोरम में बम गिराए थे. यह सितंबर 1965 में दूसरे भारत-पाकिस्तान युद्ध समाप्त होने के कुछ महीनों बाद हुए थे.

5 मार्च को, भारतीय वायुसेना ने भारी गोलाबारी के साथ आइजोल पर हमला किया और अगले दिन बम गिराए गए क्योंकि सरकार को विद्रोहियों के विद्रोह का सामना करना पड़ा था. विद्रोहियों ने भारत से मिजोरम की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी.

हालांकि, हवाई हमलों ने आइजोल को मिज़ो नेशनल आर्मी (एमएनए) के लड़ाकों से मुक्त कर दिया और वहां मौजूद विद्रोहियों को सीमा पार पूर्वी पाकिस्तान में धकेल दिया था. लेकिन सरकार के इस निर्णय की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, क्योंकि इसने वर्षों से चल रहे शांति वार्ता के प्रयासों को और अधिक जटिल बना दिया.

विद्रोह शुरू कैसे हुआ

मिजो विद्रोह की जड़ असम राज्य से जुड़ी थी. मिजोरम के लोग असम प्रशासन के खिलाफ थे और एक अलग राज्य की मांग कर रहे थे. उस समय मिजोरम असम का हिस्सा था और लुशाई हिल्स जिले के नाम से जाना जाता था.

असम सरकार के असमिया थोपने के फैसले और 1959 में शुरू हुए अकाल के खराब प्रबंधन ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया. पु लालडेंगा के नेतृत्व में- जो बाद में 1986 में मिजोरम के मुख्यमंत्री बने- अकाल के खिलाफ एक जन आंदोलन ने अलगाववादी रंग ले लिया था.

मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने 1 मार्च, 1966 को भारत से स्वतंत्रता की घोषणा की. विद्रोहियों ने आइजोल में खजाने पर हमला किया और लुंगलेई तथा चम्फाई शहरों में सुरक्षा चौकियों पर कब्जा कर लिया. आइजोल में असम राइफल्स पर हमला हुआ और पांच जवान मारे गए.

केंद्रीय गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा ने आशंका जताई कि यह नया विद्रोह नागालैंड में लड़ाई से पहले से ही तबाह हो चुके उत्तर-पूर्व को और अस्थिर कर सकता है.

लालडेंगा की सफलता एमएनएफ को पूर्वी पाकिस्तान में प्राप्त सुरक्षित पनाहगाहों से मिली, जिसके साथ लुशाई हिल्स की जंगल से ढकी 318 किलोमीटर की सीमा साझा थी. 1966 तक पांच सालों में एमएनएफ की सशस्त्र शाखा एमएनए कम से कम आठ बटालियनों तक बढ़ गई.

एमएनएफ की सैन्य योजना, जिसका कोड-नाम ऑपरेशन जेरिको था, में सेना और अर्धसैनिक ठिकानों पर कब्जा करने और आइजोल को कम से कम 48 घंटों तक स्वतंत्र मिजोरम का झंडा फहराने के लिए पर्याप्त समय तक कब्जे में रखने की बात की गई थी. उस समय पाकिस्तान ने वादा किया था कि वह इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाएगा और मिजोरम को राजनयिक मान्यता दिलवाएगा.


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भारत की प्रतिक्रिया

आइजोल में असम राइफल्स की चौकी पर कब्जे की संभावना को देखते हुए, प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने पहली और अबतक एकमात्र बार देश के अंदर वायु सेना के उपयोग का आदेश दिया. चार लड़ाकू जेट- फ्रांस निर्मित डसॉल्ट ऑरागन लड़ाकू विमान (उपनाम तूफानिस) और ब्रिटिश हंटर्स- को आइजोल पर बमबारी करने के लिए तैनात किया गया था. विमानों ने शहर पर गोलीबारी करने के लिए अपनी तोप का इस्तेमाल किया था.

सिलचर से वायुसेना के विमानों का संचालन किया गया था. और सबसे बड़ी बात यह थी कि प्रोपेलर विमान के पिछले हिस्से में बिना गाइड वाले बम लगाए गए थे और वे आइजोल के ऊपर बेतरतीब ढंग से गिरे थे.

