Sunday, 3 July, 2022
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CBI ऑफिसर के लिए अब ‘पुलिस वाला’ होना जरूरी नहीं: गैर-IPS की भर्ती से ‘लैटरल एंट्री’ पर उठ रहे सवाल

केंद्र अब टेलीकॉम, अकाउंट्स, रेवेन्यू और अन्य सरकारी अधिकारियों को पुलिस अधिकार और पद दे रही है. कुछ आईपीएस अधिकारी इसे सकारात्मक कदम बता रहे हैं तो कुछ अन्य का कहना है कि स्पेसिफिक ट्रेनिंग की कमी है.

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नई दिल्ली: केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में सेवाएं देने वाले किसी पुलिस अधिकारी के लिए अब यह जरूरी नहीं है कि वह बाकायदा प्रशिक्षण लेकर पुलिस अफसर बना हो. दरअसल अब दूरसंचार, लेखा, राजस्व और अन्य सरकारी सेवाओं से जुड़े अधिकारियों को पुलिस अधीक्षक (एसपी) या उप महानिरीक्षक (डीआईजी) का दर्जा मिल सकता है.

कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की तरफ से 30 मार्च को जारी एक आदेश में बताया गया है कि ‘सक्षम प्राधिकारी’—यानी सीबीआई की चयन समिति—ने छह एसपी को सेवा में शामिल करने को मंजूरी दी है, जिनमें से चार भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) से जुड़े नहीं हैं.

इन चार अधिकारियों में दो भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के और एक-एक भारतीय दूरसंचार सेवा (आईटीएस) और भारतीय रक्षा खाता सेवा (आईडीएएस) के हैं.

कुछ वरिष्ठ सीबीआई अधिकारियों के मुताबिक, यह पूरी तौर पर अन्य सरकारी सेवाओं से जांच एजेंसी में ‘लैटरल एंट्री’ की शुरुआत हो सकती है, हालांकि 2014 से गैर-आईपीएस अधिकारियों की भर्ती के कुछ सीमित उदाहरण सामने हैं.

अगर पिछले महीने की गई एसपी की भर्तियों को छोड़ दिया जाए तो भी सीबीआई में पहले से ही सुपरविजन के अधिकारों के साथ करीब आधा दर्जन गैर-आईपीएस अधिकारी हैं.

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नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट से बातचीत में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत केवल एक पुलिस अधिकारी ही जांच कर सकता है, संदिग्धों को गिरफ्तार कर सकता है और बिना लाइसेंस के हथियार ले जा सकता है. सीबीआई तकनीकी तौर पर एक ‘पुलिस स्टेशन’ के तौर पर काम करने के लिए अधिकृत है, क्योंकि यह एक ऐसा संगठन है जहां लोग आपराधिक शिकायतें दर्ज करा सकते हैं.

अब, नीतिगत फैसले के तौर पर सरकार किसी भी सेवा से जुड़े अधिकारी को पुलिस जैसे अधिकार दे सकती है.

इस घटनाक्रम का सेवारत और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारियों, जो सीबीआई में थे या हैं, ने मिली-जुली प्रतिक्रिया के साथ स्वागत किया है. जहां कुछ अधिकारियों ने एजेंसी में विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वालों को शामिल किए जाने का स्वागत किया, वहीं अन्य ने पुलिस अफसरों के प्रशिक्षण की अहमियत पर जोर दिया.

दिप्रिंट ने लैटरल एंट्री पर डीओपीटी और सीबीआई की आधिकारिक प्रतिक्रिया के लिए विस्तार से अपने सवाल टेक्स्ट और ईमेल किए हैं. इसका जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.


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‘खास महारत’ के लिए 2014 से ही हो रही गैर-आईपीएस की भर्ती

2012 से ही सीबीआई पोस्टिंग ऑर्डर (जो डीओपीटी की तरफ से जारी किए गए हैं) देखने पर पता चलता कि जांच एजेंसी में गैर-आईपीएस अफसरों को शामिल करने का ट्रेंड 2014 में ही शुरू हो गया था.

उसी साल मई में सरकार ने संजीव गौतम नामक एक आईआरएस अधिकारी को डीआईजी पद पर तैनात किया था. दो साल बाद, सितंबर 2016 में आयकर विभाग के एक अन्य आईआरएस अधिकारी सुधांशु धर मिश्रा को सीबीआई में प्रतिनियुक्ति पर एसपी के तौर पर शामिल किया गया. 2017 में गौतम का कार्यकाल बढ़ाया गया और 2021 में मिश्रा के सेवा विस्तार को मंजूरी दी गई.

2019 में तीन और आईआरएस अधिकारियों को सीबीआई में बतौर एसपी शामिल किया गया, और इसके बाद 2021 में उसी रैंक पर भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा (आईए-एंड-एएस) के एक अधिकारी को नियुक्त किया गया.

सीबीआई के एक सेवारत वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, ‘सीबीआई अब कई वित्तीय और बैंक धोखाधड़ी से जुड़े मामलों और बड़े घोटालों की जांच कर रही है, जिसके लिए हमें खास महारत की जरूरत होती है. इसलिए, हम अन्य विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े सक्षम अधिकारियों को ला रहे हैं और जरूरत के मुताबिक उनकी तैनाती कर रहे हैं.’

उन्होंने कहा, ‘यह सरकार का नीतिगत फैसला है. इन अधिकारियों की नियुक्ति के बाद उन्हें पुलिस शक्तियों से अधिकृत किया जाता है.’


