scorecardresearch
Sunday, 30 August, 2026
होमदेशबंगाल में SIR का साइड इफेक्ट: वोटर लिस्ट से नाम कटने पर नौकरी से विदेश यात्रा तक मुश्किलें

बंगाल में SIR का साइड इफेक्ट: वोटर लिस्ट से नाम कटने पर नौकरी से विदेश यात्रा तक मुश्किलें

SIR के कारण बंगाल की वोटर लिस्ट से 90 लाख से ज़्यादा वोटरों के नाम हटा दिए गए. हाई कोर्ट में ज़्यादातर याचिकाकर्ता अपील ट्रिब्यूनल से अपने मामलों का जल्द निपटारा चाहते हैं.

Text Size:

नई दिल्ली: एक पिता अपने 10 साल के बच्चे के इलाज के लिए अमेरिकी वीजा के लिए आवेदन नहीं कर पा रहा है. एक युवती इस डर में जी रही है कि पुलिस वेरिफिकेशन में उसके खिलाफ रिपोर्ट आ गई तो वह असिस्टेंट टीचर नहीं बन पाएगी. एक और व्यक्ति NEET पास करने के बाद इस इंतिजार में है कि उसका मामला कब तय होगा, ताकि उसे मेडिकल कॉलेज में सीट मिल सके. वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के पीछे की ये कहानियां दिखाती हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का असर सिर्फ वोट देने के अधिकार तक सीमित नहीं है.

कलकत्ता हाई कोर्ट में रोज ऐसे लोग याचिका दायर कर रहे हैं, जो कह रहे हैं कि वोटर लिस्ट से नाम हटने की वजह से उनके करियर और विदेश यात्रा की संभावनाओं पर असर पड़ रहा है. इन ‘स्पेशली फिक्स्ड मैटर्स’ की सुनवाई हर दिन दोपहर 1 बजे जस्टिस कृष्ण राव की बेंच करती है. औसतन हर दिन इस बेंच के सामने 40 से ज्यादा ऐसे “SIR MATTERS” लिस्टेड होते हैं.

SIR से जुड़े मामलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि हाई कोर्ट के लिए अब हर मामले से जुड़ी फिजिकल फाइल ढूंढना भी मुश्किल हो रहा है.

हाई कोर्ट में आने वाले ज्यादातर याचिकाकर्ता चाहते हैं कि अपीलेट ट्रिब्यूनल उनके मामलों का जल्द फैसला करे.

वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन की इस प्रक्रिया के बाद राज्य की वोटर लिस्ट से 90.80 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे. जैसा कि ThePrint ने पहले बताया था, एक RTI के जवाब से पता चला कि SIR के बाद पश्चिम बंगाल में दाखिल की गई 38 लाख से ज्यादा अपीलों में से 7 अगस्त तक 31 लाख अपीलों पर फैसला नहीं हुआ था.

38 लाख अपीलों में से 20 लाख से ज्यादा अपीलें खुद चुनाव आयोग ने दाखिल की थीं. इनके जरिए उन मतदाताओं को वोटर लिस्ट में शामिल किए जाने को चुनौती दी गई थी, जिन्हें जांच और फैसला करने के दौरान न्यायिक अधिकारियों ने पहले ही सही माना था. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले, 10 मार्च को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाने का निर्देश दिया था. इन ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं.

यह प्रशासनिक व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करती है. इसकी शुरुआत SIR से होती है. इसमें चुनाव आयोग के तहत काम करने वाले स्थानीय बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) वोटरों के रिकॉर्ड में “गड़बड़ियां” या “अंतर” पहचानते हैं और वोटरों को कारण बताओ नोटिस भेजते हैं. इसके बाद वोटरों को चुनाव आयोग के रजिस्ट्रेशन अधिकारियों के सामने खुद पेश होकर ऐसे पुराने दस्तावेज देने होते हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि उस विधानसभा क्षेत्र में उन्हें वोट देने का अधिकार है. इसके बाद BLO वोटर की स्थिति को “अंडर एडजुकेशन” यानी फैसला होने तक जांच में रख देते हैं. अंत में कारण सहित आदेश के जरिए तय होता है कि वोटर का नाम अंतिम वोटर लिस्ट में रहेगा या हटा दिया जाएगा.

इन नाम हटाए जाने का सबसे ज्यादा असर उन मतदाताओं पर पड़ा, जिन्हें शुरुआती ड्राफ्ट रिवीजन के दौरान ASDD यानी Absent, Shifted, Deleted, Displaced (अनुपस्थित, स्थानांतरित, हटाया गया, विस्थापित) श्रेणियों में रखा गया था.

“लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” की कैटेगरी खास तौर पर पश्चिम बंगाल में शुरू की गई थी. इसका इस्तेमाल ऐसे वोटरों की पहचान करने के लिए किया गया, जिनके रिकॉर्ड में ऐसी गड़बड़ियां थीं जिनकी जांच जरूरी थी. जैसे माता-पिता और बच्चे की उम्र में असामान्य अंतर, नामों में अंतर या पते और रिश्ते से जुड़ी गड़बड़ी. इसके बाद ऐसे लोगों को नोटिस और सुनवाई का सामना करना पड़ा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया कि यह अतिरिक्त कैटेगरी सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही क्यों शुरू की गई. कोर्ट ने इस प्रक्रिया से प्रभावित लोगों के लिए एक प्रभावी अपील व्यवस्था की जरूरत पर भी जोर दिया.

