scorecardresearch
Sunday, 16 June, 2024
होमदेशकेरल में दो प्रदर्शनों के पीछे क्या है कहानी, और अडानी का विझिंजम पोर्ट इसके केंद्र में क्यों है

केरल में दो प्रदर्शनों के पीछे क्या है कहानी, और अडानी का विझिंजम पोर्ट इसके केंद्र में क्यों है

लैटिन कैथोलिक चर्च के पादरियों के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी पिछले 136 दिनों से साइट पर डेरा डाले हैं और झड़पों में अब तक करीब 80 लोग घायल हो चुके हैं. एक थाने पर भी हमला हुआ है.

Text Size:

तिरुवनंतपुरम: करीब 30 प्रदर्शनकारी—जिनमें ज्यादातर गरीब मछुआरे और लैटिन कैथोलिक चर्च के पादरी शामिल हैं—टिन की छत वाले एक तंबू के नीचे छोटे-छोटे समूहों में बैठे हैं और टीवी पर चल रही खबरों से बेपरवाह अपने फोन स्क्रॉल करने या आपस में कुछ बातचीत करने में व्यस्त हैं. वहां से महज 50 मीटर की ही दूरी पर प्रदर्शनकारियों का एक और तंबू गड़ा हुआ है, जिसमें भजन-कीर्तन चल रहा है और भगवा झंडे हवा में लहराते नजर आ रहे हैं.

दूसरे तंबू में डेरा डाले लोग पहले तंबू में जुटे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अपना विरोध जता रहे हैं, यह हड़ताल अपनी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध केरल के लिए थोड़ी अप्रत्याशित घटना है.

विरोध-समर्थन में जारी इन प्रदर्शनों के केंद्र में है अरबपति गौतम अडानी के नेतृत्व वाला 7,700 करोड़ रुपये का विझिंजम पोर्ट प्रोजेक्ट, जिसके तहत भारत का पहला ‘मेगा ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल’ बनना है. इन दोनों विरोधी खेमों के बीच किसी तरह की तनातनी या टकराव के कारण केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के बाहरी इलाकों के गांवों में कोई सांप्रदायिक तनाव न फैल जाए, इसलिए दर्जनों दंगा-रोधी पुलिसकर्मी यहां तैनात किए गए हैं.

नजदीक ही स्थित एक चर्च के फादर दीपक (जो अपने पहले नाम से जाने जाते हैं) ने दिप्रिंट को बताया, ‘हम अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन दूसरा पक्ष इसे एक धार्मिक संघर्ष का रंग देने की कोशिश कर रहा है.’ उनके मुताबिक, बंदरगाह बनने से समुद्र का क्षरण होगा और मछुआरों के लिए समुद्र में मछलियां पकड़ना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में इन मछुआरों और उन लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा जिनकी ज़मीनें इस प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित की जाएंगी.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि केरल के अधिकांश लोगों के रोजमर्रा के जीवन में धर्म एक बड़ी भूमिका निभाता है, खासकर ईसाइयों और मुसलमानों के बीच, जो अपने आस-पड़ोस के सामान्य झगड़े और विवादों के निपटारे के लिए पादरियों और मौलवियों पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में जब यहां पर लैटिन कैथोलिक चर्च के हाई-रैंक पादरियों ने बंदरगाह के विरोध का फैसला किया, तो समुदाय के सदस्य तत्काल ही उनके साथ एकजुट हो गए.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

प्रदर्शनकारी पिछले 136 दिनों से साइट पर बैठे हैं. झड़पों में अब तक करीब 80 लोग घायल हो चुके हैं, एक थाने पर भी हमला हुआ है और ‘परस्पर वैमनस्य फैलाने’ को लेकर एक पादरी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है. यही नहीं ‘आतंकवादी’ और ‘देश-विरोधी’ जैसे आरोप भी लगाए जा रहे हैं.

