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Tuesday, 27 January, 2026
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देशभर में मध्यस्थता अभियान 2.0: समझौते की संभावना वाले 2.33 करोड़ मामलों की छंटनी करेगा SC पैनल

मामलों का बोझ कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता समिति ने दूसरा देशव्यापी अभियान शुरू किया है, ताकि समझौते से निपटाए जा सकने वाले मामलों की पहचान कर उन्हें भेजा जा सके. इसमें कानून के प्रोफेसरों और सेवानिवृत्त जजों की मदद भी ली जा सकती है.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की मेडिएशन एंड कंसिलिएशन प्रोजेक्ट कमेटी (एमसीपीसी) ने ‘मेडिएशन फॉर नेशन ड्राइव’ का दूसरा चरण शुरू किया है. इसके तहत जिन मामलों में समझौते की संभावना है, उन्हें आपसी सहमति से समाधान के लिए मध्यस्थों के पास भेजा जाएगा.

यह जुलाई से सितंबर 2025 के बीच चले पहले चरण के बाद की कड़ी है, जिसमें मध्यस्थता के लिए भेजे गए पांच लाख मामलों में से एक लाख मामलों का समाधान हुआ था. यह विवाद समाधान के वैकल्पिक तरीके के रूप में मध्यस्थता को लोकप्रिय बनाने का पहला ऐसा अभियान था. यह अभियान उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की निगरानी में चला था, जब वे राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के प्रमुख थे.

ये पांच लाख मामले उन 1.68 करोड़ मामलों में से चुने गए थे, जिनमें समझौते की संभावना थी.

तीन महीने के इस अभियान में सुलझाए गए एक लाख मामलों में सबसे ज्यादा संख्या वैवाहिक मामलों की थी, जिनमें तलाक और बच्चों की कस्टडी से जुड़े विवाद शामिल थे.

दूसरे चरण के लिए एमसीपीसी को सभी हाईकोर्ट और जिला अदालतों में लंबित ऐसे 2.33 करोड़ से ज्यादा मामलों का डेटा मिला है, जिनमें मध्यस्थता की संभावना है.

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ, जो अब NALSA और एमसीपीसी दोनों के अध्यक्ष हैं, उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में मध्यस्थता संभालने वाले हाईकोर्ट जजों के साथ विस्तार से चर्चा की और उनसे मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा.

दिप्रिंट को पता चला है कि हाईकोर्ट जजों से कहा गया है कि वे 2.33 करोड़ मामलों में से समझौते की संभावना वाले मामलों को चुनने के लिए कानून के प्रोफेसरों या सेवानिवृत्त जजों की मदद लें.

खास बात यह है कि जस्टिस नाथ ने हाईकोर्ट जजों से यह भी कहा कि वे मेडिएशन एंड कंसिलिएशन रूल्स के नियम 3 का इस्तेमाल करें, ताकि सेवानिवृत्त जजों और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों को मध्यस्थ नियुक्त किया जा सके और इस अभियान के दौरान उन्हें मामले सौंपे जा सकें. यह सुझाव इसलिए दिया गया है, क्योंकि मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित मध्यस्थ उपलब्ध नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट के एक अधिकारी ने द प्रिंट को बताया, “प्रशिक्षित मध्यस्थ बनने के लिए एमसीपीसी के ट्रेनिंग प्रोग्राम से गुज़रना पड़ता है, लेकिन चूंकि मध्यस्थता अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए हमारे पास पर्याप्त अनुभवी प्रशिक्षित मध्यस्थ नहीं हैं. इसी वजह से हाईकोर्ट जजों से कहा गया है कि वे बीमा क्षेत्र में काम कर चुके विशेषज्ञों या सेवा कानून का ज्ञान रखने वाले पूर्व नौकरशाहों की सेवाएं लेने की संभावना तलाशें.”

अधिकारी के मुताबिक, मामलों की पहचान की प्रक्रिया 15 फरवरी तक पूरी करनी होगी और इसके साथ ही मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजना भी शुरू करना होगा.

चूंकि यह 90 दिनों का अभियान है, इसलिए हर हाईकोर्ट को एक महीने के बाद सुलझाए गए मामलों का श्रेणीवार डेटा एमसीपीसी को भेजना होगा. एमसीपीसी आंकड़ों का विश्लेषण करेगा और “बीच में सुधार” की प्रक्रिया अपनाएगा. अंतिम डेटा मिलने के बाद केंद्र सरकार मध्यस्थता को लोकप्रिय बनाने की रणनीति पर काम करेगी.

जस्टिस नाथ ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर पक्षकार आपसी सहमति से मामला नहीं सुलझा पाते हैं, तब भी मध्यस्थों को मानदेय दिया जाना चाहिए.

जिन 2.33 करोड़ मामलों को संभावित रूप से सुलझाए जाने योग्य माना गया है, उनमें से 80 लाख से ज्यादा मामले चेक बाउंस से जुड़े हैं. 20 लाख से ज्यादा वैवाहिक मामले हैं, जबकि मोटर दुर्घटना दावा मामलों की संख्या 12.71 लाख से थोड़ी ज्यादा है.

इसके अलावा 50 लाख से ज्यादा आपराधिक मामलों, जिन्हें आपसी समझौते से निपटाया जा सकता है, और 48 लाख दीवानी मामले भी इन 2.33 करोड़ मामलों में शामिल हैं, जिनमें समझौते की संभावना है.

इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण के मामले, बंटवारे के मुकदमे, जिनमें ज्यादातर पारिवारिक विवाद होते हैं—बेदखली के मामले, व्यावसायिक विवाद और सेवा से जुड़े मामले भी शामिल हैं, जिन्हें मध्यस्थता के लिए भेजे जाने की संभावना है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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