नई दिल्ली: “व्यापक, विस्तृत और भरोसेमंद”—यह राय यूनाइटेड किंगडम के हाई कोर्ट की थी, जो उसने भारत सरकार और जांच एजेंसियों द्वारा दी गई आश्वासनों पर व्यक्त की. इसी राय के आधार पर कोर्ट ने भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी की, भारत प्रत्यर्पण के खिलाफ अपने केस को फिर से खोलने की अपील को खारिज कर दिया.
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि ये आश्वासन—जिनमें लंदन स्थित भारतीय हाई कमीशन का एक ‘नोट वर्बेल’ (राजनयिक पत्र) भी शामिल था—राजनयिक स्तर पर “विचारणीय” थे. ऐसा इसलिए क्योंकि इन आश्वासनों का कोई भी उल्लंघन, दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में आपसी विश्वास और भरोसे के लिए “बेहद नुकसानदायक” साबित हो सकता था.
किंग्स बेंच डिवीजन की एक पीठ—जिसकी अध्यक्षता लॉर्ड जेरेमी स्टुअर्ट-स्मिथ और जस्टिस रॉबर्ट जे कर रहे थे—ने अपने फैसले में ये टिप्पणियां कीं. यह फैसला मोदी की उस याचिका को खारिज करते हुए सुनाया गया था, जिसमें उसने भारत प्रत्यर्पण को चुनौती देने के लिए अपने केस को फिर से खोलने की मांग की थी. केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को कई मामलों में मोदी की तलाश है; ये मामले पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के साथ किए गए 13,500 करोड़ रुपये के धोखाधड़ी से जुड़े हैं.
भारत ने जुलाई और अगस्त 2018 में—धोखाधड़ी का यह मामला सामने आने के कुछ महीनों बाद—प्रत्यर्पण के लिए अनुरोध भेजे थे. इसके बाद फरवरी 2020 में एक और अनुरोध भेजा गया. मोदी को मार्च 2019 में UK के अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार किया गया था, और तब से वह जेल में ही है.
उसके प्रत्यर्पण को सबसे पहले फरवरी 2021 में UK के एक जिला न्यायाधीश ने मंजूरी दी थी. न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा था कि उसके प्रत्यर्पण में कोई बाधा नहीं है, और उन्होंने संबंधित फाइल UK के विदेश सचिव को भेज दी थी, जिन्होंने अप्रैल 2021 में इसे मंजूरी दे दी. मोदी ने प्रत्यर्पण के इन आदेशों के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी, लेकिन नवंबर 2022 में हाई कोर्ट ने उसकी इस अपील को खारिज कर दिया.
लॉर्ड जेरेमी स्टुअर्ट-स्मिथ और जस्टिस रॉबर्ट जे ने अपने फैसले में कहा, “हमने इन आश्वासनों पर बेहद सावधानी और गंभीरता से विचार किया है. एक तरफ, दो मित्र देशों के बीच मौजूद आपसी विश्वास और भरोसे को—जिन्होंने आपस में बाध्यकारी संधि समझौते किए हैं—काफी महत्व दिया जाना चाहिए; और ठीक उसी तरह, उसी ढांचे के भीतर दिए गए गंभीर आश्वासनों को भी समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए.” “दूसरी ओर, हमें यह मानना होगा कि मिस्टर फिट्ज़गेराल्ड (मोदी के वकील) की इस दलील में कुछ दम है कि हमारे सामने पेश किए गए कुछ हलफ़नामे उन लोगों की तरफ़ से आए हैं, जिन्होंने भंडारी मामले के आधार पर, हिरासत में रखे गए लोगों के साथ होने वाले गलत बर्ताव को या तो नज़रअंदाज़ किया है या उस पर आंखें मूंद ली हैं. फिर भी, यह दलील ऐसे हालात में ज़्यादा दूर तक नहीं टिकती, जहां, जैसा कि हमने पाया है, भारत सरकार ने ये आश्वासन पूरी ईमानदारी से और इस इरादे से दिए हैं कि वे उन पर लागू होंगे. ये आश्वासन इस सोच के साथ नहीं दिए गए हैं कि अगर ज़रूरत या मौक़ा पड़े, तो इनसे पीछे हट जाया जाए,” उन्होंने आगे कहा.
