नई दिल्ली: बुधवार को संसद में पेश स्थायी समिति की रिपोर्ट में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के स्मारकों में स्टाफ की कमी, हैदराबाद के चारमीनार की स्थिति, बोधगया में रुका हुआ पुनर्स्थापन कार्य, औपनिवेशिक काल की विरासत इमारतों को गिराए जाने और नई दिल्ली के सेंट्रल सेक्रेटेरिएट के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में प्रस्तावित युगे-युगीन भारत म्यूजियम के लिए योजना की कमी पर चिंता जताई गई.
परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी स्थायी समिति ने 2026-27 के लिए संस्कृति मंत्रालय के बजट पर अपनी रिपोर्ट में कहा कि ASI द्वारा संरक्षित स्मारकों पर साइट पर कोई स्टाफ मौजूद नहीं है. मौखिक साक्ष्य पेश करते समय पैनल के सदस्यों ने चिंता जताई कि कर्मचारियों की कमी के कारण स्मारकों का इस्तेमाल “शौच/पेशाब करने की जगह” के रूप में किया जा रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार एएसआई 38 क्षेत्रीय सर्किलों में 3,685 केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों का रखरखाव करता है.
स्टाफ की कमी केवल एएसआई तक सीमित नहीं है; समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि संस्कृति मंत्रालय के सभी विभागों में भारी कमी है. भोपाल स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, जो मंत्रालय के अधीन एक संस्थान है, में 30.51 प्रतिशत पद खाली हैं और उसके संग्रह का केवल 26 प्रतिशत ही प्रदर्शित किया गया है.
ये आंकड़े 2024 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट से लिए गए हैं. मंत्रालय ने अभी तक कैग रिपोर्ट पर अंतिम जवाब जमा नहीं किया है.
संसदीय समिति ने कार्रवाई रिपोर्ट जमा न करने को “गंभीर मामला” बताया और अनुपालन के लिए 90 दिन की समय सीमा तय की.
चिह्नित कमियां
हैदराबाद के चारमीनार—1591 में मोहम्मद कुली कुतुब शाह द्वारा बनवाई गई ASI सूचीबद्ध विरासत संरचना—के बारे में पैनल ने कहा कि स्मारक के पीछे का इलाका पेशाबघर के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है और मंत्रालय से तुरंत उठाए गए कदमों का विवरण मांगा.
बोधगया, जो बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है और 2002 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है—वहां मंदिर परिसर में पुनर्स्थापन परियोजना के लिए 2014 में 1.68 करोड़ रुपये जमा किए गए थे. हालांकि, अब तक कोई काम शुरू नहीं हुआ और सामग्री एक दशक से अधिक समय से वहां बिना इस्तेमाल पड़ी है. इसे नोट करते हुए संसदीय समिति ने एएसआई को मामला सुलझाने और स्थिति रिपोर्ट देने का निर्देश दिया.
पैनल की रिपोर्ट में 74 जिला कलेक्ट्रेट इमारतों को गिराए जाने का भी ज़िक्र किया गया है. इनमें से कई इमारतें ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की हैं और एएसआई के संरक्षण में नहीं हैं, इसलिए वे विरासत कानून के दायरे से बाहर हैं.
पैनल ने दरभंगा की 150 साल पुरानी इमारत, पटना क्लॉक टावर और गोवा के चर्च व चैपल को खतरे में पड़ी विरासत के उदाहरण के रूप में बताया. बिहार का सासाराम किला, जिसे 16वीं सदी में शेर शाह सूरी ने बनवाया था और जहां उनका मकबरा भी है, को वर्तमान में उपेक्षा का उदाहरण बताया गया, जहां न रखरखाव हो रहा है और न ही संरक्षण.
पैनल ने सिफारिश की कि संस्कृति मंत्रालय राज्य सरकारों के साथ मिलकर ASI के बाहर की जोखिम वाली विरासत संरचनाओं की सूची तैयार करे. साथ ही मंत्रालय से कहा गया कि सांस्कृतिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या नष्ट करने पर दंड का प्रावधान जरूरी है या नहीं, इसकी जांच करे.