The police station that was vandalised | Photo: Sharan Poovanna | ThePrint
पुलिस थाना जहां तोड़फोड़ की गई|फोटोः शरण पूवन्ना | दिप्रिंट

लेकिन विझिंजम पोर्ट प्रोजेक्ट ने कुछ ऐसा भी किया है जो राजनीतिक तौर पर अकल्पनीय है. पिछले महीने, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के ही सदस्यों ने सेव विझिंजम एक्शन काउंसिल के नेतृत्व में एक रैली में एक साथ मार्च किया था.

केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को बंदरगाह क्षेत्र के पास सुरक्षा बनाए रखने के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती के संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा. अडानी ने केंद्रीय बलों की तैनाती की मांग करते हुए अदालतों का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें दावा किया गया कि राज्य सरकार की तरफ से न तो पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है और न ही काम शुरू करने का रास्ता साफ करने के लिए प्रदर्शनकारियों को ही वहां से हटाया गया है. मामले के संबंध में अगली सुनवाई सात दिसंबर को होगी.


यह भी पढ़ेंः कैसे बेंगलुरु ऑटो चालकों ने देसी ऐप ‘नम्मा यात्री’ के सहारे, ऊबर-ओला को चुनौती देने की योजना बनाई


किस कीमत पर हो रहा विकास?

विझिंजम पोर्ट प्रोजेक्ट की परिकल्पना 1991 में की गई थी, जिसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी से विकसित किया जाना था. अडानी इस प्रोजेक्ट के लिए एकमात्र बोलीदाता थे और 2015 में ओमेन चांडी के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार के दौरान करार पर हस्ताक्षर किए गए थे.

इस प्रोजेक्ट पर दिसंबर 2015 में काम शुरू हो गया और बंदरगाह के पहले चरण का काम दिसंबर 2019 तक पूरा होने की उम्मीद थी, लेकिन विरोध प्रदर्शन, ब्रेकवाटर के लिए पत्थरों की कमी और कोविड-19 महामारी के कारण इसमें देरी हो गई.

पहले चरण में बंदरगाह की क्षमता 1 मिलियन टीईयू (ट्वेंटी-फुट इक्वीवैलैंट यूनिट) रहने की उम्मीद है और बाद के चरणों में इसे 6.2 मिलियन टीईयू और बढ़ाना है.

पोर्ट इंटरनेशनल शिपिंग लाइन से केवल 10 समुद्री मील की दूरी पर है, और ईस्ट-वेस्ट शिपिंग एक्सिस के काफी करीब होने के कारण श्रीलंका, दुबई और सिंगापुर जैसे अन्य समुद्री केंद्रों से अधिक व्यापार की भी संभावनाएं हैं. इससे राज्य के आर्थिक विकास में भी तेज़ी आने की उम्मीद की जा रही है.

प्रस्तावित बंदरगाह की प्राकृतिक गहराई 18 मीटर है, जो इसे बड़े जहाजों के आने और उनके जरिये बड़ी खेप लाए जाने में सक्षम बनाती है.

अडानी समूह ने कथित तौर पर एक बयान में कहा है, ‘स्वतंत्र विशेषज्ञों और संस्थानों के निष्कर्षों के आधार पर हमें लगता है कि इसके खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शन सुनियोजित हैं और राज्य के हितों और बंदरगाह के विकास के खिलाफ हैं.’

दिप्रिंट ने फोन के जरिये कंपनी प्रवक्ता से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए कोई टिप्पणी से इनकार कर दिया कि मामला अदालत में विचाराधीन है.

Cops at the protest site | Photo: Sharan Poovanna | ThePrint
प्रदर्शन स्थल पर तैनात पुलिसकर्मी|फोटोः शरण पूवन्ना | दिप्रिंट

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने गुरुवार को कहा, ‘अगर प्रोजेक्ट को बंद कर दिया जाता है तो इससे राज्य की साख को बुरी तरह नुकसान पहुंचेगा.’

