नई दिल्ली: 11वीं सदी के हिंदू दार्शनिक-संत रामानुजाचार्य की शिक्षाओं का पालन करने वाले थेंगलै और वडगलै संप्रदायों के बीच तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित श्री देवेराज मंदिर में पूजा करने के अधिकार को लेकर पिछले 200 साल से विवाद चल रहा है. इस संप्रदायिक विवाद का ताजा दौर अब सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.
बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस विवाद को सुलझाने के लिए एक अलग तरीका अपनाया. कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल को मध्यस्थ नियुक्त किया.
“अगर आप इन देवता की एक बार नहीं, दो बार पूजा करेंगे, तो देवता खुश होंगे या नाराज होंगे.” यह टिप्पणी जस्टिस कांत ने उस समय की, जब उन्होंने दोनों पक्षों से मंदिर में पूजा और देवता की अंदर और बाहर होने वाली धार्मिक शोभायात्रा के दौरान किस संप्रदाय को सेवा करने की अनुमति मिले, इस पर आपसी सहमति से समाधान निकालने को कहा.
दिप्रिंट इस विवाद और दोनों संप्रदायों के बीच चली आ रही कानूनी लड़ाई का इतिहास बता रहा है.
विवाद
यह मामला कांचीपुरम के श्री देवेराज स्वामी मंदिर में पूजा को लेकर दो धार्मिक समूहों, थेंगलै, जिसे दक्षिणी संप्रदाय कहा जाता है, और वडगलै, जिसे उत्तरी संप्रदाय कहा जाता है, के बीच विवाद से जुड़ा है. इस मंदिर के देवता भगवान विष्णु हैं.
हालांकि दोनों ही रामानुजाचार्य के अनुयायी हैं, लेकिन पूजा के समय वे अपने-अपने आध्यात्मिक गुरुओं का नाम लेना चाहते हैं.
दक्षिणी संप्रदाय के लोगों का दावा है कि मंदिर में आदिापक मिरासी पद पर उनका अधिकार है. इसलिए पूजा से पहले और पूजा के बाद केवल उनके गुरु श्री मणवाला मामुनिगल की प्रशंसा में उनका ही ‘मंत्र’ पढ़ा जाना चाहिए.
वहीं उत्तरी संप्रदाय का कहना है कि उसके सदस्यों को अपने गुरु वेदांत देशिकन की प्रशंसा में ‘मंत्र’ पढ़ने का अधिकार है.
दोनों संप्रदायों के अपने-अपने चिन्ह भी हैं. दक्षिणी संप्रदाय ‘Y’ आकार का चिन्ह इस्तेमाल करता है, जबकि उत्तरी संप्रदाय ‘U’ आकार का चिन्ह उपयोग करता है.
अलग-अलग न्यायिक मंचों के पुराने फैसलों में बार-बार पूजा पर केवल दक्षिणी संप्रदाय के अधिकार को मान्यता दी गई है.
कानूनी लड़ाई का इतिहास
दोनों समूहों के बीच कानूनी विवाद 18वीं सदी में शुरू हुआ. न्यायिक दस्तावेजों के अनुसार, इस लंबे विवाद में पहला अहम फैसला 1882 में मद्रास हाई कोर्ट ने दिया था.
यह फैसला दक्षिणी संप्रदाय द्वारा दायर उस मुकदमे से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने आदिापक मिरासी पद पर अपने अधिकार की घोषणा की मांग की थी. हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि सभी मौकों पर दक्षिणी संप्रदाय के सदस्य ही यह जिम्मेदारी निभाने के हकदार हैं. उत्तरी संप्रदाय के सदस्यों को खास तौर पर अपने ‘मंत्र’ या ‘प्रबंधम’ पढ़ने से रोक दिया गया था.
1915 में यह विवाद फिर हाई कोर्ट पहुंचा, जहां 1882 के फैसले को दोहराया गया. कोर्ट ने कहा कि पूजा की शुरुआत से लेकर प्रसाद वितरण तक, उत्तरी संप्रदाय के सदस्य अपना कोई भी मंत्र नहीं पढ़ सकते.
हालांकि, उन्हें दक्षिणी संप्रदाय के साथ भक्त के रूप में शामिल होने और उसी के ‘प्रबंधम’ पढ़ने की अनुमति दी गई.
इसके अलावा, इस फैसले में उत्तरी संप्रदाय के सदस्यों को मंदिर के अंदर और बाहर होने वाली देवता की शोभायात्रा के दौरान अलग समूह बनाने से भी रोक दिया गया. उन्हें दक्षिणी संप्रदाय के साथ ही शामिल होने और वही पाठ दोहराने को कहा गया.
हालांकि, हाई कोर्ट ने उत्तरी संप्रदाय को थोड़ी राहत देते हुए कहा कि उसके सदस्य मूर्ति के पीछे अलग समूह बनाकर वेदों का पाठ कर सकते हैं.
