Thursday, 26 May, 2022
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शराब और सिगरेट्स ज़्यादा, खेल कम- सरकार ने क्यों किया दिल्ली जिमखाना पर क़ब्ज़ा

एनसीएलटी ने सरकार के कई आरोपों के बाद, पिछले साल दिल्ली जिमखाना क्लब की आम समिति को भंग कर दिया था. एनसीएलएटी ने उस फैसले को बरक़रार रखा है और सरकार ने एक प्रशासक नियुक्त कर दिया है.

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नई दिल्ली: दिल्ली जिमखाना क्लब की देखरेख के लिए सोमवार को नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से प्रशासक की नियुक्ति, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के शब्दों में, पॉश क्लब को ‘शाही मानसिकता’ से बाहर लाने की ओर एक ताज़ा क़दम है.

कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय में ओएसडी मनमोहन जुनेजा की नियुक्ति तब हुई जब राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने क्लब की आम समिति को भंग करने के जून 2020 के एनसीएलटी  फैसले को बरक़रार रखते हुए, सरकार को क्लब को अपने हाथ में लेने की अनुमति दे दी.

दिल्ली जिमखाना क्लब लुटियंस की दिल्ली में, सफदरजंग मार्ग पर 27 एकड़ में फैला है और प्रधानमंत्री आवास से सटा हुआ है, जहां ये 108 साल पहले आया था. शुरू में इसे इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब कहा जाता था लेकिन आज़ादी के बाद इसके नाम से, ‘इंपीरियल’ शब्द हटा दिया गया. पिछले साल एनसीएलटी ने कहा था कि क्लब की ‘मानसिकता’ अभी भी ‘इंपीरियल’ ही बनी हुई है और उसने निर्माण प्रोजेक्ट्स में भ्रष्टाचार, बिना बारी के सदस्यता, बेतहाशा फीस और पक्षपात के आरोपों को सही ठहराया.

क्लब के सदस्यों में राहुल गांधी, समृति ईरानी और सुरेश प्रभु जैसे शीर्ष राजनेता, सिविल सर्वेंट्स, सशस्त्र बलों के अधिकारी और उद्योगपति शामिल हैं, जिससे इस क्लब की अभिजात वर्ग की एक ख़ास जमात की छवि बनती है.

कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की ओर से शुरू किए गए इस केस में जून 2020 में एनसीएलटी ने कहा, ‘क्लब के विशिष्ट चरित्र की आड़ में जो एक शाही अतीत का अवशेष है, सदस्यता के दरवाज़े केवल उन लोगों के लिए खुले हैं जो कुलीन वर्ग से हैं और इस तरह नस्लभेद को अंजाम दिया जाता है और हमारे संविधान में अभिकल्पित सामाजिक न्याय एवं अवसरों की, समानता के लक्ष्यों को क्षति पहुंचाई जाती है’.

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शराब और सिगरेट्स

क़रीब चार साल पहले, क्लब के सात सदस्यों ने जिनमें क्लब की आम समिति के एक पूर्व अध्यक्ष भी शामिल थे, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें फंड्स के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे. 2017 में इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए मंत्रालय ने जांच कराई जिसमें प्रबंधन की अनियमितताओं और कंपनी एक्ट के उल्लंघन का पता चला.

इस शिकायत के आधार पर अप्रैल 2020 में लॉकडाउन के चरम पर मंत्रालय ने एनसीएलटी में एक याचिका दायर की, जिसमें क्लब पर सरकार के संभावित क़ब्ज़े के लिए इन उल्लंघनों को आधार बताया गया था.

मंत्रालय की याचिका के अनुसार, दिल्ली जिमखाना क्लब को ये ज़मीन खेल गतिविधियों के लिए, कम क़ीमत पर आवंटित की गई थी, लेकिन खेलों पर इसका ख़र्च 2 प्रतिशत से अधिक नहीं था; उसकी बजाय, भूमि आवंटन की शर्तों का उल्लंघन करते हुए 30 प्रतिशत ख़र्च महंगी शराब, पेय पदार्थ और सिगरेट्स परोसने में किया गया.

मंत्रालय ने ये भी आरोप लगाया कि क्लब ने सदस्यता के लिए एक लाख या उससे अधिक रुपए वसूले, जिन पर उसने ब्याज नहीं दिया, हालांकि 20 से 30 साल बाद भी सदस्यता दिए जाने की कोई गारंटी नहीं थी.

उसकी जांच में ये भी पता चला कि क्लब में शामिल होने के लिए सरकारी अधिकारियों द्वारा अदा किया जाने वाला यूटिलिटी चार्ज, 5,000 रुपए से बढ़कर वर्ष 2000 में, 1.5 लाख रुपए हो गया था. ग़ैर-सरकारी उम्मीदवारों के लिए ये चार्ज 5,000 रुपए से बढ़कर 7.5 लाख रुपए हो गया था.

