Monday, 24 January, 2022
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कोरोना में मरने वाले बहुत कम आंगनबाड़ी कर्मियों को UP सरकार ने दी है 50 लाख की मदद, परिवारों का दावा

उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल मई में 72 ऐसी आंगनबाड़ी कर्मियों की मृत्यु के एवज में 50-50 लाख रूपए सहायता राशि घोषणा की थी जिनकी कोविड ड्यूटी के दौरान मौत हो गयी थी. सरकार का कहना है कि अब तक सिर्फ 12 परिवारों जो यह पैसा मिला पाया है

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में कोविड के एक बार फिर बढ़ते मामलों के बीच, राज्य की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता न केवल अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंतित हैं, बल्कि उनका यह भी कहना है कि वे योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा ‘छला गया‘ महसूस करती हैं.

उनके अनुसार, राज्य सरकार ने इस साल के चुनावों को ध्यान में रखते हुए उनसे कई वादे किए हैं लेकिन इसने अभी उन आंगनवाड़ी कर्मचारियों के परिवारों को मुआवजा देने के अपने उन वायदों को भी पूरा नहीं किया है. पहले की दो कोविड लहरों के दौरान अग्रिम पंक्ति (फ्रंटलाइन) के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के रूप में काम करते हुए अपनी जान गंवाने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सरकार ने मुआवजा देने का वादा किया था.

पिछले साल मई में, कोविड की घातक दूसरी लहर की शुरुआत के साथ यूपी सरकार ने घोषणा की थी कि कोविड से संक्रमित होने के बाद मरने वाले सभी 72 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के परिवारों को मुआवजे के रूप में 50-50 लाख रुपये दिए जाएंगे.

यूपी में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर जांच करने, दवा की किट बांटने  और जिला अधिकारियों के साथ इस बीमारी के लक्षण वाले लोगों के बारे में अद्यतन जानकारी (अपडेट) साझा करने का काम सौंपा गया था.

हालांकि कई आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सरकार के वादों को लेकर अब संशय में हैं और उनका दावा है कि 50 लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा के सात महीने बाद भी बहुत कम परिवारों को यह राशि मिल पायी है.

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दिप्रिंट ने इस राशि के जारी किये जाने की वर्तमान स्थिति के बारे में पता लगाने के लिए एकीकृत बाल विकास सेवा (इंटेग्रेडेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज – आईसीडीएस) – जिसके तहत आंगनवाड़ी संचालित होती हैं – हमने उनके कई अधिकारियों को फोन किया. लेकिन हम केवल इसके संयुक्त परियोजना समन्वयक सेराज अहमद से ही प्रतिक्रिया प्राप्त करने में कामयाब हुए, जिन्होंने बताया कि अभी तक केवल ‘12 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और एक सहायिका को यह मुआवजा राशि मिली है.’

जब उनसे इन 13 लाभार्थी परिवारों का विवरण प्रदान करने का अनुरोध किया गया, तो अहमद ने दिप्रिंट को बताया कि इस बारे में किसी भी जानकारी को जारी करने से पहले उन्हें अपने वरिष्ठ अधिकारियों से आधिकारिक स्वीकृति लेने की आवश्यकता होगी.

दिप्रिंट ने टेक्स्ट (मोबाइल सन्देश) के जरिए उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (सूचना) नवनीत सहगल से संपर्क किया, लेकिन उनसे भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

पिछले कुछ समय के दौरान, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री यहां के आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और उनके सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यों की प्रशंसा करते रहे हैं. पिछले साल सितंबर में उन्होंने आंगनबाडी कार्यकर्ताओं के बीच 1.23 लाख स्मार्टफोन बांटे थे और अपनी रैलियों में भी अक्सर उनके योगदान का जिक्र करते हैं. इसी 3 जनवरी को, योगी आदित्यनाथ ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए 2,500 रुपये की वेतन वृद्धि के साथ-साथ उनके कोविड से संबंधित कार्यों के लिए 500 रुपये के ‘प्रोत्साहन भत्ता’ की घोषणा की है, जो मार्च 2022 तक प्रभावी रहेगा.

उन्होंने भारत के इस सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में कोविड के प्रसार को रोकने हेतु उनके प्रयासों के लिए भी उन्हें धन्यवाद दिया.

बता दें कि इस साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां सभी राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

इस महीने पंजाब की कांग्रेस सरकार ने आंगनवाड़ी कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन में बढ़ोतरी की घोषणा की, जबकि आम आदमी पार्टी (आप) ने भी सत्ता में आने पर उनकी स्थिति बेहतर करने का वादा किया है. गोवा में, पिछले महीने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा की गई हड़ताल के बाद मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने दावा किया कि उनकी ‘90 प्रतिशत’ मांगें पूरी कर दी गई हैं.