उन्होंने कहा, ‘यह कदम (प्रदर्शन) सरकार के खिलाफ नहीं है. यह राज्य की प्रगति और एकता को बाधित करने वाला है. विरोध किसी भी रूप में क्यों न हो, इसकी अनुमति नहीं दी जाएगी. यह न सोचें कि सरकार को धमकाया जा सकता है. विझिंजम पोर्ट जरूर बनेगा.’

तिरुवनंतपुरम से करीब 200 किलोमीटर उत्तर, कोच्चि में जहाजों की आवाजाही के संदर्भ में क्षेत्र में एक कैब चालक लिजू कृष्णनकुट्टी का कहना है, ‘यदि यहां बंदरगाह बनता है, तो अधिकांश वस्तुओं के दाम कम हो जाएंगे.’

हालांकि, प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस पोर्ट से राज्य की कीमत पर दुनिया के तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति अडानी को ही लाभ होगा, क्योंकि शर्तों को 222 बिलियन डॉलर मार्केट कैप वाले समूह के हितों के अनुरूप ही निर्धारित किया गया है.

इस संदर्भ में, प्रोजेक्ट रोकने के लिए अदालत का रुख करने वाले और आंदोलन का प्रमुख चेहरा बने एक सामाजिक कार्यकर्ता जोसेफ विजयन ने 2016 की नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता और कई अन्य पहलुओं पर सवाल उठाये गए थे.

विजयन का दावा है,‘पहले 15 वर्षों तक अडानी समूह सरकार को कोई भी राजस्व भुगतान नहीं करेगा. इसके बाद 15वें साल से एक फीसदी के राजस्व भुगतान का प्रावधान किया गया है.’लेकिन केरल के बंदरगाह मंत्री के सचिवालय के एक सदस्य ने सीएजी रिपोर्ट को ‘पूर्वाग्रहपूर्ण’ बताकर खारिज कर दिया और आंदोलनकारियों को ‘राज्यद्रोही’ करार दिया.

नाम न छापने की शर्त पर उक्त सदस्य ने कहा, ‘लोगों को यह बताकर गुमराह किया जाता है कि यह अडानी का बंदरगाह है. जबकि यह केरल सरकार का है.’

रिपोर्टों के मुताबिक, अडानी समूह प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 7,700 करोड़ रुपये में से लगभग 2,500 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा, 4600 करोड़ रुपये का खर्च केरल सरकार वहन करेगी और 818 करोड़ रुपये वायबिलिटी गैप फंडिंग के माध्यम से जुटाए जाएंगे.

इस मामले में विजयन का कहना है कि 1600 करोड़ रुपये के ब्रेकवाटर का निर्माण केरल सरकार की तरफ से किया जा रहा है, प्रोजेक्ट के लिए रेल और सड़क संपर्क को भी मुख्य परियोजना लागत में शामिल नहीं किया गया है.

वहीं, विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट लिमिटेड (वीआईएसएल) के महाप्रबंधक (पर्यावरण) प्रसाद कुरियन ने कहा,‘परोक्ष और सामाजिक तौर पर यह देश के लाभकारी प्रोजेक्ट है.


यह भी पढ़ेंः कौन हैं कांग्रेस नेता सतीश जारकीहोली, जिनकी ‘हिंदू’ शब्द को गंदा बताने के लिए हो रही आलोचना


‘अपनी ही ज़मीन पर शरणार्थी’

अपनी और उन करीब 200 अन्य लोगों—जिनके बारे में उसका दावा है कि 2018 से वलियाथुरा में चार सीमेंट गोदामों में रह रहे हैं—की आपबीती सुनाते हुए सेसिली की आंखें नम हो आईं. उनका कहना था कि इन लोगों की ज़मीनें समुद्र की जद में आने की वजह से उन्हें बेघरों की तरह जीवन बिताना पड़ रहा है. यह क्षेत्र विझिंजम से कुछ किलोमीटर उत्तर में तटरेखा से लगभग 100 फीट की दूरी पर है. सेसिली ने कहा कि वहां थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पतली प्लास्टिक बांधकर अलग-अलग परिवारों के लिए थोड़ी जगह सुनिश्चित की गई है.