इसके अलावा पैनल ने रक्षा, रेलवे, नागरिक उड्डयन और बंदरगाह, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालयों के साथ समन्वय करने को कहा, ताकि उनके पास मौजूद विरासत संपत्तियों जैसे रेल इंजन, जहाज और विमान को सुरक्षित रखा जा सके.
प्रस्तावित युगे-युगीन भारत म्यूजियम के बारे में संसदीय समिति ने कहा कि फरवरी में 2026-27 के अनुदान की मांग पर मौखिक साक्ष्य के दौरान संस्कृति मंत्रालय ने विस्तृत परियोजना योजना, समय-सीमा या बजट का विवरण प्रस्तुत नहीं किया.
प्रस्तावित युग युगीन भारत म्यूजियम, जिसका अर्थ मोटे तौर पर “युगों-युगों का भारत” है, सरकार का प्रस्तावित राष्ट्रीय संग्रहालय है, जिसमें प्रागैतिहासिक काल से लेकर वर्तमान तक भारतीय सभ्यता के इतिहास को दिखाया जाएगा. इसे सेंट्रल सेक्रेटेरिएट के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में बनाया जाना है, जहां पहले वित्त और गृह मंत्रालय के कार्यालय थे. इन कार्यालयों को सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत बने नए भवनों में शिफ्ट किया जा रहा है, जिसमें संसद भवन का पुनर्निर्माण और कर्तव्य पथ के आसपास के क्षेत्र का नया डिजाइन भी शामिल है.
सरकार ने युगे-युगीन भारत को वॉशिंगटन के स्मिथसोनियन या पेरिस के लौवर जैसे संस्थानों के बराबर बताया है. 1927 में बने नॉर्थ और साउथ ब्लॉक, जिन्हें हर्बर्ट बेकर ने डिजाइन किया था, खुद भी विरासत संरचनाएं हैं. इन्हें संग्रहालय में बदलने के लिए अंदर बड़े बदलाव करने होंगे, जबकि बाहरी ढांचे को सुरक्षित रखना होगा.
संसदीय समिति ने समय-सीमा, संग्रहालय के प्रबंधन की व्यवस्था और संग्रह जुटाने की रणनीति के साथ विस्तृत परियोजना योजना देने को कहा.
संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि मंत्रालय की पहले की जानकारी में किला राय पिथौरा में लाइट एंड लोटस प्रदर्शनी को संग्रहालय के गुणवत्ता मानक के रूप में बताया गया था. इस प्रदर्शनी में पिपरहवा बौद्ध अवशेष दिखाए गए हैं, जिन्हें भारत 127 साल बाद हांगकांग से वापस लाया. ये अवशेष 1898 में मिले थे और इन्हें बुद्ध के सबसे पुराने अवशेषों में माना जाता है. ये 30 जुलाई 2025 को भारत पहुंचे. हालांकि मंत्रालय ने काम रुकने की कोई वजह नहीं बताई.
2026 से 2031 तक 16वें वित्त आयोग चक्र के लिए मंत्रालय के प्रस्तावित पुनर्गठन में इस संग्रहालय को एक अलग योजना के रूप में शामिल किया गया है. इस परियोजना से जुड़ी व्यापक बुनियादी ढांचा योजना में पांच साल में 12,000 करोड़ रुपये से अधिक निवेश का प्रस्ताव है. मंत्रालय ने पहले कहा था कि अगर व्यय वित्त समिति की मंजूरी मिल जाती है, तो इस योजना का फंड मौजूदा 569 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 2,000 करोड़ रुपये सालाना हो सकता है.
पॉलिसी और प्लान
चूंकि, ASI द्वारा प्रबंधित स्मारक टिकट से लगभग 365 करोड़ रुपये सालाना कमाते हैं, जो सामान्य सरकारी खजाने में जाता है, संसदीय समिति ने मंत्रालय से छह महीने के भीतर रिंग-फेंसिंग तंत्र प्रस्तावित करने को कहा है. इससे एक सुरक्षित, अलग व्यवस्था बनेगी, जिसमें धन का एक हिस्सा तय उद्देश्यों के लिए सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि टैक्स दक्षता के अनुसार उसका संरक्षण या प्रबंधन किया जा सके.
