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Sunday, 21 July, 2024
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SC में बीते 10 साल से लंबित मामलों की संख्या 10,486, इलाहाबाद और बॉम्बे HC में जजों के सबसे ज्यादा खाली पद

भारत के अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिला और अधीनस्थ अदालतों में 3,58,1416 मामले लंबित हैं. यह जानकारी शुक्रवार को केंद्र की मोदी सरकार ने लोकसभा में लिखित सवाल के जवाब में दी है.

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नई दिल्ली: भारतीय अदालतों में लंबित पड़े मामले चिंता का विषय बना हुआ है. सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही बीते 10 साल से लटके मामलों की संख्या 10,486 है वहीं देश के 25 हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 1,33,3312 है.

भारत के अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिला और अधीनस्थ अदालतों में 3,58,1416 मामले लंबित हैं. यह जानकारी शुक्रवार को केंद्र की मोदी सरकार ने लोकसभा में लिखित सवाल के जवाब में दी है.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने जयपुर में 18वें अखिल भारतीय विधिक सेवा प्राधिकरण सम्मेलन में देश के विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों को लेकर चिंता जाहिर की थी और मुकदमे निपटाने में राष्ट्रीय लोक अदालतों की भूमिका को अहम बताया था.

साथ ही केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि न्यायपालिका और सरकारों के बीच तालमेल से लोगों को तेजी से न्याय देने की नई संभावनाएं खोजी जा सकती है.

हालांकि अदालतों में लंबित मामले न केवल मुद्दई पर आर्थिक और मानसिक दबाव डालते हैं बल्कि फैसले आने में होने वाली देरी कभी-कभी अन्याय का सबब भी बनती है.

बता दें कि केंद्र सरकार ने संसद में हाल ही में बताया कि सुप्रीम कोर्ट में कुल 72,062 मामले और विभिन्न हाई कोर्ट में 59,45,709 मामले लंबित हैं. वहीं निचली अदालतों में 40 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं. केंद्रीय कानून मंत्री ने संसद को बताया कि मामलों के निपटान की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है, इसमें सरकार की सीधी कोई भूमिका नहीं होती है.


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इलाबाद हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा लंबित मामले

सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही मामले लंबित नहीं है बल्कि देश के विभिन्न हाई कोर्ट में भी लाखों मामले लंबे समय से लंबित पड़े हैं.

संसद में केंद्र सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक इलाहाबाद हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा 3,96,014 मामले बीते 10 साल से लंबित हैं जबकि त्रिपुरा हाई कोर्ट में एक भी मामला लंबित नहीं है. वहीं सिक्किम और मेघालय हाई कोर्ट में ऐसे मामलों की संख्या सिर्फ एक है.

बीते 10 साल से जिन राज्यों की हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा मामले लंबित हैं, ऐसे राज्यों में कलकत्ता हाई कोर्ट, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट, राजस्थान हाई कोर्ट, बॉम्बे हाई कोर्ट, पंजाब और राजस्थान हाई कोर्ट और उत्तराखंड हाई कोर्ट शामिल है.

केंद्र सरकार ने ये आंकड़े नेशनल ज्यूडिशियल ग्रिड (एनजेडीजे) से मिले आंकड़ों के आधार पर दिए हैं. केंद्र सरकार ने उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के आंकड़े भी दिए हैं जहां बीते 10 सालों से सबसे ज्यादा मामले लंबित हैं.

ऐसे राज्यों में बिहार, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु शामिल है. देश के तमाम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10 साल से ज्यादा से लंबित मामलों की कुल संख्या 3,58,1416 है.

चित्रण: रमनदीप कौर | दिप्रिंट

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पंजाब में ऐसे लंबित मामले सबसे ज्यादा जिसमें केंद्र सरकार एक पक्ष है

संसद में केंद्र सरकार द्वारा मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक पंजाब में ऐसे सबसे ज्यादा लंबित मामले हैं जिनमें केंद्र सरकार एक पक्ष है.

