Monday, 27 June, 2022
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BJP की बढ़ती धमक पर नवीन पटनायक का जवाब है ओडिशा में मंदिरों का हो रहा रेनोवेशन

ओडिशा में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजू जनता दल सरकार ने समूचे राज्य में मंदिर परिसरों और उनकी परिधि वाले स्थानों के पुनर्विकास की विस्तृत योजना बनाई है.

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भुवनेश्वर: भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर की पत्थरों वाली पेंचीदा वास्तुकला रात में बारिश की बौछार में भींगने के बाद चमकती नजर आ रही है. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर 11वीं शताब्दी ई. में बनकर तैयार हुआ था, लेकिन फ़िलहाल यह बिल्कुल नया दिखता है. पर्याप्त स्थान वाले आधुनिक रास्ते इस मध्यकालीन संरचना के चारों ओर फैले हुए हैं.

मंदिर के इस समकालीन दिखने वाले रूप में से अधिकांश भाग के निर्माण का श्रेय 2019-20 में किए गए नवीनीकरण को दिया जाता है. लगभग 700 करोड़ रुपये की लागत से इस मंदिर का जीर्णोद्धार एकमरा योजना के तहत किया गया था, जो ‘टेम्पल सिटी’ की विरासत और सांस्कृतिक मूल्य को स्वीकृति प्रदान करने और इस पुनर्जीवित करने की दिशा में एक एकीकृत दृष्टिकोण को दर्शाता है.

ओडिशा में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजू जनता दल सरकार ने समूचे राज्य में मंदिर परिसरों और उनकी परिधि वाले स्थानों के पुनर्विकास की विस्तृत योजना बनाई है. यह एक ऐसा अभियान है जिसे कई लोग ‘मंदिर की राजनीति’ के मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इसी तरह के हथकंडे की हवा निकालने का प्रयास बताते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि इन पुनर्निर्माणों में से अधिकांश का उद्देश्य बेहतर शासन तथा और अधिक पर्यटकों को आकर्षित करना है, लेकिन उनके राजनीतिक रंगत को भी नकारा नहीं जा सकता है.

इनमें से कुछ मंदिरों की सूची, जिनका जीर्णोद्धार या तो हो चुका है फिर फिलहाल चल रहा है, में संबलपुर में सामलेश्वरी मंदिर, बारीप्रदा मंदिर, घाटगांव में मां तारिणी मंदिर, कोणार्क स्थित विरासत गलियारा (हेरिटेज कॉरिडोर), भद्रक में मां भद्रकाली मंदिर, अरडी में अखंडलमणि मंदिर, गंजम में तारा तारिणी मंदिर, क्योंझर में बलदेवजेव मंदिर, पुरी में जगन्नाथ मंदिर और कोरापुट में श्री गुप्तेश्वर मंदिर, के नाम शामिल हैं.

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मंदिरों के जीर्णोद्धार की लागत

इन बहुत सारी परियोजनाओं के बीच सबसे अधिक चर्चा में रहने वाली और सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना पुरी में जगन्नाथ मंदिर की परिक्रमा का पुनर्विकास है. इसके तहत मंदिर की दो किलोमीटर लंबी परिधि के आसपास एक 75 मीटर चौड़ा गलियारा – जिसमे एक घंटाघर, सूचना कियोस्क, सार्वजनिक शौचालय और एक बगीचे वाला क्षेत्र भी शामिल है – 800 करोड़ रुपये की लागत से बनाया जा रहा है.

ओडिशा के लोक निर्माण विभाग (पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट – पीडब्ल्यूडी) के अधिकारियों का कहना है कि लिंगराज मंदिर के नवीनीकरण में मंदिर वास्तुकला की कलिंग शैली के अनुरूप किया जा रहा मंदिर परिसर का विस्तार भी शामिल है.

