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Wednesday, 18 February, 2026
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वीज़ा एजेंट के धोखाधड़ी केस ‘सेटलमेंट’ सवालों में, बैंक रिकॉर्ड में नहीं मिला भुगतान का सबूत

लुधियाना के एक एजेंट के खिलाफ ज्यादातर एफआईआर समझौते के बाद खत्म हो गईं, तो ईडी ने सवाल उठाया कि शिकायतकर्ताओं को पैसे कैसे दिए गए, जब उसके खातों में ऐसा कोई लेन-देन नहीं दिखा.

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नई दिल्ली: जब पंजाब के एक जाने-माने इमिग्रेशन एजेंट नितिश घई ने अपने खिलाफ वीज़ा धोखाधड़ी के 112 में से 108 केस “सेटल” कर लिए, तो उसे लगा होगा कि उसकी कानूनी लड़ाई खत्म होने वाली है, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कुछ और ही योजना थी.

2015 से 2018 के बीच, घई के खिलाफ लुधियाना और जालंधर में पंजाब प्रिवेंशन ऑफ ह्यूमन स्मगलिंग एक्ट के तहत 112 केस दर्ज हुए थे. इसके साथ ही धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप भी लगे थे क्योंकि उस पर आरोप था कि उसने लोगों को वीज़ा और विदेश में नौकरी दिलाने का झांसा देकर ठगा. उसने शिकायतकर्ताओं को मुआवजा देकर और पुलिस को मामले बंद करने के लिए मनाकर इन 112 में से 108 केस “सेटल” कर लिए.

इसके बाद घई पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचा और शिकायतकर्ताओं के साथ समझौते के आधार पर अपने खिलाफ सभी केस खत्म करने की मांग की. उसने कहा कि विवाद आपसी सहमति से सुलझ गए हैं, उसे राहत मिल गई और आखिरकार केस खत्म कर दिए गए.

लेकिन एक बड़ी गड़बड़ी पर ज्यादा ध्यान नहीं गया. घई के बैंक खाते में सिर्फ 22 लाख रुपये बैलेंस दिखा, जो इतने ज्यादा शिकायतकर्ताओं को मुआवजा देने के लिए कम लगता था.

और भी हैरानी की बात यह थी कि उस रकम में से एक भी रुपया भुगतान के रूप में दिया हुआ नहीं दिखा.

इससे एक बड़ा सवाल उठा: शिकायतकर्ताओं को पैसा कैसे दिया गया और केस कैसे बंद हुए?

जब ईडी ने 2024 में इस मामले की जांच शुरू की, तो उसने देखा कि घई अपने खिलाफ 90 प्रतिशत से ज्यादा केस बंद कराने में सफल हो गया था और बाकी चार केस भी सेटल होने वाले थे.

अगर वो भी बंद हो जाते, तो मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई मूल अपराध (predicate offence) के बिना खत्म हो सकती थी. इस चिंता के आधार पर ईडी ने पंजाब पुलिस में शिकायत दी और एफआईआर दर्ज करने को कहा.

हालांकि, एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन पंजाब पुलिस ने फिर से पिछले साल मार्च में लुधियाना की अदालत में कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर दी. इसमें कहा गया कि ईडी ने जांच जारी रखने के लिए कोई नया सबूत या सामग्री नहीं दी है और यह भी कहा कि आरोपी को पहले के मामलों में पहले ही क्लीन चिट मिल चुकी है.

ईडी ने इस कदम को चुनौती दी और कहा कि घई के बैंक रिकॉर्ड में पहले के केस सेटलमेंट के मुताबिक कोई भुगतान नहीं दिखता. एजेंसी ने कहा कि इससे शक होता है कि सेटलमेंट का पैसा गैरकानूनी गतिविधियों से आया कैश हो सकता है.

अदालत ने इन चिंताओं पर ध्यान दिया, पंजाब पुलिस के रवैये पर नाराज़गी जताई और कैंसिलेशन रिपोर्ट को खारिज कर दिया.

इसके बाद घई एक बार फिर अदालत के कटघरे में खड़ा है.

इमिग्रेशन एजेंट के खिलाफ आरोप

नितिश घई को लुधियाना और जालंधर पुलिस कमिश्नरेट के अधिकार क्षेत्र के कई पुलिस स्टेशनों में कुल 112 मामलों का सामना करना पड़ा. उस पर आरोप था कि उसने लोगों को वीज़ा दिलाने और उन्हें काम के लिए विदेश भेजने के नाम पर ठगा.

