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Wednesday, 11 February, 2026
होमदेशवंदे मातरम् के आधिकारिक संस्करण में बदलाव, विपक्ष का सरकार पर ‘इतिहास बदलने का आरोप’

वंदे मातरम् के आधिकारिक संस्करण में बदलाव, विपक्ष का सरकार पर ‘इतिहास बदलने का आरोप’

गृह मंत्रालय के आदेश में कहा गया है कि जब राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों साथ बजेंगे, तो पहले वंदे मातरम् बजेगा और सभी को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा.

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गुरुग्राम: मोदी सरकार द्वारा संविधान सभा से पारित राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के संस्करण में बदलाव करने के फैसले से फिर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है. विपक्ष ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर पश्चिम बंगाल चुनाव को ध्यान में रखकर “इतिहास बदलने” का आरोप लगाया है.

28 जनवरी को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी 10 पन्नों के आदेश में गृह मंत्रालय (एमएचए) ने बंगाली लेखक-कवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखे गीत का “आधिकारिक संस्करण” जारी किया. इस आधिकारिक संस्करण में वे चार अंतरे भी शामिल हैं, जिन्हें कवि ने मूल दो अंतरों के बाद जोड़ा था, लेकिन जिन्हें संविधान सभा द्वारा अपनाए गए गीत में शामिल नहीं किया गया था.

1937 में मुस्लिम लीग की आपत्तियों के बाद कांग्रेस ने आनंदमठ उपन्यास में आए इन हिस्सों को हटा दिया था, क्योंकि उनमें मूर्ति पूजा से जुड़े संदर्भ थे. 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने छोटा किया गया संस्करण अपनाया था, जिसमें दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों के उल्लेख वाले चार अंतरे हटा दिए गए थे.

पिछले साल दिसंबर में राष्ट्रीय गीत की 150वीं वर्षगांठ पर लोकसभा में चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर मोहम्मद अली जिन्ना के दबाव में आने का आरोप लगाया था. उन्होंने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा था कि गीत को छोटा करना “विश्वासघात” था, जिससे विभाजन के बीज पड़े.

तब पूर्व बीजेपी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कहा था कि राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज के बराबर दर्जा मिलना चाहिए. कांग्रेस ने जवाब दिया था कि वंदे मातरम् पर बीजेपी का जोर राजनीतिक है और पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले समर्थन जुटाने की कोशिश है.

गृह मंत्रालय के आदेश में पूरे छह अंतरों वाला संस्करण अनिवार्य किया गया है, जिसकी अवधि 3 मिनट 10 सेकंड है. नए नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय गीत को नागरिक सम्मान समारोहों में, राष्ट्रपति और राज्यपाल के आगमन और प्रस्थान पर, राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद में, तथा राष्ट्रीय ध्वज परेड के समय बजाना होगा.

आदेश में कहा गया है कि जब राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों साथ बजें, तो पहले वंदे मातरम् बजेगा और सभी को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा.

सिनेमा हॉल को इन नए नियमों से छूट दी गई है. आदेश में साफ किया गया है कि फिल्मों से पहले थिएटर में वंदे मातरम् दिखाना अनिवार्य नहीं है. इससे 2016 में राष्ट्रगान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों जैसी स्थिति दोबारा नहीं बनेगी.

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राज्यसभा सांसद डोला सेन ने बीजेपी पर पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले इतिहास बदलने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि बीजेपी का स्वतंत्रता आंदोलन से कोई जुड़ाव नहीं रहा और यह मुद्दा सिर्फ चुनावी लाभ के लिए उठाया जा रहा है.

उन्होंने कहा, “इनका आज़ादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं रहा. यह सब बंगाल चुनाव को देखते हुए किया जा रहा है. पहले दो अंतरे रवींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर अपनाए गए थे और गाए गए थे. मोदी और शाह कौन होते हैं टैगोर के फैसले को बदलने वाले? बंगाल की जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी.”

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने भी इस विवाद को आने वाले चुनाव से जोड़ा और कहा कि यह कदम राजनीतिक है.

उन्होंने कहा, “यह बंगाल विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया है. जब कांग्रेस ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन का नारा बनाया था, तब ये लोग ब्रिटिश सेना में शामिल होने के लिए चिट्ठियां लिख रहे थे.”

नए आदेश में क्या है

गृह मंत्रालय के आदेश में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के पूरे बोल संस्कृत और हिंदी लिप्यंतरण में दिए गए हैं. जिन अंतरों पर विवाद रहा है, उनमें ‘त्वम् हि दुर्गा दश-प्रहरण-धारिणी (आप ही दस हथियार धारण करने वाली दुर्गा हैं)’ जैसे वाक्य और अन्य हिंदू देवियों का उल्लेख है.

आदेश के अनुसार, स्कूलों में दिन की शुरुआत राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन से की जा सकती है. साथ ही, राष्ट्रीय गीत को लोकप्रिय बनाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए, जैसे राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के साथ किया जाता है.

निर्देश में साफ किया गया है कि जब राष्ट्रीय गीत समाचार फिल्म या डॉक्यूमेंट्री में दिखाया जाए, तो दर्शकों से खड़े होने की उम्मीद नहीं की जाएगी, क्योंकि इससे फिल्म में रुकावट और अव्यवस्था हो सकती है, लेकिन औपचारिक कार्यक्रमों में सावधान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य होगा.

आदेश में परेड के अलावा अन्य समारोहों में राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन की अनुमति दी गई है. ज़रूरत होने पर गीत के छपे हुए बोल बांटे जा सकते हैं. जिन कार्यक्रमों में मंत्री या अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद हों, वहां सामूहिक रूप से गीत गाना उचित बताया गया है.

ये दिशा-निर्देश निजी कार्यक्रमों या गैर-सरकारी आयोजनों पर लागू नहीं होंगे. अनिवार्य नियम केवल सरकारी कार्यक्रमों, सरकारी स्कूलों और संवैधानिक पदाधिकारियों की मौजूदगी वाले औपचारिक आयोजनों पर ही लागू होंगे.

सौरव रॉय बर्मन के इनपुट्स के साथ.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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