सरकार जहां इन परिवारों के बेघर हो जाने के लिए 2017 के ओखी चक्रवात को जिम्मेदार ठहराती है, वहीं प्रदर्शनकारियों का दावा है कि बंदरगाह निर्माण और ब्रेकवाटर के कारण समुद्री जलस्तर बढ़ना इसकी वजह है, क्योंकि इससे तलछट पर जमा रहने वाले पानी के पैटर्न में ही बदलाव आ गया है.

सेसिली ने मलयालम में कहा, ‘नम्मुदे नात्तिल नजंगल अभयर्थिकालायिरिक्कुन्नु (हम अपनी ही ज़मीन पर शरणार्थियों की तरह रह रहे हैं.)’

हालांकि, कईं सरकारी रिपोर्टों में दावा किया गया है कि बंदरगाह का कोई प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव नहीं होगा, लेकिन लगातार विरोध प्रदर्शन को देखते हुए केरल सरकार ने अक्टूबर में तटीय कटाव पर परियोजना के प्रभाव के अध्ययन के लिए चार सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था.

The godown shelter | Photo: Sharan Poovanna | ThePrint
वलियाथुरा गोडाउन शेल्टर | फोटोः शरण पूवन्ना | दिप्रिंट

बहरहाल, प्रदर्शनकारी सरकार के तमाम दावों से सहमत नहीं हैं.

वलियाथुरा गोडाउन शेल्टर में रहने वाली अल्फोंसिया ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, ‘हमें यहां रहने पर बाध्य कर देने वाले विधायक और अन्य लोगों से पूछिए कि क्या वो एक सेकेंड के लिए भी यहां रह सकते हैं. वो तो फादर की मेहरबानी से हमारे पास अपने परिवार के लिए दीवारें हैं.’अल्फोंसिया की बातें वहां के लोगों के गुस्से और पीड़ा को दर्शा रहीं थीं.

प्रदर्शनकारियों की मांग है कि समुद्री कटाव के कारण अपने घर गंवा देने वालों का पुनर्वास किया जाए, तटीय कटाव घटाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं, मछुआरों को मौसम की चेतावनी जारी किए जाने वाले दिनों में वित्तीय सहायता मिले, मछली पकड़ने के दौरान हादसों में जान गंवाने वालों के परिवारों को मुआवजा मिले, सब्सिडी वाला मिट्टी का तेल मुहैया करवाए जाए और साथ ही तिरुवनंतपुरम के अंचुथेंगु स्थित मुथलप्पोझी फिशिंग हार्बर की सफाई की व्यवस्था हो.

बंदरगाह मंत्री के कार्यालय ने बताया कि इस साल के शुरू में सरकार ने वलियाथुरा गोदामों में रहने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए 750 वर्ग फुट के फ्लैट बनाने और नए घर तैयार होने तक बतौर किराया 5,500 रुपये की राशि प्रदान करने संबंधी दो आदेश पारित किए थे. हालांकि, रियल एस्टेट मार्केट से जुड़े सूत्रों ने कहा कि इस शहर के लिहाज से यह राशि बहुत कम हैं, क्योंकि पोर्ट बनने के बाद उपलब्ध अवसरों के मद्देनजर यहां प्रॉपर्टी के दाम पहले से ही आसमान छूने लगे हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, किसी को भी विस्थापित नहीं किया गया था और तटरेखा श्रमिकों को मुआवजे के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. कुरियन ने कहा कि जो लोग सीपियों और अन्य समुद्री जीवों की तलाश में समुद्री किनारों में गोता लगाते हैं या इसी तरह की गतिविधियों में शामिल श्रमिक आदि बंदरगाह तक पहुंचने वाले स्थान या समुद्र तट का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं.

कुरियन ने कहा कि हालांकि, बंदरगाह के पास एक लॉजिस्टिक्स पार्क, एक ट्रक टर्मिनल और अन्य जरूरी ढांचागत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भूमि के कुछ हिस्सों का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन समुद्र तट के आसपास का इलाका निर्जन ही था.

