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Tuesday, 28 May, 2024
होमदेशतस्करों, साइबर ठगों के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन की तैयारी- दिल्ली में ‘कड़े कानून’ के प्रस्ताव को LG की मंजूरी

तस्करों, साइबर ठगों के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन की तैयारी- दिल्ली में ‘कड़े कानून’ के प्रस्ताव को LG की मंजूरी

दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि दिल्ली के एलजी ने तेलंगाना प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज एक्ट लागू करने के प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए गृह मंत्रालय को भेज दिया है.

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नई दिल्ली: दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) विनय कुमार सक्सेना ने तेलंगाना प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज एक्ट को राजधानी में लागू करने संबंधी प्रस्ताव पर गुरुवार को अपनी मुहर लगा दी. यदि कानून लागू हुआ तो दिल्ली पुलिस को शहर में संदिग्धों को एहतियातन हिरासत में लेने का अधिकार मिल जाएगा.

सूत्रों ने दिप्रिंट से बातचीत में इसकी पुष्टि की कि दिल्ली पुलिस की तरफ से लाए गए इस कानून के विस्तार संबंधी का प्रस्ताव को गृह मंत्रालय (एमएचए) को भेजा गया है.

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘एलजी ने तेलंगाना प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज एक्ट को एनसीटी (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में लागू करने संबंधी दिल्ली पुलिस के प्रस्ताव को मंजूरी देने के साथ इसे केंद्रशासित प्रदेश (कानून) अधिनियम, 1950 की धारा-2 के तहत अधिसूचित करने के लिए एमएचए को भेज दिया है.’

अधिकारी ने कहा, ‘बढ़ते संगठित अपराध, यौन अपराध, ज़मीन हथियाने की घटनाओं, चेन स्नेचिंग, जुआ खेले जाने और व्हाइट कॉलर वित्तीय अपराधों को प्रभावी ढंग से रोकने और उन पर काबू पाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है.’

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, अधिनियम का इस्तेमाल ‘शराब तस्करों (बूटलेगर्स), मादक द्रव्य संबंधित अपराधियों, अनैतिक तस्करी में शामिल अपराधियों, ज़मीन को हड़पने वालों, मिलावटी खाद्य अपराधियों, नकली दस्तावेज़ बनाने वालों, अनुसूचित वस्तुओं के अपराधियों, जुआरियों, यौन अपराधियों, विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल करने वालों, अवैध हथियार रखने वालों, साइबर क्राइम से जुड़े लोगों और व्हाइटकॉलर या वित्तीय अपराधियों पर शिकंजा कसा जा सकेगा.’

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जुलाई 2021 में सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने इस सख्त कानून को एक ‘काला कानून’ बताया था. जस्टिस आर.एफ. नरीमन, जस्टिस के.एम. जोसेफ और जस्टिस बी.आर. गवई ने एक बंदी की पत्नी की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था, ‘स्पष्ट तौर पर यह लोगों की स्वतंत्रता के खिलाफ एक काला कानून है. हैरानी की बात है कि किसी ने भी इसकी वैधता को चुनौती नहीं दी है.’

केंद्रशासित प्रदेश (कानून) अधिनियम, 1950 के तहत केंद्र द्वारा सरकारी गजट में अधिसूचित करके दिल्ली में किसी भी अन्य राज्य के कानून को किसी भी प्रतिबंध और संशोधन के साथ लागू किया जा सकता है, जैसा उसे उचित लगे. इस प्रावधान के तहत तेलंगाना का कानून यहां लागू किया जा सकता है, लेकिन यह गृह मंत्रालय की मंजूरी के बाद ही संभव है क्योंकि केंद्रशासित प्रदेश होने के नाते दिल्ली में कानून-व्यवस्था और पुलिस का नियंत्रण केंद्र के हाथों में है.


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‘आपराधिक गतिविधियों पर रोक ज़रूरी’

सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि दिल्ली पुलिस की तरफ से पहली बार जून में इस कानून को लागू करने की मांग की गई थी, जिसमें कहा गया था कि ‘आपराधिक गतिविधियों की रोकथाम और प्रभावी नियंत्रण के लिए कड़े कानून की आवश्यकता है, खासकर बार-बार अपराध करने वालों पर काबू पाने के लिए यह बेहद ज़रूरी है.’

पुलिस सूत्रों ने कहा कि इन आपराधिक गतिविधियों में ज़मीन हड़पना, झपटमारी, डकैती, हथियारों का इस्तेमाल, मादक द्रव्यों की बिक्री, जुआ और यौन अपराध शामिल हैं.

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा,‘यह कानून सार्वजनिक कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले आपराधिक तत्वों से निपटने में बहुत प्रभावी साबित हो सकता है.’

दिल्ली पुलिस के एक अन्य अधिकारी के मुताबिक, प्रस्तावित नोटिफिकेशन में प्रावधान है कि यदि सरकार (दिल्ली के संदर्भ में एलजी) को ऐसा लगता है कि सार्वजनिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिहाज से किसी व्यक्ति पर किसी तरह की पाबंदियों की जरूरत है तो उसे हिरासत में लेने का आदेश जारी किया जा सकता है.


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‘दुरुपयोग रोकने के पर्याप्त प्रावधान’

इस कानून के दुरुपयोग की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर दिल्ली सरकार के एक दूसरे अधिकारी ने कहा, ‘इसमें हिरासत में लेने और उसे बढ़ाने की पुष्टि के लिए एक सलाहकार बोर्ड की व्यवस्था के साथ किसी भी तरह के दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं.’

अधिकारी ने बताया कि अधिनियम के तहत किसी भी व्यक्ति को हिरासत में रखने के लिए सलाहकार बोर्ड की तरफ से मंजूरी ज़रूरी होगी. साथ ही यह भी कहा कि यदि बोर्ड हिरासत में रखने की मंजूरी नहीं देता तो संबंधित व्यक्ति को रिहा कर दिया जाएगा.

अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, ‘इस तरह की हिरासत की अवधि पहली बार में तीन महीने से अधिक नहीं होगी और अधिकतम अवधि हिरासत में लिए जाने की तिथि से 12 महीने से अधिक नहीं होगी. यही नहीं हर उस मामले में जहां इस अधिनियम के तहत हिरासत में लेने का आदेश दिया गया है, सरकार नज़रबंदी की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर ही मामले को इसी उद्देश्य से सरकार की तरफ से सलाहकार बोर्ड के सामने रखेगी.’

अधिकारी ने कहा कि सलाहकार बोर्ड में वही ‘सदस्य शामिल होंगे जो न्यायाधीश रह चुके हैं या हाई कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति की योग्यता रखते हैं.’

(अनुवाद: रावी द्विवेदी | संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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