चूंकि हमला अगले कुछ दिनों तक जारी रही, एमएनएफ को म्यांमार और पूर्वी पाकिस्तान के जंगलों में भागने के लिए मजबूर होना पड़ा. हालांकि, वायुसेना के उपयोग के चलते नागरिकों की भी जान गई. कई बाज़ार और सार्वजनिक इमारतें जला दी गईं, कम से कम 13 नागरिक मारे गए.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार और सशस्त्र बलों ने मिजोरम में लंबे समय तक बमों के इस्तेमाल की बात से इनकार किया है. हालांकि, सच तब सामने आया जब कुछ पूर्व विद्रोहियों ने बाद में बताया कि कैसे आइजोल में लोगों ने विमानों से गोलियां चलाते और बम गिराते देखा था.

अब बंद हो चुके कोलकाता से निकलने वाला दैनिक अखबार द हिंदुस्तान स्टैंडर्ड की 9 मार्च, 1966 की रिपोर्ट में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हवाले से कहा गया था कि लड़ाकू विमानों आपूर्ति के लिए भेजा गया था, न कि बम गिराने के लिए.

एक मानवाधिकार समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक प्रत्यक्षदर्शी के बयान का हवाला देते हुए कहा, “दो प्रकार के विमान का इस्तेमाल किया गया था जो आइजोल के ऊपर से उड़ान भरते थे. अच्छे विमान और क्रोधित विमान. अच्छे विमान वे थे जो थोड़ी धीमी गति से उड़ते थे और उससे बम नहीं गिराए जाते थे. क्रोधित विमान वे थे जिसकी आवाज काफी तेज रहती थी और वह धुआं और आग उगल रहे थे.”

समिति का नेतृत्व लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष जॉर्ज गिल्बर्ट स्वेल और विधायक रेव जेम्स जॉय निकोल्स रॉय ने किया था.

लंबी उग्रवाद एवं शांति प्रक्रिया

हवाई हमले अपने पीछे कड़वाहट की एक बड़ी विरासत छोड़ गए. हवाई हमलों के बाद संघर्ष लंबे समय तक चला और एक बड़ा विद्रोह में बदल गया जिससे स्थानीय आबादी को भारी मुश्किल हुई. एक साल बाद, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम लागू किया गया.

आख़िरकार, एमएनएफ को एहसास हुआ कि उनकी मांग पूरी नहीं हो सकती और वह यह लड़ाई जीत भी नहीं सकती तो उन्होंने केंद्र सरकार के साथ बातचीत शुरू करने की कोशिश की. इंदिरा ने शुरू में इंटेलिजेंस ब्यूरो के माध्यम से एमएनएफ के साथ बातचीत शुरू की.

लालडेंगा के साथ कई मुद्दों पर चर्चा हुई और समझौता हुआ. एमएनएफ को “नागरिक जीवन में उनकी वापसी सुनिश्चित करने, हिंसा छोड़ने और सामान्य स्थिति की बहाली की प्रक्रिया में मदद करने के लिए सभी अंडरग्राउंड लड़ाकों को उनके हथियारों, गोला-बारूद के साथ आत्मसमर्पण” करने के लिए कहा गया था.

बदले में, सरकार ने वादा किया कि वह “केंद्र शासित प्रदेश मिजोरम को राज्य का दर्जा देने के लिए उपाय शुरू करेगी”.

बाद में, इस बात पर सहमति हुई कि मिज़ोरम में उत्तर पूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 की धारा 6 में निर्दिष्ट क्षेत्र शामिल होगा. ऐसा कहा गया था, मिज़ोस के धर्म या सामाजिक प्रथाओं, मिज़ो प्रथागत कानून या प्रक्रिया, प्रशासन के संबंध में संसद का कोई कार्य नहीं मिज़ो प्रथागत कानून के अनुसार निर्णयों से जुड़े नागरिक और आपराधिक न्याय, भूमि के स्वामित्व और हस्तांतरण, मिजोरम राज्य पर लागू होंगे जब तक कि मिजोरम की विधान सभा एक प्रस्ताव द्वारा ऐसा निर्णय नहीं लेती.

1986 के मिजोरम शांति समझौते ने दो दशक पुराने मिजोरम विद्रोह को समाप्त कर दिया. मिजोरम 1987 में भारत का 23वां राज्य बन गया. एक समय के कई विद्रोहियों को सीमा सुरक्षा बल में शामिल किया गया और एमएनएफ खुद एक मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी बन गई, जो वर्तमान में राज्य में सत्ता पर काबिज है.

आज, मिजोरम उत्तर-पूर्व के उन कुछ राज्यों में से एक है, जहां लंबे समय तक शांति रही है. हालांकि क्रूर विद्रोह ने दुर्भावना की विरासत को पीछे छोड़ दिया, यह संभव है कि भारी सैन्य बल का सामना किए बिना एमएनएफ मेज पर नहीं आ पाता.

(संपादनः ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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