Monday, 17 January, 2022
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एनडी तिवारी: जिनकी याददाश्त और समझ से अधिकारी भी ख़ौफ़ खाते थे

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कद्दावर नेता की छवि वाले नारायण दत्त तिवारी अकेले हैं जिनके नाम दो राज्यों के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड है.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी का निधन हुआ तो कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर पेज पर लिखा गया कि ‘यह एक युग का अंत है.’ यह भारतीय राजनीति के लिए तो सही ही है, कांग्रेस के लिए भी सही है कि नारायण दत्त तिवारी का अंत ‘एक युग का अंत है.’

तिवारी कांग्रेस के उस दौर के नेता रहे हैं जब कांग्रेस ज़मीन पर बहुत मज़बूत हुआ करती थी. तब कांग्रेस पार्टी में क्षेत्रीय स्तर पर ऐसे नेताओं की फौज थी जो न सिर्फ बेहद लोकप्रिय होते थे, बल्कि जिनका जनता से सीधा संपर्क होता था. आज ज़्यादातर राज्यों में कांग्रेस का अवसान इसी वजह से है कि कांग्रेस के पास ज़मीनी और लोकप्रिय नेता नहीं हैं.

नारायण दत्त तिवारी को नई पीढ़ी रोहित शेखर और उनके बीच चली लंबी लड़ाई के लिए जानती है जिसमें अंतत: तिवारी की हार हुई और उन्होंने शेखर की मां उज्ज्वला शर्मा से शादी भी की और रोहित शेखर को अपना बेटा माना. इसके बाद चुनाव के ठीक पहले अपने सियासी सिद्धांतों में फेरबदल करते हुए जीवन भर के कांग्रेसी तिवारी बेटे रोहित शेखर के साथ भाजपा में शामिल हो गए. हालांकि, उम्र के आखिरी पड़ाव पर इस फेरबदल का कोई अर्थ नहीं रहा. यह पालाबदल उनकी शादी और रोहित शेखर का पिता बनने जैसा ही मज़ाक बनकर रह गया.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से निकले नेता

नारायण दत्त तिवारी के निधन के बाद उनके व्यक्तित्व और कार्यकाल को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी ने बताया, ‘तिवारी जी समाजवादी थे. अभी इलाहाबाद काफी चर्चा में है. तिवारी वहां से पढ़े हुए थे. भारतीय राजनीति में इलाहाबाद से तमाम बड़े लोगों का रिश्ता रहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़कर जो बड़े नेता निकले, एनडी तिवारी उनमें से एक थे. तिवारी की याददाश्त बेहद फोटोग्राफिक थी. उन्हें तमाम आंकड़े ज़बानी याद रहते थे. गीता, रामायण, वेद, कुरान तमाम ग्रंथों के संदर्भ और श्लोक ज़बानी याद रहते थे. तमाम प्रसंग और घटनाएं उन्हें विस्तार से याद रहते थे.’

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उन्होंने बताया, ‘उस समय यह बात खूब चर्चा में होती थी कि बजट आदि के समय या सामान्य तौर पर अफसर अपनी फाइल उनके सामने ले जाते हुए डरते थे क्योंकि वे गड़बड़ियां पकड़ लेते थे. अर्थशास्त्र और राजनीति की उनकी बहुत शानदार समझ थी. उनकी पूरी ट्रेनिंग सोशलिस्ट थी. उत्तराखंड के ब्राह्मण थे तो संस्कृत भी आती थी और शास्त्रीय ज्ञान भी अच्छा था. अकादमिक रूप से वे बहुत प्रतिभाशाली थे. योजना के स्तर पर भी उनके पास दृष्टि थी. उत्तर प्रदेश के विकास के लिए उन्होंने काफी कुछ किया. मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने काफी अच्छा काम किया.’

दो प्रदेशों के मुख्यमंत्री

मशहूर ब्रिटिश अर्थशास्त्री हैरॉल्ड जोसेफ लास्की के सिद्धांतों से प्रभावित तिवारी जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय तक कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में रहे और उन्हें नेहरू, इंदिरा दोनों का विश्वास हासिल था. उन्होंने लास्की के सिद्धांतों और नेहरू के समाजवाद में समन्वय बनाने की कोशिश की. आज की राजनीति में जिस विकास की ज़ोर शोर से चर्चा होती है, नारायण दत्त तिवारी वह बहुत पहले करके दिखा चुके थे.

