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Saturday, 15 June, 2024
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कोविड में बंद स्कूल, व्यस्त प्रशासन के बीच बाल विवाह करने का लड़कियों पर बढ़ा दबाव, हेल्पलाइन पर लगाई गुहार

कोरोना महामारी के बीच बढ़ी असुरक्षा, आर्थिक तंगी, से लड़कियों पर बढ़ा बाल विवाह का खतरा, 7 महीने में चाइल्ड लाइन 1098 पर आईं 18,324 कॉल.

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बुलंदशहर: जब कोविड महामारी ने उसके स्कूल को बंद कर दिया और वो घर के भीतर रहने के लिए ही मजबूर हो गई तब, उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर जिले की एक बारह साल की लड़की ने अपने घर के आसपास होने वाली बातचीत में एक तब्दीली महसूस की.

‘शुरुआत में, ऑनलाइन कक्षाएं चालू नहीं हुई थी. तो जितना मेरे परिवार ने मुझे अपने इर्द गिर्द देखा, उतनी ही तेजी से मेरी शादी की संभावनाओं पर चर्चा बढ़ती चलती गई.’ उसने ये बातें दिप्रिंट से खालौर गांव में अपने घर पर साझा कीं. आप बीती बताते हुए वो थोड़ा फुसफुसा रही थी, ताकि पास बैठे उनके माता-पिता ना सुन सकें.

वो कहती हैं, ‘ग्रामीणों के बीच इस बात का डर बढ़ गया था कि जवान होती लड़कियां अपने प्रेमियों के साथ भाग जाएंगी. इस तरह की बातों ने मेरे भाई के मन में मेरे चरित्र पर संदेह पैदा किया और उसने मुझे गालियां देनी शुरू कर दीं. मेरे साठ साल के बूढ़े मां-पिताजी को ये दुर्व्यवहार बर्दाश्त नहीं हो रहा था तो उन्होंने मेरे लायक एक लड़का ढूंढना मुनासिब समझा.’

लड़की की शादी नवंबर में होने वाली थी लेकिन उसकी क्विक सोच ने उनसे बाल वधू बनने के कुचक्र से बाहर कर दिया.  ‘अगस्त में रोका सेरेमनी के बाद, एक दिन मैं चुपचाप घर से बाहर निकली और अपनी टीचर को फोन कर मदद मांगी. मैं बाल विवाह नहीं करना चाहती थी. लड़की ने बताया, ‘मैंने आस पास की लड़कियों से कम उम्र में शादी होने के बाद की भयानक कहानियां सुनी हैं.’

12 साल की ये लड़की जो करने में कामयाब रही वो स्पष्ट तौर पर इस ट्रेंड को उजागर करता है कि कोरोनावायरस और लॉकडाउन के दौरान के बाद के महीनों में बाल विवाह के प्रयास बढ़ गए हैं.

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केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय हेल्पलाइन यानि ‘चाइल्डलाइन 1098’ से एक आरटीआई के जरिए मिले आंकड़ों के अनुसार, इस साल अप्रैल से लेकर अक्टूबर महीने के बीच बाल विवाह से जुड़े 18,324 डिस्ट्रेस कॉल्स किए गए थे. इसकी तुलना में, पिछले साल इसी समयावधि के दौरान हेल्पलाइन पर बाल विवाह से जुड़े 15,238 डिस्ट्रेस कॉल्स मिले थे. और 2019-20 के कुल आंकड़ों पर नजर डालें तो इनकी संख्या लगभग 25,000 थी.

हेल्पलाइन के अंदरूनी सूत्र, अन्य विशेषज्ञ और बाल विवाह का प्रयास करने वाले परिवारों से बातचीत से लॉकडाउन के दौरान हुए इस तरह के प्रयासों के पीछे कई कारण निकलकर आते हैं- स्कूल बंद होने के बाद से बच्चों ने ज्यादा समय घर पर बिताना शुरू कर दिया, कोविड के दौरान शादियों में मेहमानों की सीमित संख्या से शादी के खर्च में आने वाली कमी की संभावना और ये आश्वासन की इस दौरान पुलिस व प्रशासन कोविड महामारी के इंतज़ामों के चलते व्यस्त होंगे और हस्तक्षेप करने की गुंजाईश कम हो जाएगी.

इसके अलावा, खेती में लगे कुछ परिवार जिनकी आजीविका पर सीधेतौर पर इस महामारी से कोई असर नहीं पड़ा था, अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए शादी को आसान तरीका समझ रहे थे.

