Sunday, 3 July, 2022
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जानिये बिहार के फार्मा उद्योगपति व करोड़पति ‘किंग’ को, जिन्होंने आजतक कभी राज्य सभा चुनाव नहीं हारा

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78 वर्षीय ‘किंग’ महेंद्र की कुल संपत्ति 4000 करोड़ रुपये आंकी गयी है और वे 1985 से लगातार राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। उनका पैसा राजनैतिक दलों को उनकी ओर खींचता है, उनकी राजनैतिक समझ नहीं

नई दिल्ली: बिहार में जन्मे अरबपति (उनकी कुल अनुमानित संपत्ति 4,078 करोड़ रुपये है)एवं फार्मा क्षेत्र के बिजनस टायकून, 78 वर्षीय डॉ. महेंद्र प्रसाद को इस बार के राज्य सभा चुनावों में कोई खास विरोध नहीं झेलना पड़ा।

1980 में संसद में एक लोक सभा सदस्य के रूप में कदम रखने के बाद वे कभी इस सदन से बाहर नहीं गए हैं। पिछले तीन दशकों के दौरान उन्होंने बड़ी ही सफाई से बिहार के लगातार बदलते राजनैतिक परिदृश्य के साथ मेल बिठाकर वे राज्यसभा में अपना स्थान सुनिश्चित करते आ रहे हैं – शुरुआत कांग्रेस से हुई , फिर जनता दल और उसके बाद राष्ट्रीय जनता दल। अंततः वे पिछलीे तीन बार से जनता दल (यूनाइटेड) के राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में चुने जा रहे हैं।

बिहार में खाली पड़ी 6 सीटों पर सभी उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए लेकिन प्रसाद कभी इसे लेकर चिंतित नहीं थे जोकि अब राज्यसभा में अपनी सातवीं पारी की शुरुआत करने जा रहे हैं।

2012 में चुने जाने के बाद उन्होंने कहा था, “अगर राज्य सभा में एक ही सीट खाली होती, तो भी मैं ही चुना जाता।

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बिहार के राजनीतिज्ञों की मानें तो उनके इस आत्मविश्वास का कारण उनकी अथाह संपत्ति है जो उन्हें पार्टियों के लिए मूल्यवान बनाती है। एक जद(यू) नेता जो इस बार राज्यसभा जाने की आस लगाए बैठे थे, कहते हैं, “उनकी नीतीशजी से सीधी बातचीत चलती है और यह तो सब जानते ही हैं कि वे अरबपति हैं। अब इससे ज़्यादा क्या कहूँ?”

एक राजद नेता ने कहा, “उनका तरीका साधारण है। वे कभी पार्टी में किसी पद के लालच में नहीं पड़े हैं, वे हमेशा पृष्ठभूमि में रहकर अपने रसूख का फायदा उठाते हैं।”

वह नेता आगे जोड़ते हैं, “दलों को आर्थिक मदद के लिए उनकी ज़रूरत पड़ती है। उनका कोई दुश्मन नहीं है और प्रसाद कभी किसी को निराश नहीं करते।

कहानी ‘किंग’ की

प्रसाद का जन्म 1940 में बिहार के जहानाबाद ज़िले के गोविंदपुर गांव के एक साधारण भूमिहार परिवार में हुआ था। छोटी उम्र में ही व्यवसायी बनने का सपना लेकर वह मुम्बई चले गए। उनके शुरुआती दिनों के बारे में ज़्यादा नहीं पता पर अन्ततः वह बिहार के ही एक अन्य भूमिहार फार्मा टायकून सम्प्रदा सिंह के साथ काम करने लगे।

1971 में 31 साल की उम्र में प्रसाद ने अपनी स्वयं की फैक्ट्री, एरिस्टो फार्मास्युटिकल्स की नींव रखी। उनके गांव ले लोग बताते हैं कि उसके बाद से उनकी संपत्ति लगातार बढ़ी है।

राजनीति में छलांग

1980 में प्रसाद ने जहानाबाद से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता। उस समय यह ज़िला सवर्णों एवं नक्सलियों के बीच चल रहे एक ख़ूनी खेल का केंद्र बना हुआ था।

हालांकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के आम चुनावों में उनको अपनी सीट से हाथ धोना पड़ा।

1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें पहली बार राज्यसभा के लिए नामित किया। प्रसाद को कांग्रेसी नेता माखनलाल फोतेदार के करीबी होने का भी फायदा मिला क्योंकि फोतेदार स्वयं राजीव और इंदिरा के करीबी थे ।

सितंबर 1985 में जब पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था तब कांग्रेस ने उन्हें अमृतसर की लोकसभा सीट के लिए एक आब्जर्वर की हैसियत से भेजा। बाटला में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक सभा में जाने के क्रम में उनकी कार में धमाका हुआ जिससे उनकी जान जाते-जाते बची।

