Monday, 27 June, 2022
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सिब्बल का कांग्रेस छोड़ना ‘गांधी परिवार के नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले’ पार्टी के जी-23 समूह के लिए एक झटका है

चार मूल सदस्य या तो पार्टी छोड़ चुके हैं या उन्होंने जी-23 से दूरी बना ली है. और ऐसा लगता है कि बाकी लोगों में से कई ने आलाकमान के साथ समझौता कर लिया है.

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नई दिल्ली: अगस्त 2020 में वस्तुत: गांधी परिवार के नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले अपने पत्र को लेकर कांग्रेस के अंदर खलबली मचा देने वाला जी-23 यानी 23 नेताओं का समूह अब छिन्न-भिन्न हो गया है और निष्प्रभावी और अप्रासंगिक नजर आ रहा है.

वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल की तरफ से बुधवार को कांग्रेस छोड़ने का ऐलान किए जाने के साथ ही अब तक इसमें चार मूल सदस्य कम हो चुके हैं.

सिब्बल के हटने से पहले उनके सहयोगी जितिन प्रसाद और योगानंद शास्त्री पार्टी छोड़ चुके हैं, जिन्होंने क्रमशः भाजपा और एनसीपी का दामन थामा है. वहीं, पुराने कांग्रेसी रहे वीरप्पा मोइली ने पिछले साल अक्टूबर में खुद को समूह से अलग कर लिया था.

लेकिन, ये सिर्फ संख्या 23 या 19 होने का मामला नहीं है. बल्कि सिब्बल के बाहर होने पर समूह के बाकी सदस्यों की चुप्पी इसके निष्क्रिय होने का संकेत देती है, और बताती है कि गांधी परिवार अपना वर्चस्व फिर से स्थापित करने के लिए प्रतिरोध को घटा रहा है.

समूह ने सबसे पहले अगस्त 2020 में कांग्रेस को हिलाकर रख दिया था, जब इसने अंतरिम पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी को कड़ा ‘असंतोष जताने वाला पत्र’ सौंपा था, जिसमें ‘सामूहिक मंथन और निर्णय लेने की प्रक्रिया’ की मांग की गई थी.

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जी-23 में गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, भूपिंदर सिंह हुड्डा, मनीष तिवारी, पीजे कुरियन, विवेक तन्खा, संदीप दीक्षित, राज बब्बर, राजिंदर कौर भट्टल, पृथ्वीराज चव्हाण, मिलिंद देवड़ा, मुकुल वासनिक, शशि थरूर, अरविंदर सिंह लवली और रेणुका चौधरी आदि नेता शामिल थे.

उदयपुर चिंतन शिविर के साथ कांग्रेस ने केंद्रीय संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन और कांग्रेस कार्य समिति और अन्य निकायों के चुनाव के माध्यम से सामूहिक नेतृत्व जैसी जी-23 की मुख्य मांगों को खारिज कर दिया है, साथ ही हाईकमान से साफ संदेश दे दिया है—उसकी तरह चलो या फिर अपना रास्ता नापो.

यद्यपि सिब्बल तो साइकिल पर सवार होकर अपने रास्ते चल पड़े हैं लेकिन उनके जो साथी अभी असंतोष आंदोलन का हिस्सा हैं, उन्हें स्पष्ट नजर आ रहे संकेतों को समझ लेना चाहिए.

जी-23 के एक सदस्य ने दिप्रिंट के साथ बातचीत में यह समूह खत्म होने की बात से इनकार किया.

उक्त नेता ने कहा, ‘इस पर कहने के लिए क्या है? हां, हम वह हासिल नहीं कर पाए जो हम चाहते थे, लेकिन हमने कभी यह उम्मीद नहीं की थी. हमने अपनी बात रखी है और हर कांग्रेसी जानता है कि हम सही हैं. जी-23 महज कोई संख्या नहीं है. यह कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए उम्मीद की किरण है कि पार्टी को अभी भी पुनर्जीवित किया जा सकता है. हमारे नेतृत्व को भी एक दिन यह एहसास होगा, लेकिन हो सकता है कि तब तक बहुत देर हो जाए.’