इन आरोपों के आधार पर मंत्रालय चाहता था कि क्लब का प्रबंधन उसके हाथ में आ जाए और क्लब की आम समिति को भंग कर दिया जाए. एनसीएलटी और एनसीएलएटी दोनों सहमत हो गए, लेकिन इसमें एक अंतर था- मंत्रालय चाहता था कि उसके अपने 15 चुने हुए प्रशासक क्लब को चलाएं जबकि फिलहाल उसे एक प्रशासक चलाएगा.

सदस्य हक्का बक्का

दिप्रिंट ने अब भंग हो चुके दिल्ली जिमखाना क्लब जनरल कमेटी के अध्यक्ष ले. जन. डीआर सोनी (रिटा) से, एक टिप्पणी के लिए संपर्क किया, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.

लेकिन, क्लब के एक सदस्य ने जो नाम नहीं बताना चाहते थे, कहा: ‘इस मामले की सुनवाइयां लॉकडाउन के चरम पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए हुईं और हमें जवाब देने के लिए दो दिन का समय दिया गया. हमें कभी समझ नहीं आया कि महामारी के बीच इस मामले पर सरकार जल्दबाज़ी में क्यों है…मीडिया में एक के बाद एक ख़बरें आईं कि कैसे ये क्लब फ़िज़ूलख़र्ची और विशिष्टता का आश्रय बना हुआ है और पैसा बनाने के अलावा यहां और कोई काम नहीं होता’.

मेम्बर ने कहा कि क्लब प्रबंधन इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा, लेकिन उन्होंने आगे की कार्रवाई के बारे में, और कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

इस बीच रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के पूर्व प्रमुख और क्लब के एक सदस्य एएस दुलत ने, इसे एक ‘अफ़सोसनाक दिन’ बताया.

दुलत ने दिप्रिंट से कहा, ‘मैं पिछले 50 साल से इस क्लब का सदस्य रहा हूं और मैं आपसे कह सकता हूं कि ये न केवल देश का सबसे अच्छा क्लब है, बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्लबों में से एक है…इसमें 50 प्रतिशत सदस्यता सरकार के लोगों के लिए है और अगर उससे क्लब विशिष्ट हो जाता है, तो फिर हां, ये विशिष्ट है’.

क्लब को खेल के लिए इस्तेमाल न किए जाने के आरोप को ख़ारिज करते हुए दुलत ने कहा: ‘स्क्वॉश से लेकर टेनिस और स्वीमिंग तक…हमने यहां सब किया है…ये बुनियादी रूप से एक स्पोर्ट्स क्लब है. मेरी मां ने यहीं पर तैरना सीखा था, और वो आगे चलकर एक राष्ट्रीय तैराक बनीं…

‘हां, वहां हम अपने बैण्ड और मनोरंजन का मज़ा लेते हैं लेकिन उससे ये नैतिक रूप से भ्रष्ट जगह नहीं बन जाती. हमें अपने मनोरंजन पर गर्व है’.

दुलत ने ये तो कहा कि सरकार या एनसीएलएटी के फैसले पर सवाल उठाने का कोई अर्थ नहीं है, लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि ये बंदोबस्त अस्थाई है और सरकार जो कुछ ठीक करना चाहती है उसे करने के बाद क्लब जल्द ही फिर से एक जनरल कमेटी के प्रबंध में आ जाएगा.

ऊपर हवाला दिए गए गुमनाम मेम्बर ने पूर्व रॉ प्रमुख से सहमति जताई. मेम्बर ने कहा, ‘क्लब की 80 प्रतिशत से अधिक ज़मीन, केवल खेल के काम में आती है और इसने लगातार कई खेलों में चैंपियंस पैदा किए हैं… भले ही वहां शराब और सिगरेट्स परोसी जाती हों, फिर भी इस आधार पर क्लब को नैतिक रूप से भ्रष्ट अड्डे के तौर पर दर्शाया नहीं जा सकता’.

ऊंची रजिस्ट्रेशन फीस के आरोप के बारे में मेम्बर ने कहा कि पिछले साल ही सभी आवेदकों को सूचित किया गया कि उन्हें 6 लाख रुपए वापस किए जाएंगे और जो लोग सदस्यता की क़तार से हटना चाहते हैं, उन्हें उनका पूरा पैसा लौटाया जाएगा.

मेम्बर ने पूछा, ‘ये पिछले साल फऱवरी में किया गया था. ऐसा कैसे है कि इसका कोई संज्ञान नहीं लिया गया?’

‘अचानक, ऐसा लगता है कि दिल्ली जिमखाना क्लब इस देश में सबसे बड़ा वित्तीय धोखा है और हमें ऐसे ले लिया गया है, जैसे हम कोई दिवालिया कंपनी हों…एक तरफ पूरे देश में निजीकरण की बात हो रही है और यहां, सरकार खेल और आराम के? एक क्लब का शासन चलाना चाहती है?’

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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