सभी 3,685 केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों पर टिकट नहीं लगता; मंत्रालय की पहले की जानकारी में कहा गया था कि अभी 143 स्मारकों पर टिकट व्यवस्था है, जिसे बढ़ाकर 200 करने की योजना है.
संसदीय समिति ने प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम को जल्द पारित करने की भी मांग की, जिससे संरक्षित स्मारकों के आसपास 100 और 200 मीटर के बफर जोन को अधिक लचीला बनाया जा सके.
सरकार ने संशोधन तैयार कर लिया है, लेकिन अभी इसे संसद में पेश नहीं किया गया है.
किसी संरक्षित स्मारक से 100 मीटर के भीतर किसी भी निर्माण या मरम्मत के लिए ASI की अनुमति ज़रूरी होती है. कानून के तहत 200 मीटर के भीतर भी नियमन के साथ अनुमति ज़रूरी होती है.
पैनल ने मंत्रालय से कहा कि वित्त वर्ष खत्म होने तक ASI का संरक्षण खर्च पिछले वर्षों के स्तर तक पहुंचे, यह सुनिश्चित किया जाए. 2021 से 2024 के बीच ASI का संरक्षण खर्च 99 प्रतिशत से अधिक उपयोग में रहा, जिसमें सालाना बजट 270 करोड़ रुपये से 443 करोड़ रुपये के बीच था. नवंबर 2025 तक चालू वित्त वर्ष में 346.15 करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले 67.17 प्रतिशत खर्च हुआ था.
मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, अब 55 केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों पर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत सॉवेनियर (स्मृति चिन्ह) की दुकानें हैं, और मौजूदा 143 टिकट वाले स्मारकों को बढ़ाकर 200 करने की योजना है. निजी और कॉरपोरेट दान के जरिए संरक्षण कार्य करने वाले नेशनल कल्चर फंड को फिर से संरचित किया गया है, जिसमें सीधे दाता-आर्किटेक्ट मॉडल बनाया गया है. मंत्रालय ने 15 से 16 संरक्षण आर्किटेक्ट को पैनल में शामिल किया है. दाता पैनल में शामिल आर्किटेक्ट चुन सकते हैं, स्मारक चुन सकते हैं और ASI की निगरानी में संरक्षण कार्य के लिए फंड दे सकते हैं.
मंत्रालय अगले वित्त वर्ष में 8 से 10 अंडरवॉटर आर्कियोलॉजी अभियानों की भी योजना बना रहा है, जिसमें नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी, भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ सहयोग होगा. इन अभियानों में तमिलनाडु तट के पास 17वीं सदी के जहाज के मलबे पर डेनमार्क के साथ एक संयुक्त परियोजना भी शामिल है.
पैनल ने 90 दिनों के भीतर एक एक्शन प्लान देने की सिफारिश की, जिसमें खोजों को प्रदर्शित करने की रणनीति भी शामिल हो.
इसके अलावा संसदीय समिति ने मंत्रालय से एक रिपैट्रिएशन रोडमैप तैयार करने को कहा, जिसमें विदेशों में मौजूद भारतीय प्राचीन वस्तुओं की प्राथमिकता वाली अंतरराष्ट्रीय सूची बनाई जाए और स्वेच्छा से वापसी के लिए एक सेल्फ-सरेन्डर पोर्टल विकसित किया जाए.
रिपैट्रिएशन पर मंत्रालय ने पहले बताया था कि हाल के वर्षों में अमेरिका ने कई वस्तुएं लौटाई हैं और नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी आने वाले महीनों में 8 से 10 और वस्तुएं वापस कर सकते हैं.
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों के बारे में मंत्रालय ने पहले बताया था कि भारत के पास अभी 44 सूचीबद्ध स्थल हैं, जिससे वह दुनिया में छठे स्थान पर है. 2025 में इसमें सबसे नया शामिल स्थल मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स ऑफ इंडिया है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