अन्य मंदिरों में भी अपनी-अपनी तरह से सुधार के कार्य (अपग्रेड) किये जा रहे हैं, लेकिन इनमे से ज्यादातर में यह कार्य उनकी परिधि तक ही सीमित हैं. उदाहरण के लिए, संबलपुर में समलेश्वरी मंदिर को 15 करोड़ रुपये की लागत से, कोणार्क हेरिटेज कॉरिडोर को 375 करोड़ रुपये, अखंडलमणि मंदिर को 6 करोड़ रुपये और तारा तारिणी मंदिर को 15 करोड़ रुपये की लागत से पुनर्निर्मित किया जा रहा है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ओडिशा में मंदिरों के पुनर्विकास पर लगने वाली कुल लागत लगभग 2,000 करोड़ रुपये है.

दिप्रिंट के साथ बात करते हुए, ओडिशा पीडब्ल्यूडी के सचिव डॉ कृष्ण कुमार, जो इन सभी मंदिरों के जीर्णोद्धार कार्य के प्रभारी हैं, ने कहा कि ये सभी पुनर्विकास परियोजनाएं अलग-अलग नहीं बल्कि बड़ी परियोजनाओं के हिस्से के रूप में की जा रही हैं.

उदाहरण के लिए, जगन्नाथ मंदिर का पुनर्विकास पुरी के लिए तैयार की गयी आभादा (ऑग्मेंटेशन ऑफ़ बेसिक एमेनिटीज एंड डेवलपमेंट ऑफ़ हेरिटेज एंड आर्किटेक्चर) योजना के तहत किया गया था, जबकि लिंगराज मंदिर का कार्य भुवनेश्वर के लिए इसी तरह की एकमारा योजना के तहत किया जा रहा है. सैमले (समलेश्वरी टेम्पल एरिया मैनेजमेंट एंड लोकल इकॉनमी इनिशिएटिव) योजना के तहत समलेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है.

कुमार ने बताया कि, ‘इनका उद्देश्य राज्य के शहरों को विकसित करना और पर्यटन को भी प्रोत्साहित करना है.’

‘गलत प्राथमिकताएं’

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजद सरकार – जो पिछले 21 वर्षों से सत्ता में है – भाजपा का मुकाबला करने और ओडिशा में उसके उभार को थामने के लिए ऐसे उपाय कर रही है.

2014 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस राज्य में मुख्य विपक्षी दल थी, जबकि भाजपा को उस समय केवल 10 सीटें मिली थीं. मगर, राजनीतिक हालात तब एकदम से बदल गए जब भाजपा ने 2017 के पंचायत चुनावों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या में सीटें जीतीं. 2012 में जीती गईं 36 सीटों से बढ़कर 2017 में इनकी संख्या 297 हो गई.

2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 2014 की तुलना में अपनी सीटों की संख्या को दोगुना कर दिया और राज्य विधानसभा में 23 सीटें जीत मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता लालतेन्दु महापात्र का कहना है कि भाजपा का इस तरह का उभार चिंता का विषय है और नवीन पटनायक की पार्टी भाजपा को हल्के में नहीं ले सकती.

जानीमानी समाजशास्त्री और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ओडिशा में सहायक प्रोफेसर डॉ रीता रे ने कहा कि पटनायक सरकार की प्राथमिकताएं पूरी तरह से गलत हैं, क्योंकि एक वैश्विक महामारी के बीच मंदिरों पर इतना पैसा खर्च किया जा रहा है. विशेष रूप से तब जब कोरोनावायरस का नया संस्करण फैलता जा रहा है.

उन्होंने इस तथाकथित ‘मंदिर की राजनीति’ के लिए सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारकों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि बीजद 2024 के विधानसभा चुनावों में राज्य में सत्ता वापसी के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है.