वहीं सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट, कलकत्ता हाई कोर्ट, जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट, मद्रास हाई कोर्ट और ओडिशा हाई कोर्ट में लंबित मामलों की जानकारी केंद्र सरकार के पास नहीं है.

वहीं दिल्ली, केरल, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में लंबित पड़े सबसे ज्यादा मामलों में केंद्र सरकार एक पक्ष है.

इलाहाबाद और बॉम्बे हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा जजों के खाली पद

14 जुलाई 2022 तक के आंकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जजों के कुल 34 स्वीकृति पदों में से 2 पद रिक्त हैं वहीं देश के हाई कोर्ट में जजों के रिक्त पदों की संख्या काफी ज्यादा है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट में जजों के 69, बॉम्बे हाई कोर्ट में 39, कलकत्ता हाई कोर्ट 26, गुजरात हाई कोर्ट में 24, मध्य प्रदेश में 20, पंजाब और हरियाणा में 39, राजस्थान में 22 और तेलंगाना हाई कोर्ट में 15 पद खाली हैं.

2022 में देश की 25 हाई कोर्ट में कुल जजों के रिक्त पदों की संख्या 386 है, जो कि 2019, 2020 और 2021 की तुलना में कम है.

सरकार ने बताया कि उच्च न्यायालयों में रिक्तियों को भरना कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक सतत, एकीकृत और सहयोगी प्रक्रिया है. इसके लिए राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर विभिन्न संवैधानिक प्राधिकरणों से परामर्श और अनुमोदन अपेक्षित है.

चित्रण: रमनदीप कौर | दिप्रिंट

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फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थिति

नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकसभा को फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा बीते तीन साल में निपटाए गए मामलों का भी राज्यवार आंकड़ा मुहैया कराया है.

आंकड़ों के अनुसार 2019, 2020 और 2021 में क्रमश: 6,46,063, 23,99,56 और 40,5618 मामलों का निपटारा किया गया है. वहीं 31 मई 2022 तक 1,78,789 मामले फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए निपटाए गए हैं.

चित्रण: रमनदीप कौर | दिप्रिंट

फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए 2022 में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, असम, बंगाल, तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मामले निपटाए गए हैं.

2021 में महाराष्ट्र की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने देश में सबसे ज्यादा 1,14,254 मामलों का निपटान किया है जो कि राज्य में 2019 और 2020 के मुकाबले कहीं ज्यादा है.

वहीं उत्तर प्रदेश में 2019 और 2020 में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने क्रमश: 3,29,345 और 1,48,466 मामले निपटाए थे लेकिन 2021 में सिर्फ 86,013 मामलों का ही निपटान हो सका.

गुजरात में भी 2019 और 2020 की तुलना में 2021 में फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए अधिक मामलों का निपटान हुआ है. वहीं सबसे उल्लेखनीय स्थिति गोवा की है जहां 2019 में शून्य और 2010 में 130 मामलों का निपटारा हुआ था वहीं 2021 में ये आंकड़ा 59974 मामलों तक पहुंच गया.

2019 में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 64,6063 मामलों, 2020 में 23,99,56 मामलों, 2021 में 40,51,68 मामलों का निपटारा किया वहीं 31 जुलाई 2022 तक 17,87,89 मामलों का निपटान हो चुका है.

चित्रण: रमनदीप कौर | दिप्रिंट

लोकसभा में लिखित तौर पर पूछे गए इस सवाल के जवाब में कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभाग अनावश्यक मुकदमेबाजी को कम करने के लिए क्या कदम उठा रही है, इस पर मोदी सरकार ने बताया कि रेलवे और राजस्व विभाग जैसे मंत्रालयों और विभाग बड़ी संख्या में मुकदमेबाजी में शामिल हैं.

सरकार ने बताया कि रेल मंत्रालय ने सभी स्तरों पर न्यायालयीय मामलों की प्रभावी मानीटरिंग करने के लिए अनुदेश जारी किया है और न्यायालयों के बोझ और मामलों को लड़ने में खर्च में कटौती करने को कहा है.


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