1986 में वे फिर से राज्यसभा के लिए चुन लिए गए।

पहली हलचल

80 के दशक के आखिरी और 90 के दशक के शुरुआती सालों में बिहार में आतंक और मार-काट की स्थिति थी। रोज़ाना अखबारों में सवर्ण भूमिहार ज़मींदारों एवं नक्सलवादियों के बीच की झड़पों की खबरें आती थी। सवर्णों की इस फौज को रणवीर सेना का नाम दिया गया था जिसपर दलितों की निर्मम हत्याएं करने का आरोप था। उस वक़्त जहानाबाद में रणवीर सेना भी अपने चरम पर थी।

उसी दौरान लालू यादव का उदय पिछड़ों के रहनुमा के रूप में हो रहा था। लालू जनता दल के सदस्य थे और कांग्रेस की आर का सिलसिला लगातार जारी था।

भूमिहार लालू को घोर अपमान की दृष्टि से देखते थे लेकिन यह खाई भी प्रसाद को रोकने में विफल रही और वे जनता दल के सदस्य बन गए। 1993 में उनका निर्वाचन राज्य सभा में जनता दल के प्रवतिनिधि के रूप में हुआ।

1997 में जब लालू ने पार्टी से अलग जाकर राजद की स्थापना की तब प्रसाद भी उनके साथ रहे। 2000 में उन्होंने राजद एमपी के रूप में राज्य सभा की सदस्यता ग्रहण की।

जद(यू) अध्याय की शुरुआत

1999 में जनता दल भंग कर दी गयी। 2003 आते आते इस पार्टी से अलग हुआ एक गुट जार्ज फर्नांडिस की अगुआइ वाले समता दल से मिल गया। इसके अलावा लोकशक्ति पार्टी भी आ मिली और इस तरह निर्माण हुआ जनता दल(यूनाइटेड) का।

2005 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने बिहार चुनावों में मुख्यंत्री पद के लिए नीतीश कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित किया।

नीतीश के उदय ने जेडी (यू) के भीतर एक दरार पैदा की। जब फर्नांडीस ने चुनाव के लिए नीतीश के साथ धन साझा करने से इंकार कर दिया, तो नेताओं ने नीतीश को सुझाव दिया कि वह “किंग महेंद्र” से संपर्क करें। नेता के रूप में अपनी पहचान साबित करने के लिए उत्सुक नीतीश ने प्रसाद से बात करने के लिए अपने करीबी सहयोगी राजीव रंजन सिंह उर्फ ​​ललन सिंह को कहा। लालन सिंह भी भूमिहार और महेंद्र प्रसाद के अच्छे मित्र थे। मात्र कुछ ही बैठकों के बाद प्रसाद दल बदलने के लिए तैयार हो गए।

2005 में, नीतीश मुख्यमंत्री चुने गए थे। अगले वर्ष, प्रसाद ने जेडी (यू) टिकट पर राज्य सभा में प्रवेश किया।

पिछले कुछ वर्षों में नीतीश और प्रसाद ने करीबी बंधन बना लिया है। कहा जाता है कि प्रसाद मुख्य मंत्री, ललन सिंह और पूर्व विधायक अभिराम शर्मा के अलावा जेडी (यू) में किसी से बात नहीं करते। अभिराम उनके करीबी के रूप में जाने जाते हैं।

एक शीर्ष जेडी (यू) नेता ने कहा, “किंग महेंद्र तक पहुंचने के लिए केवल एक रास्ता है,” आप अभिराम शर्मा को डायल करते हैं और वह आपका संदेश आगे भेजेंगे।”

अपने संबंधों के बारे में बात करते हुए अभिराम शर्मा कहते हैं कि वे कभी प्रसाद को फोन नहीं करते , “जब उनका मन होता है वो मुझसे संपर्क करते हैं और तभी में अपनी राय देता हूँ।”

एक किसान का बेटा ‘किंग’ बन जाता है

उन्हें राजनीतिक हलकों में ‘किंग महेंद्र’ के रूप में जाना जाता है, लेकिन यह सम्मान उन्हें राजनीति की वजह से प्राप्त नहीं हुआ है। यह उपाधि स्थानीय लोगों ने उन्हें इसलिए दी क्योंकि उन्होंने कई भूमिहार युवाओ को अपनी कंपनी में काम दिया है।

असल में, नौकरी उम्मीदवार अब भी उनके जहानाबाद स्थित घर के बाहर कतार में लगे रहते है और वह उन्हें हतोत्साहित नहीं करते । उनके लिए काम कर रहे हज़ारों कर्मचारियों में बिहारियों की संख्या सबसे ज़्यादा है।

