Thursday, 30 June, 2022
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‘स्वतः सिद्ध है’, वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद एक मंदिर है- हिंदू दक्षिणपंथी प्रेस में इस हफ्ते क्या छपा

हिंदुत्व-समर्थक मीडिया ने पिछले कुछ दिनों की खबरों और सामयिक मुद्दों को कैसे कवर किया और उन पर क्या टिप्पणियां कीं, दिप्रिंट ने इस पर नज़र डाली.

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नई दिल्ली: इस सप्ताह हिंदू दक्षिणपंथी प्रकाशनों के पन्नों पर दो कानूनी मुद्दे हावी रहे – पहला था, ज्ञानवापी मस्जिद का मामला, जहां माना जाता है कि एक सर्वेक्षण के दौरान एक शिवलिंग (हिंदू भगवान शिव का प्रतीक) पाया गया था और दूसरा था सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजद्रोह कानून के आरोपों के संबंध में तब तक के लिए सभी लंबित जांचों, अपीलों और कार्यवाहियों पर रोक लगाना जब तक की केंद्र इसके प्रावधानों की फिर से जांच नहीं कर लेता.

वाराणसी ज्ञानवापी मस्जिद वाले मुद्दे पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध ‘पांचजन्य’ पत्रिका ने आरोप लगाया कि ‘मुस्लिम पक्ष और सच्चाई को दबाने के लिए अदालत एवं अनुसंधान का विरोध कर रहा है.

इसने लिखा, ‘ज्ञानवापी इंतेज़ामिया कमेटी’ के सचिव द्वारा मस्जिद के अंदर ‘कोर्ट कमिश्नर’ को जाने की अनुमति नहीं देने के पक्ष में दी गई चार दलीलें बहुत गंभीर हैं.’

इसने लिखा, ‘पहला तर्क यह था कि हम किसी गैर-मुसलमान को मस्जिद में प्रवेश नहीं करने देंगे. दूसरी दलील यह थी कि चूंकि कोर्ट ने हमारी बात नहीं सुनी, इसलिए हम इसकी बात भी नहीं सुनेंगे. तीसरा तर्क यह था कि मस्जिद के अंदर वीडियोग्राफी या फोटो खिंचवाने से हमारी सुरक्षा को खतरा है. चौथा तर्क यह था कि अगर कोर्ट कहता है कि अपनी गर्दन काट दो, तो क्या मैं अपनी गर्दन काट कर कोर्ट द्वारा नियुक्त अधिकारी को सौंप दूंगा!’

इस बीच, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कहा कि ज्ञानवापी मस्जिद में कथित रूप से एक शिवलिंग के पाए जाने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह एक मंदिर है.

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अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित एक नोट (टिप्पणी) में इस हिंदुत्व संगठन ने कहा कि इस मूल संरचना का वास्तविक धार्मिक चरित्र और स्वयं यह स्थान 1947 में भी एक मंदिर के समान ही था, जिससे इसे उपासना स्थल अधिनियम के तहत सुरक्षा मिलती है.

विहिप ने कहा, ‘हमने कहा था कि हम श्री राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण तक अदालत के फैसले का इंतजार करेंगे. अब बदली हुई परिस्थितियों में हम जून में हरिद्वार में होने वाली अपने केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल (विहिप के वरिष्ठ नेताओं का पैनल) की बैठक में इस मामले को माननीय संत बिरादरी (हिंदू संतों) के समक्ष रखेंगे.‘

152 साल पुराने देशद्रोह कानून के तहत किसी भी प्रकार की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक पर ‘पांचजन्य’ ने लिखा कि इस कानून में कुछ भी अनोखा नहीं है. इसने कहा कि इसी तरह के कानून अमेरिका, ईरान, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, मलेशिया और अन्य देशों में भी लागू हैं. इस प्रकाशन के संपादक हितेश शंकर ने लिखा, ‘इसलिए, यह कहना कि भारत में कुछ अजीब या अनोखी सी स्थिति है और (हमारा) लोकतंत्र सांस नहीं ले पा रहा है, एक ढकोसला ही है.’

उन्होंने उन दावों का भी खंडन किया जिनमें कहा गया है कि 2014 में केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से देशद्रोह कानून के तहत मामले दर्ज होने में बढ़ोत्तरी हुई है. उन्होंने लिखा है, ‘अगर हम दर्ज किए गए मामलों की सीमा को देखें, तो बिहार में 2010 के बाद से 171 मामले दर्ज किए गए हैं, इसके बाद तमिलनाडु का नंबर है में 143 मामले दर्ज किए गए हैं. 127 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे और 64 मामलों के साथ झारखंड चौथे स्थान पर है. झारखंड में सबसे ज्यादा 4,641 लोग आरोपी बनाए गए थे. वहीं, तमिलनाडु में 3,601, बिहार में 1,608, और उत्तर प्रदेश में 1,383 लोग आरोपी बनाए गए. यानी कि झारखंड और तमिलनाडु जैसे गैर-भाजपा शासित राज्य, जो आकार और जनसंख्या के मामले में उत्तर प्रदेश से काफी छोटे हैं, इस कानून को अमल में लाने के मामले में भाजपा शासित राज्यों से काफी आगे हैं.‘

इस बीच, आरएसएस से ही संबद्ध एक अन्य पत्रिका, ‘ऑर्गनाइज़र’ ने लिखा है कि ‘उपनिवेशवादियों द्वारा हमारे स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ बनाया गया और हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा खारिज किए गए कानून को ख़त्म ही हो जाना चाहिए.’