दिप्रिंट से बातचीत करने वाले सरकारी प्रतिनिधियों समेत बंदरगाह-समर्थक समूहों का तर्क है कि आंदोलनकारी बुनियादी ढांचा परियोजना का उपयोग गरीबों के मन में डर बैठाने के लिए कर रहे हैं, क्योंकि आर्थिक विकास उन्हें ‘लिबरेट’ करेगा और इससे इन धार्मिकों संगठनों पर उनकी निर्भरता खत्म हो जाएगी.

वहीं, भाजपा और हिंदू एक्य वेदी जैसे समूह बंदरगाह आंदोलन का इस्तेमाल हिंदुत्व संगठनों के लिए समर्थन जुटाने के लिए कर रहे हैं. केरल में व्यापक स्तर पर द्विध्रुवीय राजनीति में भाजपा की निर्वाचित मौजूदगी बहुत कम या नहीं के बराबर ही है. यह अलग बात है कि वामपंथियों ने बंदरगाह मुद्दे पर प्रतिद्वंद्वी दक्षिणपंथियों के सुर में सुर मिलाया है.

पोर्ट-समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष तनावपूर्ण स्थिति के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं, जिसके कारण ही रविवार को विझिंजम थाने में तोड़फोड़ हुई. केंद्रीय एजेंसियों का मानना है कि इस विरोध-प्रदर्शन के पीछे कुछ ‘अनदेखी ताकतें’ हो सकती हैं.

बंदरगाह विभाग के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,‘कई अनदेखी और परोक्ष ताकतें इसके पीछे हैं जो भारत के विकास को रोकने के लिए पैसे देकर इन पादरियों को आगे खड़ा कर रही हैं.’

पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में भी 2011 में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र आंदोलन और 2018 में वेदांता फायरिंग मामले के दौरान इसी तरह की बातें सामने आई थीं.

हालांकि, सरकार और अडानी समूह तमाम कानूनी चुनौतियों से निपटने में सक्षम रहे हैं, जिसमें बंदरगाह निर्माण रोकने की मांग वाली याचिकाएं शामिल हैं. फिलहाल, ज़मीनी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है क्योंकि ब्रेकवाटर टेट्रापोड के कारण बंदरगाह क्षेत्र का प्रवेश द्वार ब्लॉक है.

अडानी ने पहले ही काफी पिछड़ चुकी इस परियोजना को फिर से शुरू करने के लिए अदालतों से राहत मांगी है, लेकिन सांप्रदायिक तनाव भड़कने की आशंका से सरकार प्रदर्शनकारियों को हटाने में असमर्थ रही है. प्रदर्शनकारी अगस्त से ही बंदरगाह के मुख्य प्रवेश द्वार के पास डेरा डाले हुए हैं.

बंदरगाह समर्थक समूह के एक वर्ग ने सरकार पर परियोजना के लाभों के बारे में लोगों को समझाने और मछुआरा समुदाय की तरफ से किए जा रहे विरोध को खत्म करने के लिए पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप लगाया है.

जोसेफ विजयन ने कहा, ‘अगर वे (सरकार) परियोजना की समीक्षा नहीं करते, तो यह भविष्य में इसके निर्माण की प्रक्रिया आसान साबित नहीं होगी.’

लेकिन बंदरगाह मंत्री का कार्यालय इस मामले में काफी आशावादी है.

केरल के बंदरगाह मंत्री अहमद देवरकोविल के एक प्रमुख सहयोगी ने कहा, ‘हमारे पास पहला जहाज सितंबर 2023 तक आ जाएगा. यह ओणम पर यहां लोगों के लिए एक उपहार होगा.’

(अनुवाद: रावी द्विवेदी | संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ेंः बेंगलुरू की बारिश और इंफ्रास्ट्रक्चर संकट के बाद इन्वेस्टर्स समिट से मदद की उम्मीद कर रही बोम्मई सरकार


 

share & View comments