स्थानीय लोगों की मांग पर, उन्होंने गरीब और वंचित लोगों के बीच उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ओकारी, जहानाबाद में एक कॉलेज शुरू किया। इससे उन लड़कियों को भी मदद मिली जिन्हें उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं मिलती।

उनके परोपकारी कार्यों ने उन्हें भुमिहारों के बीच एक कल्ट के रूप में स्थापित कर दिया और जल्दी ही एक साधारण किसान का बेटा ‘किंग’बन गया।

आज, प्रसाद कई फार्मा कंपनियों का संचालन करते हैं। उनकी मुख्य फर्म, अरिस्टो फार्मास्युटिकल्स का कारपोरेट मुख्यालय मुम्बई में है। इसके अलावा वियतनाम, श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश में शाखाओं तो हैं ही, यूरेशिया और अफ्रीका के अन्य देशों में भी कंपनी के दफ्तर हैं। उनकी अन्य कंपनियों में माप्रा लेबोरेटरीज और इंडेमी हेल्थ स्पेशलिटीज शामिल हैं और दोनों के मुख्यालय मुंबई में हैं। इसके अलावा हैदराबाद से दमन और सिक्किम तक भारत भर में उनकी कई फैक्ट्रियां चल रही हैं। वह मुंबई, दिल्ली, भारत और विदेश के बीच अपना समय बराबर बांटते हैं।

घुमक्कड़ राजा

हालांकि ऐसा नहीं है कि प्रसाद केवल काम में लगे रहते हैं । वे एक उत्सुक पर्यटक हैं और राज्य सभा की वेबसाइट पर लगी उनकी प्रोफ़ाइल के अनुसार उन्होंने सोमालिया के अलावा हर देश की यात्रा की है। यहाँ एक दिलचस्प कहानी है। 2013 में जब वह इस पूर्वी अफ्रीकी राष्ट्र की ओर प्रस्थान करनेवाले थे तब नीतीश के फ़ोन कॉल की वजह से वे रुक गए थे। टिकट और पासपोर्ट हाथ में लिए प्रसाद हवाई अड्डे से नीतीश के कहने पर ही वापस लौटे थे।

अप्रैल 2002 और अप्रैल 2003 के बीच प्रसाद ने 84 देशों की यात्रा की जिसका औसत प्रति महीना सात देश आता है। नीतीश भी अपने करीबियों से बातचीत के दौरान प्रसाद की यात्राओं का ज़िक्र कर चुके हैं।

वह एक उत्सुक पाठक और एक डाइविंग उत्साही भी हैं। अगस्त 2002 में उन्हें एक यात्री पनडुब्बी कंपनी अटलांटिस सबमरीन द्वारा सम्मानित किया गया था जब उन्हीने वेस्टइंडीज के कैरेबियन सागर में 173 फ़ीट का गोता लगाया था।

इसके बावजूद, उनके करीबी लोग कहते हैं कि वह एक साधारण आदमी हैं जो घर का बना खाना पसंद करते हैं। वह केवल खादी पहनते हैं जो गुजरात स्थित एक कारखाने से उनके लिए विशेष तौर पर मंगाई जाती है । परिवार के सदस्यों के साथ भी वह केवल “आवश्यकता होने पर” ही बातचीत करते हैं । उनके परिवार के एक करीबी मित्र ने कहा, “मैं उनके लिए किसी अन्य व्यक्ति की तरह हूं और वह मेरे लिए एक अजनबी ही हैं।”

संसद में सर्वश्रेष्ठ नहीं

हालांकि प्रसाद के पास वर्षों का अनुभव है फिर भी उन्हें आदर्श जनप्रतिनिधि नहीं कहा जायेगा। राज्यसभा वेबसाइट के अनुसार वर्ष 2000 से अबतक उन्होंने केवल 6 प्रश्न पूछे हैं। इनमें से  2003 के पूर्व और बाद में केवल एक।

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की वेबसाइट के अनुसार, जून 2009 से 21 मार्च 2018 तक उनकी औसत उपस्थिति 82 प्रतिशत थी, लेकिन उन्होंने कभी बहस में भाग नहीं लिया या बिल पेश नहीं किया।

प्रसाद की राजनीतिक दीर्घायु को समझाते हुए, एक जेडी (यू) नेता ने कहा, “उनके पास कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है और वे भली भांति जानते हैं कि व्यापार और राजनीति के बीच की दूरी को कैसे बनाए रखा जाए।” यही वजह है कि उन्होंने राजनैतिक शक्ति परिवर्तनों के बावजूद अपने सर से ताज हटने नहीं दिया।

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