बुलंदशहर जिला, जहां हम 12 साल की लड़की से मिले, स्थानीय बाल कल्याण समिति के अधिकारियों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में बाल विवाह से संबंधित आ रही डिस्ट्रेस कॉल्स के मामले में टॉप जिलों में था. स्थानीय बाल कल्याण समिति, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत हर जिले में स्थापित किए जाने वाले पैनल हैं जो ज़रूरतमंद बच्चों की देखभाल और सुरक्षा, उपचार, विकास और पुनर्वास की देखरेख करते हैं और उनकी बुनियादी ज़रूरतों व मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं.

जिले में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता ये बात मानते हैं कि बाल विवाह के मामलों में बढ़ोतरी हुई है और वो इसी वजह से कि पिछले कुछ महीनों से अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं.

संभावित बाल विवाहों को रोकने के लिए वो उन बच्चों के घर जाकर देख रहे हैं जो ऑनलाइन कक्षाएं अटेंड नहीं कर पा रहे हैं या फोन पर जवाब नहीं दे रहे हैं. इसी वजह से बुलंदशहर में कई बाल विवाहों को रोकने में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण साबित हुई है.


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भविष्य की चेतावनियां

साल 2020 की शुरुआत से ही जब कोरोना महामारी ने पैर पसारना शुरू किया था तब ही विशेषज्ञों ने चेतावनी जारी की थी कि इस बीमारी के समाज के कुछ सबसे कमजोर वर्गों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेंगे.

अप्रैल महीने में, युनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड ने देशों को आगाह किया था कि महामारी के कारण आर्थिक कठिनाई बढ़ेंगी , और इसके साथ ही यूएन के ‘हस्तक्षेप कार्यक्रमों’ में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण अगले 10 वर्षों में अनुमानित 13 मिलियन अधिक बाल विवाह हो सकते हैं.

भारत में शादी के लिए कानूनी उम्र महिलाओं के लिए 18 वर्ष और पुरुषों के लिए 21 वर्ष निर्धारित है. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के अनुसार, भारत में हर साल 18 वर्ष से कम उम्र की लगभग 15 लाख लड़कियों की शादी होती है, जिससे यह दुनिया में सबसे अधिक बाल विवाह वाला देश बन जाता है.

दिप्रिंट को आरटीआई के जरिए मिले चाइल्डलाइन के आंकड़ों से ये भी पता चलता है कि बाल विवाह से जुड़े डिस्ट्रेस कॉल्स की संख्या पिछले कुछ सालों से बढ़ी है. साल 2016-17 में 13,000 से अधिक, 2017-18 में 17,000 से अधिक और 2018-19 में 22,000 से अधिक मामले आए थे.

चाइल्डलाइन, बच्चों से जुड़े चाइल्ड अब्यूज, चाइल्ट लेबर, सेक्सुअल अब्यूज से लेकर हेल्थ और एजुकेशन जैसे मुद्दों के लिए काम करती है. पिछले सालों में इस हेल्पलाइन पर आने वाले डिस्ट्रेस फोन कॉल्स की संख्या भले ही लगातार कम हुई हो लेकिन सेक्सुअल अब्यूज, चाइल्ड लेबर और चाइल्ड मैरिज से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

2016-17 में चाइल्डलाइन को 1,32,66,050 डिस्ट्रेस कॉल्स मिले थे, 2017-18 में इनकी संख्या घटकर 1,15,59,750 हो गई, 2018-19 में 90,12,164 और 2019-20 में 72,94,688.

इस साल हेल्पलाइन को मार्च और अक्तूबर के बीच 45,28,870 डिस्ट्रेस कॉल्स आ चुके हैं.

हेल्पलाइन के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘ हमें इस साल कम कॉल आने की उम्मीद थी क्योंकि शुरुआती महीनों के लिए देश में सख्त लॉकडाउन था और कहीं भी कोई आवाजाही नहीं हुई.’

अधिकारियों ने ये भी कहा कि बाल विवाह के संबंध में आने वाले डिस्ट्रेस कॉल्स में से लगभग ज्यादातर मामलों में शादी समारोह को पुलिस, जिला प्रशासन या हेल्पलाइन के कर्मचारियों ने रोक दिया था.

हर डिस्ट्रेस कॉल के लिए एफ़आईआर दर्ज नहीं की जाती है. ज्यादातर मामलों में लोगों को तभी नामजद किया जाता है जब वो पुलिस व प्रशासन को लिखित में आश्वासन देने के बाद भी शादी करने की तमाम कोशिशें करते हैं.

एक तरफ कोविड महामारी के दौरान बाल विवाह से जुड़े डिस्ट्रेस कॉल्स बढ़ गए हैं तो दूसरी तरफ महिला एवं बाल विवाह मंत्रालय का कहना है कि एनसीआरबी ने मंत्रालय को बताया है कि लॉकडाउन के दौरान बाल विवाह के मामलों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है.