उसके खिलाफ धोखाधड़ी और साजिश से जुड़ी धाराओं के साथ-साथ इमिग्रेशन एक्ट और पंजाब प्रिवेंशन ऑफ ह्यूमन स्मगलिंग एक्ट के तहत भी केस दर्ज किए गए.

लुधियाना पुलिस ने मार्च 2025 में कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की. यह रिपोर्ट उस समय दाखिल की गई, जब अक्टूबर 2024 में ईडी के एक अधिकारी की शिकायत पर, जो उसके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग केस की जांच कर रहे थे, घई के खिलाफ आईपीसी की धारा 61(2) (आपराधिक साजिश) और 318(4) (धोखाधड़ी) के साथ-साथ इमिग्रेशन एक्ट की धाराओं में केस दर्ज किया गया था.

एजेंसी ने पंजाब पुलिस से मिली जानकारी के आधार पर घई के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी. इस जानकारी में कहा गया था कि उसके खिलाफ 112 मामलों में से चार को छोड़कर बाकी सभी में उसे बरी कर दिया गया था या एफआईआर खत्म कर दी गई थी.

हालांकि, एजेंसी, जो 2019 से घई के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग केस की जांच कर रही थी, उसने कहा कि इन लगभग सभी मामलों का फैसला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने शिकायतकर्ताओं के साथ उनके समझौते के आधार पर किया था.

एजेंसी ने पुलिस को दी गई अपनी जानकारी में यह भी आरोप लगाया था कि घई ने अपराध से कमाए गए पैसे से अपने नाम पर करोड़ों रुपये की अचल संपत्ति खरीदी, जबकि 2015 से 2018 के बीच उसकी घोषित आय सिर्फ 22 लाख रुपये थी.

6 फरवरी को दिए गए आदेश में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट डेजी बांगड़ ने कहा, “उक्त शिकायत मिलने पर यह एफआईआर दर्ज की गई और जांच की गई. जांच के दौरान पाया गया कि एक को छोड़कर बाकी सभी पुरानी एफआईआर का फैसला माननीय हाई कोर्ट पहले ही कर चुका था और प्रवर्तन निदेशालय ने ऐसा कोई नया सबूत या सामग्री नहीं दी, जिससे इस केस में जांच जारी रखना सही ठहराया जा सके.”

उन्होंने आगे कहा, “इसके बाद बीएनएसएस की धारा 194 के तहत यह कैंसिलेशन रिपोर्ट तैयार की गई और इस अदालत में पेश की गई.”

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि आगे जांच की गुंजाइश है क्योंकि शिकायतकर्ता ईडी अधिकारी ने पुलिस जांच पर असंतोष जताया है.

उन्होंने आगे कहा, “हालांकि, शिकायतकर्ता ने अभी तक कोई प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल नहीं की है, लेकिन यह देखते हुए कि शिकायतकर्ता ने जांच पर असंतोष जताया है और आगे जांच की गुंजाइश है, खासकर आरोपी द्वारा अपनी फर्मों के जरिए बिना लाइसेंस ‘वर्क वीज़ा’ का गैरकानूनी काम करने में शामिल होने के मामले में, इस एफआईआर में दी गई कैंसिलेशन रिपोर्ट को खारिज किया जाता है और मामले को आगे जांच के लिए संबंधित एसएचओ के पास वापस भेजा जाता है.”

अदालत की कार्यवाही से जुड़े सूत्रों ने कहा कि जिस दिन यह आदेश दिया गया, उसी दिन एक प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की गई थी, लेकिन इस केस की कार्यवाही के हिस्से के रूप में उसे रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया गया.

‘खराब और अधूरी जांच’

अपनी प्रोटेस्ट पिटीशन में, जिसकी एक कॉपी दिप्रिंट ने देखी है, ईडी ने इस महीने की शुरुआत में लुधियाना कोर्ट को बताया कि मनी लॉन्ड्रिंग केस सिर्फ लुधियाना पुलिस कमिश्नर के सितंबर 2019 के एक पत्र के आधार पर दर्ज किया गया था, जिसमें 64 एफआईआर की कॉपी शामिल थी.

एजेंसी ने कहा कि उसने अपनी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत कई पीड़ितों और घई के बयान दर्ज किए और 21 अक्टूबर 2024 को अभियोजन शिकायत (चार्जशीट) दाखिल की.

कुछ दिन बाद, एजेंसी ने अपनी जांच के आधार पर घई के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए लुधियाना पुलिस से संपर्क किया, जिसके बाद 26 अक्टूबर 2024 को एफआईआर दर्ज की गई.