परीक्षा पास, लेकिन नौकरी का भविष्य अधर में

38 साल की हुगली निवासी कनिका दास सिर्फ इसलिए हाई कोर्ट नहीं पहुंची हैं कि वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण उनका वोट देने का अधिकार चला गया है. उनका कहना है कि अब इससे उनके करियर पर भी खतरा पैदा हो गया है.

हाई कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में दास ने कहा कि “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” टैग की वजह से उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया. इसकी वजह यह बताई गई कि उनके और उनके पिता की उम्र के बीच 50 साल से ज्यादा का अंतर था.

दास ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए थे. इनमें उनका आधार, उनके पिता का आधार और EPFO की ओर से जारी उनके पिता का पेंशन भुगतान आदेश शामिल था. इन दस्तावेजों से उन्होंने साबित करने की कोशिश की कि उनके और उनके पिता के बीच 39 साल का उम्र का अंतर “बिल्कुल सामान्य” है. इसके बावजूद उनकी वोटर स्थिति को “अंडर एडजुकेशन” में डाल दिया गया और बिना कारण सहित आदेश दिए उनका नाम हटा दिया गया.

उन्होंने इसे बेहद भेदभावपूर्ण बताया. उनका कहना है कि उनकी दो बहनों के नाम उसी वोटर लिस्ट में बिना किसी आपत्ति के रहने दिए गए.

दास ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख इसलिए किया क्योंकि 2 अप्रैल 2026 को अपीलेट ट्रिब्यूनल में दाखिल उनकी कानूनी अपील पर अब तक फैसला नहीं हुआ है.

दास ने हाई कोर्ट को बताया कि उन्होंने दूसरा राज्य-स्तरीय चयन परीक्षण (2nd SLST) पास कर लिया है और कक्षा 11-12 के लिए असिस्टेंट टीचर की नियुक्ति के लिए सफल हुई हैं. फिलहाल उनकी अनिवार्य पुलिस वेरिफिकेशन चल रही है.

लेकिन क्योंकि वोटर लिस्ट में नाम होना निवास और पहचान की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाला मुख्य दस्तावेज है, इसलिए नाम हटने से पुलिस की ओर से उनके खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट आने का खतरा है. इसलिए उन्होंने हाई कोर्ट से अपीलेट ट्रिब्यूनल को उनकी अपील पर जल्दी फैसला करने का निर्देश देने की मांग की.

मुरसलीम एस.के. की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है.

उनकी याचिका में कहा गया है कि मुर्शिदाबाद निवासी मुरसलीम ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) पास किया है. लेकिन वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने से इनकार कर दिया. यह सर्टिफिकेट राज्य कोटे के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले और काउंसलिंग के लिए जरूरी है. उन्होंने नाम हटाए जाने को चुनौती देते हुए पहले ही अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपील कर दी थी, लेकिन उस पर अब तक फैसला नहीं हुआ है.

उनकी NEET एडमिशन काउंसलिंग 13 अगस्त से शुरू होनी थी.

7 अगस्त को हाई कोर्ट ने अपीलेट ट्रिब्यूनल से उनकी अपील को एक हफ्ते के भीतर निपटाने का अनुरोध किया. कोर्ट ने जंगीपुर के SDO को चार हफ्तों के लिए वैध एक अस्थायी डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने का भी निर्देश दिया, ताकि वह कॉलेज में दाखिले की प्रक्रिया में हिस्सा ले सके. लेकिन अपीलेट ट्रिब्यूनल ने अभी तक उनकी अपील पर फैसला नहीं किया है. अगर अस्थायी डोमिसाइल सर्टिफिकेट की अवधि खत्म होने से पहले फैसला नहीं हुआ, तो मुरसलीम अपनी सीट खो सकते हैं.

एक और मामले में 21 साल के एक युवक ने हाई कोर्ट को बताया कि वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण वह प्रोफेसर की नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर पा रहा है.

फिरोज आलम ने पश्चिम बंगाल कॉलेज सेवा आयोग (WBCSC) के तहत दक्षिण दिनाजपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन किया था. लेकिन हाई कोर्ट को बताया गया कि वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण उसकी उम्मीदवारी पर विचार नहीं किया जा रहा है.

गुरुवार को आलम की वकील गोपा बिस्वास ने हाई कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता पहले ही अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपील कर चुका है. उन्होंने हाई कोर्ट से अपील का जल्द फैसला कराने का निर्देश देने की मांग की, ताकि वह “असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति की प्रक्रिया में शामिल हो सके”. बेंच ने आदेश दिया कि आलम की अपील को जितना जल्दी हो सके, और बेहतर होगा कि दो हफ्ते के भीतर निपटा दिया जाए, ताकि उसके करियर पर असर न पड़े.