इसी साल सितंबर महीने में संसद को दिए एक लिखित जवाब में केंद्रीय महिला एवं बाल विवाह मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था, ‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो से मिली जानकारी के हिसाब से ऐसा कोई आंकड़ा नहीं मिला है कि लॉकडाउन के दौरान बाल विवाह के मामलों में वृद्धि हुई है.’नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2016-17 में बाल विवाह के कुल 326 मामले दर्ज हुए थे, 2018 में 395 और 2019 में ये आंकड़े 501 हो गए थे.

दिप्रिंट ने एक आरटीआई दायर कर एनसीआरबी से मार्च से लेकर अक्तूबर तक के दौरान दर्ज हुए मामलों की सूचि मांगी तो एनसीआरबी ने जवाब दिया कि ब्यूरो सिर्फ सालाना आंकड़ें इकट्ठा करता है.

इस रिपोर्ट के लिए दिप्रिंट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में कार्यरत पीआईबी एडिशनल डायरेक्टर जनरल से टेलीफ़ोन व मेल के जरिए जवाब मांगा है. इसके साथ ही एनसीआरबी के हवाले से संसद में दिए जवाब से जुड़े आंकड़ों की जानकारी मांगी है. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक मंत्रालय की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है.

नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के अनुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने कोविड महामारी के दौरान बाल विवाह के मामलों में वृद्धि से इनकार किया है. एनसीपीसीआर के चेयरपर्सन प्रियांक कानूनगो ने दिप्रिंट को बताया, ‘हमने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से विशेष रूप से पूछा कि क्या इन मामलो में बढ़ोतरी हुई है. पिछले महीने हुई मीटिंग में उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार किया है कि ऐसी कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है.’

गुस्से से भरी एक मां

बुलंदशहर के एक और गांव वीरपुर में, एक 16 वर्षीय लड़की की मां नाराज़ थीं क्योंकि उनकी बेटी के विवाह को सितंबर में जिला अधिकारियों ने रोक दिया था.

वो कहती हैं, ‘उन्होंने तो शादी रोक दी, लेकिन मुझे एक बात बताएं, अगर मैं आज या दो साल बाद शादी करूं तो क्या फर्क पड़ेगा? मेरे पति कई साल पहले ही गुजर गए थे.

16 वर्षीय लड़की ने बीच में ही बात काटते हुए समझाने की कोशिश की कि उनकी मां ने शादी कराने का फैसला क्यों लिया. वो आगे कहती हैं, ‘मेरे भाई भी शादीशुदा हैं. अब लॉकडाउन ने हमें और आर्थिक रूप से कमजोर बना दिया है. मेरी मां ने इमोशनल किया तो मैं शुरुआत में शादी करने के लिए सहमत हो गई थी क्योंकि इसका मतलब था कि कम लोग शादी में शामिल होंगे (कोविड प्रतिबंधों के कारण), और मेरी मां पर बोझ भी कम हो जाएगा.’

दूल्हे के परिवार ने दहेज़ की मांग नहीं की थी, शादी नवंबर में तय कर दी गई थी. मां के लिए एक आदर्श मैच की तरह था लेकिन उसके बाद लड़की ने अपना मन बदल लिया. उसने अपनी स्कूल टीचर को फोन किया. इस तरह बात जिले के अधिकारियों तक पहुंची.

जिस टीचर को वीरपुर की छात्रा ने अलर्ट किया था, ये वही महिला टीचर हैं जिन्हें खालौर की 12 वर्षीया छात्रा ने फोन कर मदद मांगी थी. मधु शर्मा परदादा परदादी इंटर कॉलेज नाम के एक स्कूल में पढ़ाती हैं, जो ग्रामीण लड़कियों को मुफ्त में शिक्षा मुहैया कराता है. इस कोरोना महामारी के दौरान स्कूल ने बच्चियों को जबरन बाल विवाह जैसी कुप्रथा से बचाने में काफी काम किया है.

दिप्रिंट से बात करते हुए शर्मा कहती हैं कि खालौर वाली बच्ची स्मार्ट है. वो आगे कहती हैं, ‘उसके फोन करने के बाद मैं उसके परिवार से मिलने गई और शादी को कैंसिल करने के लिए कहा. लेकिन परिवार ने सोचा कि पुलिस और प्रशासन तो कोविड से लड़ने में व्यस्त हैं, और वे आसानी से शादी की तैयारियां कर लेंगे. इसलिए शादी रोकने के लिए जिला प्रशासन को सूचित किया गया.

शर्मा जिस स्कूल में पढ़ाती हैं, वो एक वह नॉन प्रॉफिट एनजीओ परदादा परदादी एजुकेशनल सोसायटी (पीपीईएस) द्वारा स्थापित किया गया है जो साल 2000 से ही ग्रामीण लड़कियों के सशक्तिकरण की दिशा में काम कर रहा है.

पीपीईएस द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में, छात्राएं हर रोज स्कूली सभा में एक शपथ लेती हैं- ‘हम जरूर शादी करेंगे लेकिन दसवीं करने के बाद.’