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लगातार घटती संख्या

सिब्बल इस समूह के सबसे मुखर सदस्य थे, और जी-23 को तमाम प्रमुख पार्टी नेताओं की मौजूदगी से ही ताकत मिली थी.

माना जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान इनमें से एक बड़े जननेता भूपिंदर सिंह हुड्डा की नाराजगी दूर करने में सफल रहा है. पार्टी ने उनके करीबी सहयोगी उदय भान को हरियाणा इकाई का अध्यक्ष नियुक्त करके राज्य में पार्टी का प्रभार एक तरह से पूर्व मुख्यमंत्री को सौंप दिया है.

जी-23 में शामिल लोकसभा के दो सांसदों—पंजाब से मनीष तिवारी और केरल से शशि थरूर—में से एक थरूर को सोनिया गांधी ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के समन्वय के लिए योजना समूह का सदस्य बनाकर साथ लाने की कोशिश की है.

वहीं, तिवारी तो आलाकमान ने सिब्बल की तरह ही उनके हाल पर छोड़ दिया है और हर किसी को उनके अगले कदम को लेकर उत्सुकता बनी हुई है. हो सकता है कि तिवारी किसी जल्दबादी में न हों, क्योंकि उनका मौजूदा लोकसभा कार्यकाल दो साल बाकी बचा है.

बाकी सदस्यों में से राज्यसभा में विपक्ष के पूर्व नेता गुलाम नबी आजाद और सदन में कांग्रेस के उपनेता आनंद शर्मा को राजनीतिक मामलों के समूह में जगह दी गई है, जो सोनिया गांधी द्वारा मंगलवार को गठित एक सलाहकार समूह है.

हालांकि, दोनों नेता राज्यसभा के लिए फिर मनोनीत होने की उम्मीद पाले हैं. अगर हाईकमान ने नामित करने में उनकी अनदेखी की तो यह देखना दिलचस्प होगा कि तब वे क्या करेंगे.

गांधी परिवार के वफादार माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री मुकुल वासनिक ने अगस्त 2020 के पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन उन्होंने चुप रहने का ही विकल्प चुना है. वासनिक मंगलवार को सोनिया गांधी द्वारा गठित टास्क फोर्स-2024 में शामिल थे.
आजाद, मोइली और हुड्डा के अलावा कम से कम दो अन्य पूर्व मुख्यमंत्रियों ने अगस्त के पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, जो अब एक विधायक हैं, को पार्टी में दरकिनार कर दिया गया है. वहीं, पंजाब की राजिंदर कौर भट्टल अब ज्यादा प्रभावी नजर नहीं आती हैं.

जी-23 के बाकी सदस्य चाहे वह संदीप दीक्षित हों या मिलिंद देवड़ा, विवेक तन्खा अथवा अरविंदर सिंह लवली, उनका न तो बहुत बड़ा सियासी कद है और न ही वे ऐसे बड़े जनाधार वाले नेता है, जिसकी गांधी परिवार ज्यादा परवाह करे.

पिछले साल कांग्रेस की पंजाब इकाई में उथल-पुथल के बीच एक प्रेस कांफ्रेंस में सिब्बल ने कहा था कि जी-23 नेतृत्व को लेकर सवाल पूछना जारी रखेगा क्योंकि ये ‘जी-23’ है, न कि ‘जी हुजूर 23.’

इसके बाद, जब पार्टी इस साल के शुरू में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हार गई, तो सिब्बल ने कहा कि गांधी नेतृत्व को दूर हो जाना चाहिए और किसी और को मौका देना चाहिए.

सिब्बल समूह में अकेले ऐसे सदस्य थे जिन्होंने उस समय कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाई. जाहिर तौर पर इसका कारण यही था कि पार्टी के भीतर व्यक्तिगत या राजनीतिक अहमियत मिलने से अधिकांश नेताओं ने गांधी परिवार के साथ कुछ हद तक सुलह कर ली है.

सिब्बल ने जब उपरोक्त बयान दिया तो आजाद ने तत्काल ही यह कहकर उसका जवाब दिया कि ‘सोनिया गांधी के नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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