तिवारी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने. भारतीय राजनीति में यह रिकॉर्ड उन्हीं के नाम है जो शायद ही कभी टूटे. जिस दिन उनका जन्मदिन पड़ता है, उसी दिन उन्होंने अंतिम सांस ली. नारायण दत्त तिवारी आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश में 1952 में हुए पहले ही चुनाव में नैनीताल से प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर पहली बार विधायक बनकर विधानसभा में पहुंचे थे.

1957 में वे नैनीताल सीट से चुनाव जीते और विधानसभा में विपक्ष के नेता बने. 1963 में तिवारी ने कांग्रेस ज्वाइन की और 1965 में काशीपुर से चुनाव जीतकर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बने. वे चौधरी चरण सिंह सरकार में वित्त मंत्री और संसदीय कार्यमंत्री भी रहे.

नेहरू और इंदिरा के करीबी

नेहरू के करीबी रहे तिवारी ने 1968 में जवाहरलाल नेहरू युवाकेंद्र की स्थापना की जो कि एक स्वयंसेवी संगठन था. वे इंडियन यूथ के कांग्रेस के पहले पहले अध्यक्ष भी बने.

इसके बाद वे तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. जनवरी 1976 से अप्रैल 1977, अगस्त 1984 से सितंबर 1985 और जून 1988 से दिसंबर 1988 तक. इसके बाद जब उत्तराखंड अलग राज्य बना तो वे एक बार इस राज्य के भी मुख्यमंत्री रहे.

वे अभी तक उत्तराखंड के इकलौते मुख्‍यमंत्री थे जिन्‍होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था. इसके अलावा उन्‍होंने राज्‍यपाल का पद भी संभाला. वे केंद्र में राजीव गांधी कैबिनेट में वित्त व विदेश मंत्री भी रहे. वे 1980 में 7वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और 1985-1988 तक वह राज्यसभा के सदस्य भी रहे.

राव ने तिवारी को खत्म कर दिया

राजनीति में दांवपेंच और उठापटक पार्टी के भीतर भी चलते हैं. नारायण दत्त तिवारी भी इससे अछूते नहीं थे. उनकी प्रधानमंत्री पद की मज़बूत दावेदारी को नरसिम्हा राव ने मात दे दी.

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी कहते हैं, ‘उन्होंने कांग्रेस से एक बार विद्रोह भी किया जिससे पार्टी में तमाम दमखम पैदा हुआ. लेकिन उनमें जननेता की छवि वैसी नहीं रही. जो थोड़ा बहुत वे उभर रहे थे, उसे नरसिम्हा राव ने खत्म कर दिया. नरसिम्हा राव ने जगन्नाथ मिश्र और एनडी तिवारी की राजनीति को बहुत नुकसान पहुंचाया. लेकिन इस तरह से कांग्रेस पार्टी खुद डैमेज हुई. कांग्रेस पार्टी को खत्म करने में राव ने तिवारी को खत्म करके एक अहम भूमिका निभाई.’

जब राजीव गांधी पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगा तो प्रधानमंत्री पद के लिए नरसिम्हा राव और एनडी तिवारी के नामों की चर्चा हुई. हालांकि, राजीव नहीं हटे. जब राजीव गांधी की हत्या हुई, उस समय कांग्रेस में दो बड़े नेता थे— नारायण दत्त तिवारी और नरसिम्हा राव. तिवारी की जगह राव कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए थे, लेकिन स्थिति यह ​थी कि अगर कांग्रेस को चुनावों में जीत हासिल होती है तो एनडी तिवारी ही प्रधानमंत्री बनेंगे. लेकिन तिवारी महज 800 वोटों से लोकसभा का चुनाव हार गए और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बन गए.

सत्ता के लिए नतमस्तक हुए

उनपर आपातकाल के समय झुकने का भी आरोप लगता है. वे उन नेताओं में शामिल थे जो सही गलत पर स्टैंड लेने की जगह आलाकमान के आदेश का अनुपालन करना बेहतर समझते थे. एक मिसाल है अयोध्या का राम मंदिर का मामला. 1989 में जब तिवारी यूपी के मुख्यमंत्री थे, अयोध्या में राम मंदिर का शिला पूजन हुआ. नारायण दत्त तिवारी ने खुद इसके खिलाफ होते हुए राजीव गांधी के दबाव में शिला पूजन होने दिया. इस दबाव को बाद में उन्होंने स्वीकार भी किया था.

अरुण त्रिपाठी कहते हैं, ‘आपातकाल के समय दंडवत हो जाने की उनकी कमज़ोरी भी सामने आई. अपनी सत्ता के लिए बार बार नतमस्तक हुए. लेकिन हो सकता है कि उन्होंने अपनी राजनीति को सुरक्षित रखने के लिए तमाम तरह के समझौते किए हों.’

