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Saturday, 31 January, 2026
होमदेश'US में कंपनी के पैसों से बेटियों की फीस दी': ED के अनिल अंबानी की RCOM के पूर्व निदेशक पर आरोप

‘US में कंपनी के पैसों से बेटियों की फीस दी’: ED के अनिल अंबानी की RCOM के पूर्व निदेशक पर आरोप

एजेंसी ने गुरुवार को पुनीत गर्ग को RCOM और उसकी सब्सिडियरी कंपनियों से जुड़े 40,000 करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में PMLA के तहत गिरफ्तार किया.

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नई दिल्ली: अपनी अमेरिका में रहने वाली बेटियों की यूनिवर्सिटी फीस के लिए करीब 40,436 डॉलर का पेमेंट करना और कंपनी की विदेशी सब्सिडियरी के मालिकाना हक वाले मैनहट्टन अपार्टमेंट से 36,560 डॉलर के किराये की इनकम को उनके पर्सनल खर्चों के लिए इस्तेमाल करना—ये रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) के पूर्व डायरेक्टर पुनीत गर्ग पर प्रवर्तन निदेशालय के मुख्य आरोप थे.

एजेंसी ने आरोप लगाया है कि रिलायंस कम्युनिकेशंस में वरिष्ठ प्रबंधन पदों पर रह चुके गर्ग ने कंपनी की विदेशी सब्सिडियरी के स्वामित्व वाले मैनहैटन अपार्टमेंट को बेच दिया और फर्जी समझौतों के जरिए अमेरिका से संयुक्त अरब अमीरात में करीब 70 करोड़ रुपये की राशि भेजी.

ये जानकारियां केंद्रीय जांच एजेंसी ने दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में उस समय पेश कीं, जब उसने गुरुवार को गिरफ्तार किए गए गर्ग की 14 दिन की हिरासत मांगी. विशेष अदालत ने गर्ग को एजेंसी की नौ दिन की हिरासत में भेज दिया.

यह गिरफ्तारी रिलायंस ग्रुप की कंपनियों से जुड़े एक बड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच का हिस्सा है, जिसमें आरोप है कि अनिल अंबानी के नियंत्रण और प्रबंधन वाली इन कंपनियों ने भारतीय स्टेट बैंक सहित कई बैंकों से लिए गए 40,000 करोड़ रुपये से अधिक के फंड का कथित रूप से दुरुपयोग किया.

गर्ग की गिरफ्तारी जिस मनी लॉन्ड्रिंग मामले में हुई, उसकी शुरुआत पिछले साल अगस्त में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज एक एफआईआर से हुई थी. यह एफआईआर अनिल अंबानी, रिलायंस कम्युनिकेशंस और अज्ञात लोक सेवकों के खिलाफ दर्ज की गई थी. एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि एसबीआई ने 2002 से 2018 के बीच रिलायंस कम्युनिकेशंस को 6,500 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज दिया था, जो बाद में एनपीए बन गया. कुल मिलाकर, रिलायंस ग्रुप की विभिन्न कंपनियों पर बैंकिंग कंसोर्टियम का 40,000 करोड़ रुपये से अधिक बकाया था.

एजेंसी की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक जोहेब हुसैन और साइमन बेंजामिन ने अदालत में दलील दी कि गर्ग 2006 से अहम निर्णय लेने वाले पदों पर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि गर्ग 2006 से 2013 तक आरकॉम के ग्लोबल एंटरप्राइज बिजनेस के प्रेसिडेंट रहे. 2014 से 2017 के बीच उन्होंने प्रेसिडेंट (रेगुलेटरी अफेयर्स) के तौर पर काम किया और फिर 2017 से 2019 तक उन्हें एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नियुक्त किया गया.

मनी ट्रेल और विदेशी कंपनियों का जाल

अपनी रिमांड अर्जी में एजेंसी ने कहा कि गर्ग ने कैलिफोर्निया और अमेरिका के अन्य हिस्सों की यूनिवर्सिटियों में पढ़ने वाली अपनी बेटियों की कॉलेज फीस के तौर पर 40,486.43 डॉलर का भुगतान किया.

एजेंसी के अनुसार, यह भुगतान उस 100 करोड़ रुपये में से किया गया था, जो आरकॉम ने अपनी अमेरिका स्थित सब्सिडियरी रिलायंस कम्युनिकेशंस इंटरनेशनल इंक को भेजे थे.

एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि रिलायंस कम्युनिकेशंस की एक अन्य सब्सिडियरी बोन (BONN) के निदेशक के रूप में गर्ग ने कंपनी के स्वामित्व वाले मैनहैटन अपार्टमेंट को एक अमेरिका स्थित रियल एस्टेट ब्रोकर को बेच दिया.

इस सौदे से करीब 70 करोड़ रुपये की राशि मिली, जिसे बोन और रियल एस्टेट ब्रोकरों के बीच एक फर्जी निवेश समझौते के जरिए यूएई भेज दिया गया. एजेंसी ने अपनी रिमांड अर्जी में कहा कि ये सभी लेनदेन उस समय किए गए, जब रिलायंस ग्रुप नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के सामने दिवालिया कार्यवाही से गुजर रहा था.

एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि गर्ग ने जांच अधिकारी द्वारा जारी कई समन को नजरअंदाज किया, जबकि खराब स्वास्थ्य के आधार पर उनके स्थगन के अनुरोध स्वीकार किए गए थे. एजेंसी ने यह भी कहा कि चूंकि उनकी बेटी अमेरिका में रहती है, इसलिए उन्हें फरार होने का खतरा माना गया.

नौ दिन की हिरासत देने के आदेश में विशेष न्यायाधीश अजय कुमार ने कहा, “कहा गया है कि अपराध की आय (पीओसी) की बड़ी राशि विदेशी संस्थाओं को भेजी गई है और अन्य व्यक्तियों की भूमिका का पता लगाने के लिए आरोपी की हिरासत में पूछताछ जरूरी है, साथ ही उसे बड़े पैमाने पर मौजूद डेटा और अन्य लोगों से आमने-सामने कराया जाना है.

“इसलिए, इन परिस्थितियों में यह अदालत मानती है कि उपरोक्त उद्देश्य के लिए आरोपी की हिरासत उचित है,” न्यायाधीश ने कहा.

इसके विपरीत, गर्ग की ओर से पेश वकीलों, जिनमें वरिष्ठ अधिवक्ता मनु शर्मा और विजयेंद्र प्रताप सिंह शामिल थे, ने दलील दी कि वह आरकॉम की सब्सिडियरी में केवल एक नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर थे और आरकॉम या उसकी सब्सिडियरीज के रोजमर्रा के कामकाज के लिए जिम्मेदार नहीं थे. इसलिए बैंक से कर्ज जुटाने की प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

उन्होंने यह भी कहा कि मैनहैटन अपार्टमेंट कथित अपराध की आय से नहीं खरीदा गया था और उसकी बाद की बिक्री से जुड़े आरोपों का मौजूदा जांच से कोई सीधा संबंध नहीं है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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