ऑर्गनाइज़र के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने लिखा, ‘साथ ही, हमें मौजूदा कानूनों में उचित प्रावधानों या संशोधनों के साथ इसका प्रतिस्थापन (इसकी जगह पर नया कानून लाना) सुनिश्चित करने की आवश्यकता है ताकि भारत विरोधी ताकतें हमारे लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए लोकतांत्रिक स्थान का दुरुपयोग न करें.’

पांचजन्य में छपे के एक अन्य लेख में इस महीने की शुरुआत में पंजाब पुलिस द्वारा भाजपा नेता तजिंदर बग्गा की गिरफ्तारी की निंदा की गई है. बग्गा को तब गिरफ्तार कर लिया गया था जब आप नेता सनी अहलूवालिया ने कथित तौर पर सोशल मीडिया पर उनके द्वारा कुछ भड़काऊ पोस्ट – जिनमें आप के पार्टी प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ दी गई ‘धमकी’ भी शामिल है – करने के मामले में शिकायत दर्ज कराई थी.

लेखक आशीष कुमार ने लिखा, ‘केजरीवाल विपक्ष के सर्वस्वीकार्य नेता बनना चाहते हैं … तजिंदर को गिरफ्तार करके, उन्होंने ममता बनर्जी से भी बड़ा नेता बनने की कोशिश की है. दिल्ली, जहां की पुलिस गृहमंत्री अमित शाह के नियंत्रण में है, से एक बीजेपी नेता को गिरफ्तार कर के उन्होंने यह संदेश भी दिया है कि वोट बैंक की राजनीति के लिए वह किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं. ‘उन्होंने दो सिखों (पंजाब के सीएम और आप नेता भगवंत मान और तजिंदर बग्गा के लिए किया गया एक संदर्भ) को एक-दूसरे के आमने- सामने करने की कोशिश की है.’


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प्रेस की आजादी और भारत पर

ऑर्गनाइजर ने सोमवार को अपनी कवर स्टोरी (आवरण कथा) में इस महीने की शुरुआत में जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स पर चर्चा की’, जिसमें भारत को 180 देशों की सूची में 150वें स्थान पर रखा गया है. इसे ‘ग्लोबल लेफ्ट कबाल’ (वैश्विक वामपंथी गिरोह) द्वारा तैयार की की गई रैंकिंग कहते हुए, ऑर्गनाइज़र के लेख ने दावा किया कि इसे ‘उसी विषय वास्तु के साथ फेंक दिया किया जाना चाहिए जिसके वह योग्य है.’

इस आलेख में कहा गया है, ‘एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति के रूप में, एक आत्मविश्वास से भरे राष्ट्र के रूप में, भारत को पश्चिम द्वारा किसी तरह की मान्यता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है और उसे अपना खुद का रास्ता तय करना चाहिए. विशाल प्रतिभा पूल, बाजार की क्षमता, डिजिटल रूप से मिली बढ़त और तकनीकी क्षमताओं को देखते हुए, भारत एक वैश्विक मीडिया और मनोरंजन केंद्र के रूप में उभरने की ओर अग्रसर है.’

इसने नेहरूवादी युग के दौरान अपने स्वयं के द्वारा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पैरोकारी’ की तरफ भी मुड़ कर देखा.
इसने लिखा है, ‘साल 1949 में जब भारत सरकार ने आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाया तो ऑर्गनाइज़र ने अपने प्रिय मुद्दों के लिए अपना संघर्ष जारी रखने के लिए अपनी यात्रा शुरू की. 26 जनवरी, 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के तुरंत बाद ही साल 1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने संविधान में पहला संशोधन करते हुए अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता पर भारी अंकुश लगा दिया और सरकार की आलोचना करने वाली आवाजों पर शिकंजा कसा गया. लेख में दावा किया गया है, ’नेहरू आयोजक से काफी खफा थे क्योंकि यह प्रकाशन 1947 में भारत के विभाजन के मद्देनजर नेहरू सरकार के प्रति काफी आलोचनात्मक था.’