तिवारी पहाड़ से आने वाले बड़े नेताओं में थे, जहां उनकी खासी लोकप्रियता थी. तिवारी अपने दौर के बड़े नेताओं में थे. वे राजीव गांधी के समय, वीपी सिंह, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडिस और लालकृष्ण आडवाणी के कद के नेता माने जाते थे.

नोएडा की स्थापना

वरिष्ठ पत्रकार अजय ​सिंह लिखते हैं, ‘आज चंद्रबाबू नायडू, नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार खुद को विकासवादी नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं. मगर वर्षों पहले नारायण दत्त तिवारी ने विकास पुरुष के तौर पर अपनी छवि बनायी थी और शोहरत हासिल की थी. यानी वो वास्तविक ‘विकासवादी नेता’ हैं, जिन्होंने यूपी के विकास को नई दशा-दिशा दी.’

अरुण त्रिपाठी ने बताया, ‘तिवारी काफी प्रतिभाशाली और विजन रखने वाले नेता थे. न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवेलपमेंट अथॉरिटी यानी नोएडा का गठन भी उन्होंने ही किया था. संजय गांधी के कहने पर उन्होंने दिल्ली से सटे इलाकों में ज़मीन एकत्र की और एक औद्योगिक नगर बसाया. यह उत्तर प्रदेश का सबसे ज़्यादा राजस्व देने वाला और सबसे औद्योगिक इलाका है. जब नोएडा के गठन के 25 साल हुए तो हमने उनका इंटरव्यू किया था, वे काफी दुखी थे कि हमने नोएडा का गठन किया था. आज वहां हमारे ही बनाए लोग हैं लेकिन हमें पूछ भी नहीं रहे.’

उनके बारे में कहा जाता है कि वे सबसे बहुत अच्छे रिश्ते रखते थे. नेता के रूप में वे बहुत प्रतिभासंपन्न और तेज़ आदमी थे, इस बात को तमाम नेता, अधिकारी और पत्रकार सब मानते हैं. वे बहुत मृदुभाषी और सरल थे. उनकी यह कार्यशैली और स्वभाव हर किसी को पसंद आता था. अरुण त्रिपाठी ने बताया, ‘मनमोहन सिंह उनकी बहुत इज़्ज़त करते थे. प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह उनको सर कहते थे. हालांकि, नारायणदत्त तिवारी ने उनको मना किया कि आप प्रधानमंत्री हैं, हमें सर न कहें और मनमोहन ने इस मजबूरी को समझा भी.’

चरित्र पर लांछन

तिवारी की उम्र के आखिरी पड़ाव में उन्हें चारित्रिक लांछन का सामना करना पड़ा. तमाम महिलाओं के साथ उनके संबंधों को लेकर उनकी बहुत बदनामी हुई. जब वे आंध्र प्रदेश के राज्यपाल थे, उस दौरान एक चैनल के एक वीडियो प्रसारित किया जिसमें तिवारी तीन महिलाओं के साथ थे. इस स्कैंडल के सामने आने के बाद उनको पद से इस्तीफा देना पड़ा.

इसके बाद 2008 में रोहित शेखर ने मुकदमा दायर किया कि वे नारायण दत्त तिवारी के बेटे हैं. तिवारी इस बात को खारिज करते रहे लेकिन बाद में डीएनए जांच में यह बात सही पाई गई. 2014 में तिवारी ने 89 वर्ष की आयु में रोहित शेखर की मां उज्जवला से शादी कर ली.

बेटे के रूप में रोहित शेखर को स्वीकार करने के बाद उनके साथ नारायण दत्त तिवारी की फाइल फ़ोटो, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में। गेट्टी

अरुण कुमार त्रिपाठी कहते हैं, ‘आखिरी दिनों में उनकी योग्यता को कुछ तो उनके चरित्र ने भी हानि पहुंचाई और देश की राजनीति भी बदल गई. वे धीरे धीरे हाशिए पर चले गए. उनकी कमज़ोरियों की वजह से उन्होंने अपनी राजनीतिक सत्ता भी खोई, कलंक भी लगा. लेकिन कांग्रेस में सोशलिस्ट नीतियों के निर्माण में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. उन्हें उनके अच्छे राजनीतिक जीवन, समाजवादी नीतियों, सरल और मृदुभार्षी स्वभाव के लिए उन्हें याद किया जाना चाहिए.’

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