शर्मा बताती हैं कि लॉकडाउन के दौरान कई लड़कियों ने या तो ऑनलाइन क्लासेज में भाग लेना बंद कर दिया था या फोन कॉल्स उठाने कम कर दिए थे.

वो आगे कहती हैं, ‘उसके बाद हमने ऐसे परिवारों के यहां जाना शुरू कर दिया ताकि वो बच्चियों का स्कूल ड्रॉप आउट ना करा दें और शादी कराने लगे.’

‘हमें एहसास हुआ कि कोरोना महामारी के दौरान परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी तो उनके दिमाग में पहला विचार बेटियों से शादी करने का ही आ रहा था.’

पीपीईएस की सीईओ रेणुका गुप्ता दिप्रिंट को बताती हैं, ‘बाल विवाह, कोरोना महामारी के दौरान फिर से एक भयावह वास्तविकता बन गया है.’ वो पिछले वर्षों के आंकड़ों की जानकारी भी देती हैं और कहती हैं कि किस तरह बाल विवाह को रोकने के लिए उन्होंने काम किया.

वो आगे कहती हैं, ‘पिछले 20 सालों में हमने कम से कम 250 लड़कियों को बाल वधू बनने से बचाया है. पिछले दो सालों में ये आंकड़ा जीरो पर आ गया था. ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि हमने लड़कियों को स्कॉलरशिप्स दी और उनके परिवारों को ई-ग्राम पहल के तहत रोज़गार देकर आर्थिक रूप से सशक्त बनाया था.’

वो आगे कहती हैं, ‘लेकिन…ये सामाजिक बुराई एक बार फिर भयावह रूप में सामने आई. कोरोना महामारी के दौरान हमने अब तक पांच बाल विवाह हस्तक्षेप कर रुकवाए हैं. गहराता आर्थिक संकट और बढ़ती सामाजिक असुरक्षा एक बार फिर इस सामाजिक कुप्रथा को बढ़ावा दे रही है.’

बुलंदशहर की बाल कल्याण समिति द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, उन्हें अप्रैल से दिसंबर तक बाल विवाह से संबंधित 24 डिस्ट्रेस कॉल्स आए. साल 2019 में ये संख्या 2 थी तो 2018 में 7 और 2017 में 4.

इस समिति के एक सदस्य डॉक्टर भूपेंद्र सिंह कहते हैं, ‘ये आंकड़ें तो यही इशारा करते हैं कि वृद्धि तो हुई है. हमें जुलाई-अगस्त और नवंबर-दिसंबर के दौरान सबसे ज्यादा शिकायतें मिलीं.’

वो कहते हैं, ‘जुलाई-अगस्त के दौरान, बड़े मेट्रो शहरों से लौटे प्रवासी मजदूरों ने अपनी बेटियों की शादियां करने की कोशिश की. शहरों में उनके लिए बहुत कुछ बचा नहीं था और गांव में भी कोई खास संसाधन नहीं था.’

उन्होंने आगे बताया, ‘कई सालों बाद हमारे पास इस बार ऐसा भी केस आया जिसमें लड़के की ही उम्र 16 साल थी. जिससे उसकी शादी करवाई जा रही थी वो किशोरी महज 12 साल की थी. लड़की के परिवार को पैसा भी ऑफर किया गया था. ये केस भी इस दौर के क्राइसिस को काफी हद तक बयान कर देता है.’

उनके मुताबिक नवंबर-दिसंबर में ये क्राइसिस खेती-बाड़ी से जुड़े लोगों में ज्यादा देखने को मिले. वो कहते हैं, ‘हमने यह भी पाया कि सिंगल मां और ऐसे लोग जो एक गहरी सामाजिक असुरक्षा का सामना करते हैं, वे अपनी कम उम्र की लड़कियों की शादी करने के की कोशिश कर रहे थे. ‘अगर मेरे साथ आगे कुछ हो जाता है तो बच्ची का क्या होगा’ जैसे डर ने भी लोगों को घेरा हुआ है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘चूंकि पुलिस और जिला प्रशासन कोविड के इंतजाम करने में व्यस्त थे, तो लोगों में ये बात फैली हुई थी कि इस दौरान कोई परिवार पकड़ा नहीं जाएगा. इसके अलावा, शादियों में केवल सीमित संख्या में लोगों को अनुमति दी गई थी, इसलिए लोगों ने इसे कुछ पैसे बचाने के अवसर के रूप में देखा.’

सिंह एक महत्वपूर्ण बात और बताते हैं, ‘लड़कियों के स्कूल ड्रॉप आउट में वृद्धि देखने को मिली, हो सकता है कि ये भी बाल विवाह के पीछे के कई कारणों में से एक हो.’


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