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Monday, 5 January, 2026
होमदेश‘यह वेक-अप कॉल है’: एंजल चकमा की मौत के बाद देहरादून में डरे पूर्वोत्तर के छात्र

‘यह वेक-अप कॉल है’: एंजल चकमा की मौत के बाद देहरादून में डरे पूर्वोत्तर के छात्र

पिछले दो दशकों में देहरादून एजुकेशन हब बन गया है, जो देशभर के लाखों छात्रों को आकर्षित करता है, जिनमें पूर्वोत्तर के छात्र भी शामिल हैं. चकमा पर घातक जातीय हमला उनके बीच डर पैदा कर गया है.

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देहरादून: त्रिपुरा के रहने वाले रिस्टम देब्बर्मा ने हाई एजुकेशन के लिए देहरादून को इसलिए चुना था क्योंकि उन्हें यह शहर सुरक्षित लगता था, उन्होंने कहा, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. इसी महीने त्रिपुरा के ही 24-वर्षीय एंजल चकमा की जान लेने वाले नस्लीय हमले का ज़िक्र करते हुए देब्बर्मा सवाल करते हैं, “अगर यहां भी यह चलन बन गया, तो हम आखिर जाएंगे कहां?”

22-साल के देब्बर्मा ने देहरादून के अपने कॉलेज डॉल्फिन इंस्टिट्यूट के बाहर दिप्रिंट से कहा, “कई कारण थे कि मैंने देहरादून चुना. यह पूर्वोत्तर के लोगों के लिए सबसे सुरक्षित जगहों में से एक है और पहाड़ी पहचान हमें यहां आकर्षित करती है. जबकि देश के बाकी हिस्सों में हमें जातीय भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है.” देब्बर्मा ने देहरादून में तीन साल बिताए हैं, लेकिन 26 दिसंबर को जो हुआ, उसने उन्हें बहुत हैरान और चिंतित कर दिया.

एंजल चकमा को 9 दिसंबर को छह लोगों ने हमला किया जब उन्होंने ‘चाइनीज’, ‘चिंकी’, और ‘मोमो’ कहने पर विरोध जताया, एंजल के भाई माइकल ने पुलिस को बताया. 17 दिन बाद एंजल ने अस्पताल में दम तोड़ दिया. उनकी मौत ने विरोध, डर और चिंता को जन्म दिया.

उत्तराखंड केवल आध्यात्मिक केंद्रों या पर्यटन के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी शिक्षा संस्थाओं के लिए भी जाना जाता है, जो देशभर से हज़ारों छात्रों को आकर्षित करती हैं—खासकर पूर्वोत्तर से.

रिस्टम देब्बर्मा डॉल्फिन इंस्टिट्यूट में बीएससी (एग्रीकल्चर) कर रहे हैं. उन्होंने दिप्रिंट से बात करते हुए बताया कि शहर में उन्हें भी कभी-कभी भेदभाव का सामना करना पड़ा. देब्बर्मा ने कहा, “चिंकी, चाइनीज़ ये आम शब्द हैं जो हमें सुनने को मिलते हैं. हम भी भारतीय हैं, बाहरवाले नहीं.”

पिछले दो दशकों में, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून एजुकेशन का हब बन गया है, जिसमें मेडिकल, इंजीनियरिंग और सोशल साइंसेज जैसे कई क्षेत्रों में डिग्री देने वाले संस्थान तेजी से बढ़े हैं.

देहरादून चैप्टर के पूर्वोत्तर छात्र संघ के अध्यक्ष ऋषिकेश बरुआह ने कहा, “चकमा की घटना एक जागरूकता संदेश है और अधिकारियों को कड़े कदम उठाने चाहिए. वर्षों से पूर्वोत्तर के छात्र देहरादून आते हैं, क्योंकि उन्हें यहां सुरक्षित महसूस होता है, लेकिन अब डर ने हमें घेर लिया है.”

राज्य के बाहर के छात्रों को आकर्षित करने के लिए, ये संस्थान सक्रिय आउटरीच प्रोग्राम चलाते हैं, अन्य राज्यों में विज्ञापन देते हैं और यहां तक कि काउंसलर भी रखते हैं.

लेकिन चकमा पर हुए घातक जातीय हमले के बाद, पूर्वोत्तर के छात्रों ने कहा कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता है और वे जातीय भेदभाव से निपटने के लिए सख्त कानून चाहते हैं.