अपने तरीके से पूजा करने को लेकर आगे के विवाद
चौबीस साल बाद, मद्रास हाई कोर्ट की एकल जज पीठ ने देवता के सामने पहली दो कतारें बनाने के दक्षिणी संप्रदाय के अधिकार को बरकरार रखा. कोर्ट ने कहा कि उत्तरी संप्रदाय के सदस्य केवल सामान्य भक्त के रूप में ही शामिल हो सकते हैं.
इस बार दोनों संप्रदाय एक नए विवाद के साथ फिर कोर्ट पहुंचे. सवाल यह था कि क्या दक्षिणी संप्रदाय के सदस्य अपने तरीके से अपना ‘मंत्र’ पढ़ सकते हैं या नहीं.
यह अपील हाई कोर्ट में उत्तरी संप्रदाय के सदस्यों द्वारा दायर एक मुकदमे से जुड़ी थी. इसमें मद्रास हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1951 के प्रावधानों का हवाला दिया गया था. इस मुकदमे में डिप्टी कमिश्नर को निर्देश देने की मांग की गई थी, जो 1951 के कानून के तहत धार्मिक संस्थानों में रीति-रिवाज और परंपरा से जुड़े सवालों पर फैसला करने वाला वैधानिक अधिकारी है.
हर स्तर पर हारने के बाद, उत्तरी संप्रदाय ने हाई कोर्ट का रुख किया और लगभग वही मुद्दे फिर से उठाए, जिनका पहले ही पुराने फैसलों के जरिए निपटारा हो चुका था.
1969 में, मद्रास हाई कोर्ट की दो जजों की पीठ ने एक बार फिर दक्षिणी संप्रदाय के पक्ष में फैसला दिया.
मौजूदा मामला
सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा याचिका दिसंबर 2025 के हाई कोर्ट के फैसले से जुड़ी है. इस फैसले में एक साझा आदेश के जरिए उत्तरी संप्रदाय की दो याचिकाओं, जो 2018 और 2022 में दायर की गई थीं, दक्षिणी संप्रदाय की 2021 की याचिका और 2020 में दायर अवमानना याचिका का निपटारा किया गया था.
हालांकि उत्तरी संप्रदाय की दोनों याचिकाओं में मांगी गई राहत एक जैसी थी, लेकिन उनके आधार अलग-अलग थे.
2018 की याचिका में तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग के अधिकारियों को उनके गुरु के लिए ‘प्रबंधम’ के पाठ की व्यवस्था करने का निर्देश देने की मांग की गई थी.
2022 की याचिका में मंदिर के कार्यकारी ट्रस्टी द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी गई थी, जिसमें सदस्यों से पुराने हाई कोर्ट के फैसलों का सख्ती से पालन करने को कहा गया था. इसमें संविधान के अनुच्छेद 25 और 26, यानी व्यक्तिगत धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता का हवाला देकर अपने तरीके से प्रार्थना पढ़ने का अधिकार जताया गया था.
याचिका में कहा गया था कि हाई कोर्ट के पुराने फैसले संविधान से पहले के हैं और अगर उत्तरी संप्रदाय के सदस्यों को अपनी प्रार्थनाएं गाने की अनुमति नहीं दी जाती, तो यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा.
ताजा कानूनी दौर में दक्षिणी संप्रदाय की याचिका में पूजा समारोह के दौरान अपने सदस्यों को सेवा देने की अनुमति के लिए पुलिस सुरक्षा मांगी गई थी. उसकी अवमानना याचिका में उत्तरी संप्रदाय के खिलाफ पुराने फैसलों की जानबूझकर अवहेलना करने पर कार्रवाई की मांग की गई थी.
हाई कोर्ट ने पुराने सभी फैसलों के निष्कर्षों को दोहराया और उत्तरी संप्रदाय के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पहले के मुकदमे दोनों संप्रदायों के अलग-अलग व्यक्तियों के बीच थे.
हाई कोर्ट ने इसके उलट फैसला देते हुए पुराने एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ये मुकदमे प्रतिनिधि हैसियत में लड़े गए थे.
सुप्रीम कोर्ट में, उत्तरी संप्रदाय ने अपील करते हुए कहा है कि वह संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत एक मान्यता प्राप्त धार्मिक संप्रदाय है.
उसका कहना है कि उत्तरी संप्रदाय का थाताचार्य परिवार विजयनगर काल से मंदिर का संचालन करता आ रहा है और पूजा-पाठ से जुड़ी कई सेवाएं निभाता रहा है. इनमें भगवान विष्णु की प्रशंसा में गाए जाने वाले 4,000 दिव्य प्रबंधम का पाठ और पवित्र जल लाने का काम भी शामिल है.
उसने 1711 के एक समझौते का भी हवाला दिया है, जिसके तहत दक्षिणी संप्रदाय को अपने गुरु की प्रशंसा में पद्य पढ़ने का अधिकार मिला था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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