हालांकि, एजेंसी ने आरोप लगाया कि जांच ठीक से नहीं की गई और इसमें आरोपी के पक्ष में पक्षपात दिखता है, जिसके कारण कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की गई. एजेंसी ने अपनी प्रोटेस्ट पिटीशन में कहा कि अगर कोर्ट इस रिपोर्ट को मान लेता, तो मनी लॉन्ड्रिंग जांच जारी रखने के लिए ज़रूरी मूल अपराध (predicate offence) “दफन” हो जाता.

अपनी अभियोजन शिकायत (चार्जशीट) में एजेंसी ने आरोप लगाया कि घई और उनकी दो फर्म—ब्लेसिंग कंसल्टेंसी और जीएनडी कंसल्टेंसी सर्विसेज—के तीन बैंक खातों में 2016 से 2018 के बीच कुल 3.24 लाख रुपये जमा हुए.

एजेंसी ने आरोप लगाया कि यह पैसा उसी समय सैकड़ों लोगों से “वर्क वीज़ा” दिलाने के नाम पर लिया गया था, लेकिन वीज़ा कभी नहीं मिला, जिसके कारण एफआईआर दर्ज हुई.

एजेंसी ने उसी समय के दौरान लुधियाना में घई द्वारा खरीदी गई 10 संपत्तियों की सूची भी दी, जबकि उसी समय उसकी कानूनी घोषित आय सिर्फ 22 लाख रुपये थी.

एजेंसी ने आगे आरोप लगाया कि घई ने अक्टूबर 2024 में पूछताछ के दौरान खुद माना था कि उसने पंजाब ट्रैवल प्रोफेशन रेगुलेशन एक्ट, 2012 (पंजाब प्रिवेंशन ऑफ ह्यूमन स्मगलिंग एक्ट, 2012) के तहत पंजाब सरकार से लाइसेंस लिया था, न कि इमीग्रेशन एक्ट, 1983 के तहत.

इसलिए, एजेंसी ने कहा कि उसके पास लोगों के लिए वीज़ा की व्यवस्था करने का अधिकार नहीं था.

एजेंसी ने अपनी प्रोटेस्ट पिटीशन में यह भी कहा कि अप्रैल 2023 में लुधियाना में घई के खिलाफ एक केस दर्ज हुआ था, जिसमें आरोप था कि उन्होंने अपने एक पीड़ित को हथियार से धमकाया.

एजेंसी ने यह भी मुद्दा उठाया कि गवाहों का मुकर जाना और ट्रायल के दौरान कोर्ट में पेश न होना इस बात का संकेत है कि घई ने गवाहों और ट्रायल की प्रक्रिया को प्रभावित किया.

एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि पंजाब पुलिस ने कभी भी घई द्वारा वीज़ा सेवाओं के लिए लिए गए बहुत ज्यादा पैसे की जांच नहीं की, जबकि एजेंसी के अनुसार, आरोपी के बैंक खाते में बड़ी मात्रा में कैश जमा होना इसका सबूत है.

पंजाब पुलिस की कैंसिलेशन रिपोर्ट के इस आधार के उलट, जिसमें कहा गया था कि एजेंसी ने जांच जारी रखने के लिए कोई “नया सबूत या सामग्री” नहीं दी, एजेंसी ने आरोप लगाया कि पुलिस “PMLA, 2002 की धारा 66(2) के तहत इस निदेशालय द्वारा दिए गए सबूतों की सही तरीके से जांच करने में साफ तौर पर विफल रही.”

ईडी ने अपनी प्रोटेस्ट पिटीशन में कहा, “इस एफआईआर से जुड़ी खराब और अधूरी जांच के बाद 01.04.2025 की कैंसिलेशन रिपोर्ट जांच एजेंसी द्वारा इस माननीय अदालत में दाखिल की गई. आवेदक द्वारा जांच एजेंसी को सामग्री देने के बावजूद, कैंसिलेशन रिपोर्ट में कई कमियां हैं और इसमें आरोपी के पक्ष में पक्षपात दिखता है, जो खराब जांच को दिखाता है.”

एजेंसी ने आगे कोर्ट से कहा, “इसलिए, आवेदक यहां जांच एजेंसी द्वारा पहले दी गई कैंसिलेशन रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल कर रहा है. याचिकाकर्ता न्याय में गलती होने से रोकने के लिए हस्तक्षेप चाहता है, क्योंकि क्लोजर रिपोर्ट चल रही PMLA कार्यवाही के लिए जरूरी मूल अपराधों को खत्म कर देती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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