वे कहती हैं, ‘नवीन पटनायक केंद्र सरकार द्वारा भारत भर में की जा रही मंदिरों की राजनीति की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां कोई और कुछ नहीं बल्कि सिर्फ मंदिरों के बारे में ही सोचता है. जगन्नाथ मंदिर उड़िया लोगों के लिए एक बहुत बड़ी कमजोरी है, इसलिए मतदाताओं के बीच अपना सिक्का ज़माने का यह एक सुरक्षित और आसान तरीका है.’

रे ने कहा कि राजनीति की यह शैली मध्यम वर्ग के बीच बहुत लोकप्रिय है क्योंकि वे मंदिरों में हो रहे विकास से ही खुश हो गए हैं, और उनके भीतर किसी अन्य चीज पर सवाल उठाने के प्रति बहुत ही संतुष्टता वाला भाव है.

उन्होंने कहा, ‘यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि कोई भी इस सब के बजाय स्कूलों या अस्पतालों के विकास के बारे में बात नहीं कर रहा है. न ही कोई पर्यावरण के लगातार होते क्षरण के बारे में चिंतित है.’

रे ने इस बात का भी उल्लेख किया कि पहले, नवीन पटनायक अपनी जगन्नाथ मंदिर की यात्राओं और दर्शन के बारे में बेहद ‘सीधा-साधा (लो प्रोफाइल)’ रवैया रखते थे. अब ये यात्रायें मीडिया की नज़रों में बहुत अधिक छायी रहतीं हैं.


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‘हम धर्म के साथ राजनीति नहीं करते’

दिप्रिंट से बात करते हुए, बीजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पुरी के सांसद पिनाकी मिश्रा ने कहा कि मंदिरों के पुनर्विकास के पीछे कोई राजनीतिक रंगत होने के बारे में की जा रही टिप्पणियां पूरी तरह से निराधार थी. उन्होंने कहा कि, ‘भाजपा धर्म के साथ राजनीति करती है, हम ऐसा नहीं करते.’

मिश्रा ने कहा, ‘ये सारा विकास कार्य ओडिशा की समग्र संस्कृति के प्रति नवीन पटनायक की अंदरूनी सहज भक्ति की वजह से हो रहे हैं. जगन्नाथ संस्कृति के साथ उनका गहरा संबंध है. उनके लिए यह किसी महान उद्देश्य की पूर्ति की तरह है. हमें (बीजद) राजनीतिक कारणों से यह सब करने की आवश्यकता नहीं है.’

उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर पुनर्विकास में लगा सारा धन, चाहे वह पुरी, कोणार्क में हों या लिंगराज मंदिर में, राज्य के बजटीय संसाधनों से ही आवंटित किए गए हैं.

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों ने यह भी माना कि कई मंदिरों के जीर्णोद्धार की वाकई में आवश्यकता थी और इससे राज्य में पर्यटन को लाभ होगा – जो फ़िलहाल लगभग रुक सा गया था. इन विशेषज्ञों की दलील थी कि ‘मंदिर वाली राजनीति’ से बीजद को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हो सकता है, क्योंकि इस राज्य में 40 प्रतिशत वोट आदिवासी और दलितों से मिलता है, जिन्हें राजनीति का यह ‘ब्रांड’ कुछ खास पसंद नहीं आता.

ओडिशा कांग्रेस के नेता श्रीकांत जेना ने भी कहा कि बीजद के पास भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मॉडल का पालन करने का कोई एजेंडा नहीं है, और वर्तमान प्रशासन केवल पर्यटकों के लिए आकर्षक स्थलों को और अधिक सुंदर बनाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि पुरी और कोणार्क जैसे स्थानों पर बड़ी मात्रा में पर्यटक आते हैं.

जेना ने कहा, ‘यह कोई धार्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इन प्राचीन इमारतों की सुरक्षा का मामला है. मैं राज्य में रत्नागिरी और उदयगिरि जैसे बौद्ध स्मारकों को विकसित करने के लिए नवीन पटनायक को लिखने के बारे में भी सोच रहा हूं, कयोंकि यहां भी कई सारे पर्यटक आते हैं.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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