देहरादून के डॉल्फिन इंस्टिट्यूट का कैंपस, जहां सैकड़ों पूर्वोत्तर के छात्र पढ़ते हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
देहरादून के डॉल्फिन इंस्टिट्यूट का कैंपस, जहां सैकड़ों पूर्वोत्तर के छात्र पढ़ते हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

देहरादून कैसे बना एजुकेशन हब

बरुआह ने बताया कि देहरादून में 200 से ज्यादा शैक्षणिक संस्थान हैं, जिनमें निजी और सरकारी दोनों शामिल हैं. इस वजह से यह इलाका एक बड़ा एजुकेशन हब बन गया है. फिलहाल देहरादून में पूर्वोत्तर (नॉर्थईस्ट) से आए 2,000 से ज्यादा छात्र पढ़ाई कर रहे हैं.

यहां के प्रमुख संस्थानों में दून यूनिवर्सिटी, ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी, डीबीएस ग्लोबल यूनिवर्सिटी, जिज्ञासा यूनिवर्सिटी और डॉल्फिन इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नेचुरल साइंसेज शामिल हैं. देहरादून का सुहावना मौसम, प्राकृतिक सुंदरता और हिमालय के पास होना इसे शैक्षणिक संस्थानों के लिए आकर्षक जगह बनाता है.

आज़ादी से पहले, ब्रिटिश शासन के दौरान 1935 में द दून स्कूल की स्थापना की गई थी. यहीं से देहरादून के एजुकेशन हब के रूप में विकसित होने की शुरुआत हुई. आज़ादी के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा, लेकिन असली रफ्तार तब मिली जब साल 2000 में उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अलग राज्य बनाया गया.

साल 2002 में यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज (यूपीईएस) और 2004 में दून यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई.

डॉल्फिन इंस्टीट्यूट की फैकल्टी सदस्य मालती साहनी ने बताया कि पिछले दो दशकों में लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए उत्तराखंड की राजधानी देहरादून आते हैं.

उन्होंने कहा, “देहरादून को एजुकेशन हब बनने में करीब 20 साल लगे हैं. यह इलाका शांत है और यहां का मौसम छात्रों के लिए अनुकूल है.”

देहरादून में BFIT का कैंपस | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
देहरादून में BFIT का कैंपस | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

साहनी ने बताया कि उनके संस्थान में सैकड़ों छात्र पूर्वोत्तर से हैं और अब तक नस्लीय भेदभाव की कोई घटना सामने नहीं आई है.

उन्होंने कहा, “एंजल चकमा की घटना दुखद है, लेकिन यह एक अलग-थलग मामला है. हम इसे किसी पैटर्न का हिस्सा नहीं मानते.”

दिप्रिंट ने डॉल्फिन इंस्टीट्यूट के कई छात्रों से बात की. छात्रों ने बताया कि उन्हें कैंपस में किसी तरह का भेदभाव नहीं झेलना पड़ता, लेकिन शहर के बारे में वे ऐसा नहीं कह सकते.

अरुणाचल प्रदेश के 22-वर्षीय छात्र बोमके कार्चो ने कहा, “देहरादून चुनने की एक बड़ी वजह यहां की पहाड़ी पहचान है क्योंकि हम भी पहाड़ी इलाकों से हैं और हमारा रूप-रंग भी उत्तराखंड के लोगों से मिलता-जुलता है.”

कार्चो ने बताया कि उन्हें देहरादून के शैक्षणिक संस्थानों के बारे में सीनियर्स और रिश्तेदारों से जानकारी मिली. उन्होंने कहा, “कॉलेजों के काउंसलर भी हमसे संपर्क करते हैं.”

साहनी ने आगे बताया कि देहरादून का हर संस्थान काउंसलर नियुक्त करता है और उन्हें पूर्वोत्तर राज्यों में भेजता है, क्योंकि वहां शिक्षा के संसाधन सीमित हैं.

उन्होंने कहा, “हम रेडियो के जरिए विज्ञापन देते हैं और वहां पोस्टर भी लगाते हैं.” साहनी के अनुसार, कुछ छात्र दूसरी राज्यों में भी पढ़ाई के लिए जाते हैं क्योंकि उत्तराखंड में सीटें सीमित हैं.

उन्होंने कहा, “एग्रीकल्चर और फॉरेस्ट से जुड़े कोर्स वहां के छात्रों की पसंद होते हैं. पहाड़ी राज्य होने के नाते हम ये कोर्स उपलब्ध कराते हैं.”

पश्चिम बंगाल के 23-वर्षीय छात्र उदय महतो ने कहा कि क्षेत्र के आधार पर भेदभाव बिल्कुल गलत है.

उन्होंने कहा, “हम सब भारतीय हैं. पूर्वोत्तर के लोग बहुत अच्छे और शांत स्वभाव के होते हैं. मेरे वहां के कई दोस्त हैं और हमने कभी इन बातों पर झगड़ा नहीं किया.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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