आश्वासनों की लंबी सूची
प्रत्यार्पण के मामले को फिर से खोलने की मोदी की नई कोशिश UK हाई कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद आई, जिसमें भगोड़े हथियार डीलर संजय भंडारी के प्रत्यार्पण पर रोक लगा दी गई थी. संजय भंडारी पर मनी लॉन्ड्रिंग और काले धन से जुड़े मामले चल रहे हैं, जिनकी जांच ED कर रही है. UK कोर्ट ने भंडारी के प्रत्यार्पण पर रोक लगाते हुए जांच एजेंसियों द्वारा यातना दिए जाने के जोखिम और भारत की जेलों की खराब हालत का हवाला दिया था.
जब हाई कोर्ट में यह मामला शुरू हुआ, तो भारतीय अधिकारियों ने UK हाई कोर्ट को यह यकीन दिलाने की कोशिश में एक के बाद एक कई आश्वासन दिए कि मोदी पर सिर्फ़ विशेष अदालतों में मुक़दमा चलेगा और जांच अधिकारी उनसे कोई पूछताछ नहीं करेंगे.
सबसे पहले, पिछले साल सितंबर में विदेश मंत्रालय ने UK कोर्ट को यह आश्वासन दिया था कि “मोदी से पूछताछ करने का न तो कोई इरादा है और न ही कोई ज़रूरत, क्योंकि ये मामले अब मुक़दमे के लिए तैयार हैं.” मंत्रालय ने यह भी कहा था कि “भारतीय क़ानून के तहत न तो CBI और न ही ED को यह अधिकार है कि वे मोदी को उन अपराधों के सिलसिले में प्रत्यार्पित किए जाने के बाद उनसे पूछताछ करें, जिनके लिए उन्हें प्रत्यार्पित किया जा रहा है.” गृह मंत्रालय, जो प्रत्यर्पण प्रक्रियाओं के लिए नोडल मंत्रालय है, ने एक और ऐसा ही आश्वासन दिया. मंत्रालय ने कहा कि अगर किसी एजेंसी को मोदी से पूछताछ करने की ज़रूरत पड़ती है, तो यह UK की अदालतों या अधिकारियों की पहले से मंज़ूरी लिए बिना नहीं किया जाएगा. इसके बजाय, उन्हें सिर्फ़ न्यायिक कार्यवाही का सामना करने के लिए बुलाया गया है.
CBI और ED के अलावा, MHA ने यह भी आश्वासन दिया कि मोदी से किसी भी चल रहे आरोप या कार्यवाही के संबंध में अन्य एजेंसियों, जैसे कि सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO), डायरेक्टरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) और सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेज़ (CBDT)—जो आयकर विभाग की मूल संस्था है—द्वारा भी पूछताछ नहीं की जाएगी.
इन आश्वासनों के बाद, CBI और ED के अधिकारियों ने हाई कोर्ट के सामने अलग-अलग हलफ़नामे दिए. इन हलफ़नामों में कहा गया था कि, चूंकि ट्रायल कोर्ट पहले से ही मोदी के ख़िलाफ़ मामले की सुनवाई कर रही है, इसलिए किसी भी जांच एजेंसी की इसमें कोई भूमिका नहीं है.
दूसरी ओर, मोदी के वकील ने विशेषज्ञ गवाहों पर भरोसा किया—जिनमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज दीपक वर्मा की राय भी शामिल थी—और यह तर्क दिया कि जांच एजेंसियां सरकार से “स्वतंत्र” हैं, और इसलिए, कोई भी आश्वासन उन पर बाध्यकारी नहीं होगा.
इसके अलावा, उन्होंने वर्मा की इस दलील पर भी भरोसा किया कि गुजरात में DRI मामले में अदालतों द्वारा जारी किया गया प्रोडक्शन वारंट आर्थर रोड जेल के अधिकारियों पर बाध्यकारी होगा—वह जेल जहाँ प्रत्यर्पण की स्थिति में मोदी को रखा जाएगा. इस पर भारत सरकार के वकील ने पुष्टि की कि सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन सभी एजेंसियों पर लागू होते हैं, और यह सुनिश्चित करते हैं कि आगे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी.
UK हाई कोर्ट के फ़ैसले में कहा गया, “भंडारी मामले में इस अदालत का फ़ैसला, गुनाह कबूल करवाने के लिए प्रतिबंधित तरीकों के इस्तेमाल की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करता है, जिसे ‘आम और व्यापक’ बताया गया था.”
फ़ैसले में आगे कहा गया, “अगर सितंबर 2025 और फ़रवरी 2026 के बीच भारत सरकार द्वारा दिए गए बयान और आश्वासन न होते—जिनका समापन एक ‘नोट वर्बेल’ के रूप में हुआ, जिसे हम काफ़ी महत्व देते हैं—तो हम अपनी इस असाधारण शक्ति का इस्तेमाल करते हुए इस अपील को फिर से खोलने पर विचार करते.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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