उसी दिन जब आलम हाई कोर्ट में पेश हुआ, कोर्ट ने एक पश्चिम बंगाल सिविल सेवा (WBCS) अभ्यर्थी की अपील भी सुनी. उसने खुद अपना पक्ष रखते हुए कहा कि SIR के बाद वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण उसके नौकरी के अवसरों पर असर पड़ रहा है. हाई कोर्ट ने उसकी याचिका पर 31 अगस्त को सुनवाई के लिए तारीख दी, बशर्ते पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों की फाइलों के ढेर में उसकी फाइल मिल जाए.

SIR का असर: विदेश यात्रा नहीं कर पा रहे

पूर्व बर्धमान जिले के 40 साल के निवासी जसीमुद्दीन अहमद को सितंबर के पहले हफ्ते में व्यापारी जहाज की नौकरी जॉइन करनी है.

अपनी याचिका के जरिए उन्होंने हाई कोर्ट को बताया कि उनका पेशा एक नाविक का है और उन्हें दुनिया भर में यात्रा करनी पड़ती है. उन्हें साल में नौ महीने से ज्यादा समय भारत से बाहर रहना पड़ता है. इसलिए वह “धीमी गति से चल रही प्रशासनिक व्यवस्था” के फैसले का अनिश्चित समय तक इंतिजार नहीं कर सकते.

हाई कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उनके वकील सोमा मल ने बताया है कि अहमद पहले ही अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपील दाखिल कर चुके हैं और उन्होंने अपील का “जल्द से जल्द निपटारा” करने की मांग की है.

हाई कोर्ट को बताया गया कि उनके मृत पिता के नाम में “मिसमैच” होने की वजह से उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया.

अहमद जनवरी में सुनवाई के दौरान खुद पेश हुए थे. उन्होंने अपना भारतीय पासपोर्ट, जन्म से जुड़े दस्तावेज और अपने दिवंगत पिता के आधिकारिक नाम बदलने और मृत्यु के प्रमाणपत्र भी जमा किए थे. इसके बावजूद उनकी वोटर स्थिति को ‘Under Adjudication’ में डाल दिया गया और मार्च में उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया. इसके बाद उन्हें आगे सुनवाई का कोई मौका नहीं दिया गया.

इन दलीलों को देखते हुए जस्टिस राव ने अपीलेट ट्रिब्यूनल से ‘अनुरोध’ किया कि वह अपील को “जितना जल्दी हो सके, और बेहतर होगा कि दो हफ्ते के भीतर” निपटा दे.

एक दूसरे मामले में याचिकाकर्ता ने वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ अपनी अपील को जल्द निपटाने की मांग की. उसने बताया कि उसके पिता की हालत गंभीर है और उसे उनके इलाज के लिए सऊदी अरब जाना है.

उसने हाई कोर्ट को बताया कि पासपोर्ट होने के बावजूद उसे वीजा नहीं दिया जा रहा है. इसकी एकमात्र वजह वोटर लिस्ट से उसका नाम हटना है, क्योंकि उसका चुनाव फोटो पहचान पत्र (EPIC), जो उसके लिए मुख्य पहचान दस्तावेज है, “Deleted” कैटेगरी में है.

इस मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि उसके पिता की स्वास्थ्य स्थिति का प्रमाणपत्र रिकॉर्ड में जमा किया जाए, ताकि मामले में आगे की कार्रवाई हो सके.

एक और याचिका 10 साल के एक बच्चे के पिता ने दाखिल की. बच्चा फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित है. याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से अपीलेट ट्रिब्यूनल को उसका मामला जल्द से जल्द तय करने का निर्देश देने की मांग की, ताकि वह वीजा के लिए आवेदन कर सके और अपने बेटे के इलाज के लिए अमेरिका जा सके.

गुरुवार को हाई कोर्ट ने नूरजहां बेगम की याचिका पर भी सुनवाई की. उन्होंने अपीलेट ट्रिब्यूनल को वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ उनकी अपील का फैसला करने का निर्देश देने की मांग की.

उनका कहना था कि अपीलेट ट्रिब्यूनल ने उनकी अपील पर सुनवाई की और “बिना किसी नोटिस या सुनवाई का मौका दिए” उनका नाम हटा दिया, जबकि उनकी मौजूदा रिट याचिका हाई कोर्ट में लंबित थी.

उनके वकील संदीप दास ने जस्टिस राव की बेंच के सामने अपील की कि अपीलेट ट्रिब्यूनल में मार्च में दाखिल उनकी अपील को जल्द से जल्द दोबारा बहाल करने का निर्देश दिया जाए.

इसी के मद्देनजर हाई कोर्ट ने अपीलेट ट्रिब्यूनल को मार्च में दाखिल उनकी अपील को बहाल करने और उसका जल्द से जल्द निपटारा करने का निर्देश दिया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ‘जो हिंदू भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं देखता, वह हिंदू नहीं है’—US में मोहन भागवत


 

share & View comments