आरएसएस का शताब्दी समारोह

‘संडे गार्डियन’ में लिखे गए एक लेख में, आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने साल 2025 में इस संगठन के 100 साल पूरे करने के बारे में लिखा. ‘आरएसएस, नियरली हंड्रेड’ शीर्षक वाले इस लेख में वैद्य ने ‘युवा स्वयंसेवकों’ से संगठन और उसकी विचारधारा के बारे में अधिक से अधिक लोगों को जागरूक करने का आग्रह किया.
वैद्य ने लिखा, ‘स्वयंसेवकों को समाज में अधिक सक्रिय होना चाहिए, उन्हें नए लोगों से मिलना चाहिए ताकि समाज के नए-नए वर्ग संघ के संपर्क में आ सकें, संघ को समझ सकें और आरएसएस के राष्ट्रीय आदर्शों को जान सकें. समाज का एक अभिन्न अंग होने के नाते, वे हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज की रक्षा के लिए साथ जुड़ सकते हैं और अपना योगदान दे सकते हैं तथा राष्ट्र की सर्वांगीण प्रगति के लिए भी समर्पित रह सकते हैं.‘


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कैसे वंशवाद की राजनीति को ‘खत्म’ किया मोदी-भाजपा की जोड़ी ने?

‘बीजेपी की गौरवगाथा’ के लेखक शांतनु गुप्ता ने इस सप्ताह दैनिक जागरण में प्रकाशित एक लेख में भाजपा और पीएम मोदी को देश में वंशवाद की राजनीति का खातमा करने के लिए श्रेय दिया. उनका यह दावा कांग्रेस द्वारा इस महीने उदयपुर में आयोजित अपने ‘चिंतन शिविर’ में की गई एक घोषणा के संदर्भ में आया है, जिसमें कहा गया है कि किसी परिवार भी का कोई भी दूसरा सदस्य तब तक पार्टी का टिकट पाने का पात्र नहीं होगा, जब तक कि उसने पार्टी के लिए काम करते हुए पांच साल न बिता लिए हों.

दैनिक जागरण के इस लेख में, गुप्ता ने तर्क दिया कि सभी दल उसी बड़ी पार्टी के नक्शेकदम पर चलते हैं, जो लंबे समय से सत्ता में है.

उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने वंशवादी राजनीति को बढ़ावा दिया था, जिसे मुफ्ती (कश्मीर में), पवार (महाराष्ट्र), करुणानिधि परिवार (तमिलनाडु) और केसीआर (तेलंगाना) सहित अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी अपना लिया था.

उन्होंने कहा, ‘मगर, भाजपा में नेता दूसरों को उनकी प्रतिभा और क्षमता के आधार पर बढ़ावा देते हैं. जेपी नड्डा (भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष) के अमित शाह (केंद्रीय गृह मंत्री) के साथ कोई पारिवारिक संबंध नहीं हैं, शाह किसी भी तरह से राजनाथ सिंह (रक्षा मंत्री) से संबंधित नहीं थे और न ही सिंह का वाजपेयी-आडवाणी (पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी) के साथ कोई खून का रिश्ता था. इन तीनों नेताओं में बस एक ही चीज सामान्य है प्रतिभा और कड़ी मेहनत.’ लेखक ने टिप्पणी की, ‘मोदी युग में, वंशवाद की राजनीति के ‘अच्छे दिन’ समाप्त हो रहे हैं.’

बेरोजगारी पर सीएमआईई का आंकड़ा है ‘संदिग्ध’

आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने मंगलवार को सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की उस नवीनतम रिपोर्ट पर टिप्पणी की जिसमें कहा गया था कि हालांकि अप्रैल में कई लाखों नौकरियां पैदा हुईं हैं, जो कोविड के झटके के बाद से श्रम बाजार में अब तक के ‘सबसे बड़े विस्तार में से एक’ है, फिर भी यह मांग की तुलना में पर्याप्त नहीं हैं.

महाजन ने ‘दैनिक जागरण’ में छपे एक लेख में लिखा, ‘दुर्भाग्य से, सीएमआईई के आंकड़ों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं. 25 अप्रैल 2022 को जारी इस ताजा रिपोर्ट पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं.’

महाजन ने दावा किया कि, ‘विश्लेषकों का मानना ​​है कि बेरोजगारी और श्रम शक्ति के आकार पर सीएमआईई के आंकड़े अन्य संकेतकों से मेल नहीं खाते. इसलिए, उनके आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता.’ उन्होंने यह भी कहा कि मनरेगा – सरकार की रोजगार गारंटी योजना – की संख्या को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि सीएमआईई के नंबरों में कुछ गड़बड़ है.

वे लिखते हैं, ‘अगर बेरोजगारी बढ़ती है तो मनरेगा के लिए मांग भी बढ़ेगी. उदाहरण के तौर 2020-21 में शहरों में लगे लॉकडाउन और आर्थिक गतिविधियों में आई गिरावट की वजह से रोजगार में कमी आई थी और लोग गांवों की ओर पलायन कर गए थे इस कारण से उन दिनों मनरेगा लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 7 करोड़ हो गई, जो लॉकडाउन से पहले केवल 5 करोड़ थी.’

अप्रैल महीने के प्रोविजनल डाटा (अनंतिम आंकड़े) ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति में बदलाव का संकेत देते हैं और इस महीने मनरेगा के तहत काम मांगने वाले परिवारों की संख्या पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 11.15% कम थी.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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