‘वे सिर्फ टीवी कैमरों के सामने ही हमारी तारीफ करते हैं’

21 मई 2021 को जारी किये गए एक पत्र में, यूपी के बाल विकास और पोषण विभाग- जो राज्य में आईसीडीएस कार्यक्रमों को लागू करता है – इसकी निदेशक, सारिका मोहन ने सभी जिलाधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि सभी 72 मृतक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के परिवारों को वायदे के अनुसार 50- 50 लाख रुपये की धन राशि प्रदान की जाये. हालांकि, इसके बाद के सात महीने बीत जाने के बाद भी इस मामले में बहुत कम प्रगति हुई है.

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के एक संघ, यूपी आंगनबाड़ी कर्मचारी एवं सहायिका संघ की प्रमुख सरिता सिंह ने दिप्रिंट को बताया कि ‘कम से कम 72’ कार्यकर्ता मारे गए थे, लेकिन उनमें से अधिकांश की परिवारों को मुआवजा नहीं मिला है.

सिंह, जो कर्मचारी संघों के एक राष्ट्रीय स्तर के अम्ब्रेला आर्गेनाईजेशन – कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ फ्री ट्रेड यूनियन ऑफ़ इंडिया (सीएफटीयूआई) – की सदस्य भी हैं, उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘जब भी हमने जिलाधिकारियों के कार्यालयों से संपर्क किया, तो हमें या तो यह बताया गया कि दस्तावेज़ यह साबित नहीं करते हैं कि इस कार्यकर्ता की मृत्यु कोविड की वजह से हुई है या फिर हमें सिर्फ खोखला आश्वासन दे दिया गया.’

उनके अनुसार, आंगनबाडी कार्यकर्ता अब कोविड ड्यूटी में शामिल होने से कतरा रही हैं. वे कहती हैं, ‘उनमें से कई ने दूसरों को बचाते हुए अपनी जान दी. उनके परिवार के सदस्यों को भी उनसे वायरस का संक्रमण हुआ और उन्हें समय पर अस्पताल का बेड भी नहीं मिल पाया. इन सबके बाद आप इस बात को कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि कार्यकर्ता प्रेरणा से भरे रहें?’

सिंह ने यह भी कहा कि सरकार आंगनबाडी कार्यकर्ताओं को सिर्फ वोट बैंक के तौर पर देखती है.

सिंह कहती हैं, ‘कई कार्यकर्ता सोचते हैं कि फर्ज की राह में मरना व्यर्थ है, क्योंकि उनके बच्चे अकेले होंगे और सरकार उनकी कोई देखभाल भी नहीं करेगी. वे केवल टीवी कैमरों के सामने और चुनावों के दौरान ही हमारी प्रशंसा करते हैं. हमारे जीने या मरने की उन्हें कोई परवाह नहीं है.’

‘यूपी सरकार ने अस्पताल का बिल तक नहीं चुकाया

42 वर्षीय संजीव गौतम ने पिछले साल 21 अप्रैल को अपनी पत्नी ममता निगम को खो दिया था. 2004 से आंगनबाडी कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत 42 वर्षीय ममता निगम अप्रैल 2021 के पहले सप्ताह से आजमगढ़ जिले में कोविड ड्यूटी पर तैनात थी.

गौतम ने दिप्रिंट को बताया, ‘मेरी पत्नी मुझसे कहती थी कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सैनिकों की तरह होती हैं. उनका कर्तव्य है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को बचाया जाए, भले ही इसका अर्थ उनकी अपनी जान जोखिम में डालना ही क्यों न हो. वह एक शहीद है … वह छोटे बच्चों और उन लोगों की जान बचाते हुए मर गई जिनके पास कोई संसाधन नहीं था.’

गौतम के मुताबिक, उनकी पत्नी 12 अप्रैल से घर-घर जाकर लोगों की जांच कर रही थी, लेकिन तीन दिन बाद उनमें इस बीमारी के लक्षण दिखने लगे और उन्होंने खुद को घर में ही आइसोलेट कर लिया. 19 अप्रैल को उनका आरटी-पीसीआर टेस्ट की रिपोर्ट आने में तीन दिन लगे. कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने आजमगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज और सुपर फैसिलिटी अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली.

गौतम ने बताया, ‘हमें 24 घंटे से अधिक समय तक अस्पताल का बेड भी नहीं मिला. अगर यह हमें समय से मिला पाता, तो शायद उसे बचाया जा सकता था.’ यह बताते हुए कि उनकी पत्नी, जिन्हें वेतन के रूप में प्रति माह केवल 5,500 रुपये मिलते थे, ने अपनी ड्यूटी के दौरान भी अपने लिए मास्क और सैनिटाइज़र का स्वयं भुगतान किया, गौतम ने कहा, ‘सरकार ने राज्य के लिए आपातकालीन सेवाओं के दौरान मरने वालों के परिवारों को मुआवजा भी नहीं दिया है.’

