नई दिल्ली: संसद ने जाति आधारित हिंसा के मामलों के लिए अलग पुलिस स्टेशन बनाने का कानून बनाए 35 साल हो गए हैं, लेकिन अब तक सिर्फ सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही ऐसे थाने बनाए हैं. यह जानकारी संसद की एक समिति की रिपोर्ट में सामने आई है.
सामाजिक न्याय और अधिकारिता से जुड़ी स्थायी समिति ने बुधवार को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में बताया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत देश में सिर्फ 181 विशेष पुलिस स्टेशन ही हैं. ये सभी बिहार (40), मध्य प्रदेश (51), छत्तीसगढ़ (27), झारखंड (24), कर्नाटक (33), केरल (3) और पुडुचेरी (3) में हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि “समिति यह जानकर हैरान है कि कानून बने तीन दशक से ज्यादा समय हो गया, फिर भी सिर्फ सात राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में ही ऐसे पुलिस स्टेशन बने हैं.”
इसमें यह भी कहा गया कि वर्षों से राज्य सरकारों के साथ नियमित बैठकें करने के बावजूद मनचाहा परिणाम नहीं मिला.
बीजेपी सांसद पी. सी. मोहन की अध्यक्षता वाली समिति ने यह भी कहा कि उसे विशेष अदालतों के गठन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. कानून के तहत अत्याचार के मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनाना भी जरूरी है.
जिन राज्यों में ज्यादा मामले, वहां नहीं हैं विशेष थाने
हैरानी की बात यह है कि जिन राज्यों में अत्याचार के सबसे ज्यादा मामले दर्ज होते हैं, वहां विशेष पुलिस स्टेशन नहीं हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘क्राइम इन इंडिया 2023’ रिपोर्ट के अनुसार उस साल अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराध के 57,000 से ज्यादा मामले दर्ज हुए.
इनमें उत्तर प्रदेश में करीब 15,000 मामले दर्ज हुए, जो सबसे ज्यादा हैं. इसके बाद राजस्थान में 8,500, मध्य प्रदेश में 7,800 और बिहार में करीब 7,000 मामले दर्ज हुए. ये चारों राज्य मिलकर देश के लगभग दो-तिहाई SC अत्याचार मामलों के लिए जिम्मेदार हैं.
इनमें से सिर्फ मध्य प्रदेश और बिहार में ही विशेष पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं. उत्तर प्रदेश और राजस्थान, जहां सबसे ज्यादा मामले दर्ज होते हैं—वहां एक भी ऐसा पुलिस स्टेशन नहीं है.
अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराध भी 2023 में काफी बढ़े और 28.8 प्रतिशत बढ़कर 12,960 तक पहुंच गए. उस साल जातीय हिंसा के कारण मणिपुर में भी बड़ी संख्या में मामले दर्ज हुए.
कानून के तहत दोष सिद्ध होने की दर भी कम रही है. 2020 में यह लगभग 39-40 प्रतिशत थी, जो 2022 में घटकर 32-33 प्रतिशत रह गई. वहीं इन मामलों में बरी होने की दर 60 प्रतिशत से ज्यादा रही.
केंद्र ने कहा—समयसीमा तय करना मुश्किल
जब समिति ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से पूछा कि इस कानून को पूरी तरह लागू करने की समयसीमा क्या है, तो विभाग के सचिव ने कहा, “मेरे लिए कोई समयसीमा बताना मुश्किल है, लेकिन मैं यह भरोसा दिलाता हूं कि विभाग हर मंच पर राज्य सरकारों के साथ इस मुद्दे को उठाता रहता है.”
इस कानून की निगरानी के लिए एक स्टीयरिंग कमेटी भी बनाई गई है, जिसकी अध्यक्षता सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री करते हैं और सह-अध्यक्ष जनजातीय मामलों के मंत्री होते हैं. 2006 से अब तक इस कमेटी की 29 बैठकें हो चुकी हैं. आखिरी बैठक 8 जनवरी 2026 को हुई थी.
कानून-व्यवस्था राज्य का विषय होने के कारण केंद्र सरकार राज्यों को ऐसे पुलिस स्टेशन बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती. मंत्रालय ने समिति को बताया कि वह समीक्षा बैठकों, क्षेत्रीय सम्मेलनों और मुख्यमंत्रियों के साथ सीधी बातचीत के जरिए राज्यों से इस बारे में चर्चा करता है.
मुआवजा राशि कई साल से नहीं बढ़ी
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अत्याचार के पीड़ितों को मिलने वाली मुआवजा राशि—जो 85,000 रुपये से लेकर 8.25 लाख रुपये तक है, कई साल से नहीं बढ़ाई गई है. विभाग ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर इसे 43 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन अभी खर्च वित्त समिति की मंजूरी बाकी है.
विभाग ने पहली बार राज्यों को विशेष पुलिस स्टेशन बनाने के लिए प्रति स्टेशन 5 लाख रुपये की एकमुश्त सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा है. वहीं विशेष अदालतों के लिए 90.70 लाख रुपये देने का प्रस्ताव है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों बराबर हिस्सा देंगे.
मौजूदा योजना के तहत मिलने वाले फंड का भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया. 2025-26 में विभाग ने 463 करोड़ रुपये के बजट में से सिर्फ 372 करोड़ रुपये ही खर्च किए. यह पैसा पीड़ितों की सहायता, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने, जागरूकता अभियान चलाने और अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन देने के लिए रखा गया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