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CBI में लैटरल एंट्री पर बंटे पुलिस अफसर

जहां कुछ आईपीएस अधिकारी इस बात से हैरत में हैं कि तकनीकी तौर पर पुलिस स्टेशन का दर्जा रखने वाली सीबीआई अब अन्य सेवाओं से जुड़े अधिकारियों को पुलिस शक्तियां दे रही है, वहीं अन्य का मानना है कि लैटरल एंट्री से संस्था को फायदा हो सकता है.

अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) रैंक के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने कहा, ‘सीबीआई एक विविधतापूर्ण संगठन है. और इसके कामकाज और जांच के तौर-तरीकों को विकसित किया जा रहा है.’

कई सालों तक सीबीआई में अपनी सेवाएं दे चुके इस अधिकारी ने कहा, ‘यह बात तो सच है कि अन्य तमाम सेवाओं से आने वाले अधिकारियों को पुलिस प्रशिक्षण हासिल नहीं होता है, लेकिन सीबीआई में ऐसी कई इकाइयां हैं जिनमें उन्हें हथियार लेकर चलने की जरूरत नहीं पड़ती है.’

अधिकारी ने कहा कि आम तौर पर भर्तियों में अधिक लचीलापन आया है. राज्य सरकारें अब आईएएस कैडर के पदों पर आईपीएस अधिकारियों की भर्ती कर रही हैं.

भारतीय पुलिस फाउंडेशन (आईपीएफ) के अध्यक्ष और असम और मेघालय के पूर्व डीजीपी एन. रामचंद्रन इस विचार से सहमत हैं कि विविध पृष्ठभूमि वाले अधिकारियों की भर्ती से सीबीआई को फायदा हो सकता है.

उन्होंने कहा, ‘जांच की प्रकृति बहु-विषयक बन गई है. कई क्षेत्रों में विशेषज्ञों की बहुत जरूरत महसूस होती है. इसलिए, यह घटनाक्रम एक अच्छा संकेत है.’ साथ ही जोड़ा कि इस तरह की नियुक्तियां ‘आनुपातिक’ होनी चाहिए ताकि ‘आईपीएस अधिकारियों के लिए अवसर न घटें.’

हालांकि, एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी, जो सीबीआई और अन्य केंद्रीय एजेंसियों में काम कर चुके हैं, ने इस पर आपत्ति जताई.

उन्होंने कहा, ‘पुलिसिंग के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण की जरूरत होती है. कोई भी अधिकारी पुलिस अधिकारी कैसे बन सकता है? इसमें बहुत सारे तकनीकी पहलू शामिल होते हैं. आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) और सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) में प्रशिक्षण, चार्जशीट दाखिल करना आदि पुलिस अधिकारियों के लिए खास होता है. किसी लेखा अधिकारी या दूरसंचार अधिकारी को पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात किया जाना सोच से परे और असामान्य है.’

इस अधिकारी ने कहा कि अन्य क्षेत्रों से जुड़े अधिकारियों को सीबीआई में भर्ती के लिए चुनना ‘मनमाना’ तरीका ही लग रहा है.

अधिकारी ने कहा, ‘एक समिति है जो अधिकारियों का चयन करती है, लेकिन हम अभी तक उसके मापदंडों को नहीं जानते. इसलिए, सरकार को लैटरल एंट्री के लिए दिशा-निर्देशों को स्पष्टता के साथ बताना चाहिए.’


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अंतरराष्ट्रीय उदाहरण

अन्य देशों में भी पुलिस संगठनों में लैटरल एंट्री का प्रयोग किया गया है. उदाहरण के तौर पर 2014 में ब्रिटेन में पुलिस विभाग में अन्य पृष्ठभूमि के लोगों के लिए ‘सीधी भर्ती’ की एक योजना शुरू हुई थी.

यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ की एक पीएचडी थीसिस, जिसमें पुलिस में वरिष्ठ नेतृत्व वाली भूमिकाओं के लिए सीधी भर्ती पर गहन विश्लेषण किया गया था, के मुताबिक यह कदम इंग्लैंड और वेल्स में ‘पुलिसिंग के लिए ऐतिहासिक’ रहा क्योंकि इसने ‘चीफ ऑफिसर रैंक में विविधतापूर्ण नजरिये की कमी, सांस्कृतिक बाधाओं और बीएमई (अश्वेत और अल्पसंख्यक जातीय) समुदायों को कम प्रतिनिधित्व’ जैसी समस्याओं के समाधान का अवसर मुहैया कराया.

हालांकि, अध्ययन ने यह चेतावनी भी दी कि ‘यह जरूरी नहीं माना जाना चाहिए कि अधीक्षक रैंक में सीधे प्रवेश चीफ ऑफिसर रैंक में विविधता बढ़ाने का एक सुगम तरीका है.’ इसके अलावा, यह भी अभी तक अप्रमाणित है कि ‘सीधी भर्ती वाले इन अधिकारियों में सेवा के उच्चतम स्तर तक पदोन्नति पाने की क्षमता होती है.’

पुलिस भर्ती पर एक सवाल के संदर्भ में जुलाई 2019 में ब्रिटेन की संसद में पेश एक लिखित उत्तर में बताया गया था कि 2016 में 17 लोग, 2017 में 21 लोग और 2018 में 17 लोग ‘बतौर इंस्पेक्टर सीधी भर्ती’ से आए. हालांकि, इस योजना के तहत कथित तौर पर ‘सीमित भर्ती’ ही की गई और कॉलेज ऑफ पुलिसिंग—जो इंग्लैंड और वेल्स में पुलिस के लिए पेशेवर निकाय है—ने 2019 में इसे रोक दिया.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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