योगी आदित्यनाथ के अपने निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर में, पांच बच्चों की मां और 48 वर्षीय लक्ष्मी गुप्ता के परिवार को भी इसी तरह की कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है. दिप्रिंट द्वारा प्राप्त किये गए आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, गुप्ता 14 अप्रैल से कोविड ड्यूटी पर तैनात थीं. 22 अप्रैल को उनका कोविड पॉजिटिव रपोर्ट आया और इसके बाद 1 मई को उन्होंने गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में इसी वायरस के संक्रमण की वजह से दम तोड़ दिया. लक्ष्मी गुप्ता उन आठ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं में से एक थीं, जिनकी गोरखपुर में ड्यूटी के दौरान कोविड की वजह से मौत हो गई थी.

उनकी 30 वर्षीय बेटी पूजा गुप्ता ने दिप्रिंट को बताया कि उनका परिवार आर्थिक रूप से घोर संकट में है.

पूजा गुप्ता बताती हैं, ‘हमने अपने पिता को कई साल पहले ही एक दुर्घटना की वजह से खो दिया था. हमारी मां परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य थी. वह खोराबाद में कोविड ड्यूटी पर तैनात थी, और 17 अप्रैल को उन्हें बुखार हो गया. उन्होंने सोचा कि यह ऐसे ही उतर जाने वाला सामान्य बुखार था. लेकिन, जब काफी समय तक बुखार नहीं उतरा, तो उन्होंने टेस्ट करवाया और फिर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया.’

उसने आगे कहा, ‘जब से उनकी मौत हुई है, हम अपने खाने के लिए भी गैर सरकारी संगठनों से मदद ले रहे हैं, और कभी-कभी खाली पेट ही सो जाते हैं. मेरी मां अगर ड्यूटी पर न होती तो आज जिंदा होती. लेकिन इस सरकार ने ड्यूटी पर शहीद हुए आंगनबाडी कार्यकर्ताओं के मेडिकल बिल भरने की भी जहमत नहीं उठाई.’

दिप्रिंट ने ममता निगम और लक्ष्मी गुप्ता दोनों के चिकित्सा दस्तावेज और मृत्यु प्रमाण पत्र देखे हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि उनकी मृत्यु कोविड के कारण ही हुई थी.

ढेर सारे कागजी कार्रवाई की जरूरत होती है, और हमेशा इसका फायदा भी नहीं होता

दिप्रिंट ने आईसीडीएस की संयुक्त निदेशक डॉ. चित्रा लेखा सिंह से भी संपर्क किया, लेकिन उन्होंने कहा कि वह मुआवजे से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे पाएंगी क्योंकि उन्होंने कुछ महीने पहले ही पदभार संभाला है. इसके बाद दिप्रिंट ने आईसीडीएस की अतिरिक्त निदेशक विभा चहल से भी संपर्क किया, जिन्होंने कहा कि वह एक चोट के कारण छुट्टी पर हैं, लेकिन उन्होंने संयुक्त परियोजना समन्वयक सेराज अहमद से बात करने की सिफारिश की.

अहमद ने दिप्रिंट को बताया कि मुआवजा प्राप्त करने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है.

अहमद ने कहा, ‘मुआवजे की राशि के लिए पात्र किसी भी परिवार को इसके लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी से उस आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की एक कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट और उनके विभाग के जिला प्रमुख से एक ड्यूटी रिपोर्ट प्राप्त करके इसे प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है. इसके बाद, इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर, संबंधित जिला मजिस्ट्रेट यूपी सरकार के राजस्व विभाग को मुआवजा राशि देने की सिफारिश करेंगे.’ साथ ही उन्होंने बताया कि अभी तक 12 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और एक सहायिका को मुआवजा मिला है.

बाकी परिवारों के बारे में पूछे जाने पर, अहमद ने कहा कि मुआवजा राशि के वितरित नहीं किए जाने के पीछे कई कारण हो सकते हैं.

अहमद ने कहा, ‘इस सारी प्रक्रिया का ज़िला स्तर पर ध्यान रखा जाता है और हम अभी चुनावी मोड में हैं, इसलिए हमारे पास उपलब्ध एकमात्र डेटा यही है. हो सकता है कि अन्य लोगों का मुआवजा प्रक्रिया के तहत (पाइपलाइन में) हो. या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उनमें से कुछ कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट ही प्रस्तुत न कर सकें हों, या शायद ड्यूटी के दौरान हुई उनकी मौत कोविड के वजह से न हुई हो.’

इन परिवारों के बारे में और ब्योरा देने का अनुरोध किये जाने पर अहमद ने कहा कि वह ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं हैं. इन परिवारों की सूची के बारे में पूछे जाने पर सारिका मोहन और विभा चहल ने भी हमारे फोन कॉल अथवा मोबाइल संदेशों का कोई जवाब नहीं दिया.


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