Wednesday, 5 October, 2022
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200 मिलियन गैलन ‘मैले’ से रोज़ मैली हो रही है यमुना, दिल्ली सरकार रही हल खोजने में ‘नाकाम’

दिल्ली में रोज़ 700 मिलियन गैलन से अधिक सीवेज पैदा होता है. इसमें से 200 मिलियन गैलन से अधिक सीवेज बिना ट्रीटमेंट सीधे यमुना नदी में गिरता है.

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नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में सीवेज एक बड़ी समस्या है. दिल्ली में रोज़ 700 मिलियन गैलन से ज़्यादा सीवेज पैदा होता है. इसमें से 200 मिलियन गैलन से ज़्यादा सीवेज का ट्रीटमेंट नहीं हो पाता और ये सीधे यमुना नदी में गिरता है. बिना ट्रीटमेंट वाले सीवेज से व्यापक स्तर पर निपटने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) को एक जून तक का समय दिया गया था. लेकिन बोर्ड ऐसा नहीं कर पाया. डीजेबी के एक अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा कि निकट भविष्य में सीवेज संकट थमने की कोई संभावना नहीं है.

यमुना को साफ करने के लिए दिल्ली सरकार के अलग-अलग विभाग तय डेडलाइन के तहत काम नहीं कर रहे. ये समस्या लगातार बनी हुई है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 13 जनवरी 2015 को यमुना में दिल्ली के गिराए जा रहे सीवेज की रोकथाम को लेकर और नदी की सफाई के लिए 31 मार्च 2017 की डेडलाइन दी थी. तब से ये डेडलाइन्स लगातार मिस होती रही हैं. दिल्ली जल बोर्ड को दी गई पिछली डेडलाइन इसी का हिस्सा थी.

यमुान से जुड़े केजरीवाल के वादे

ऐसा तब है जब आम आदमी पार्टी (आप) ने अपने 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से जुड़े अपने घोषणापत्र में लिखा था- ‘लंबे समय से यमुना नदी दिल्ली की सामुहिक याद का हिस्सा रही है लेकिन ये जीवनरेखा मर रही है. हम दिल्ली के 100 प्रतिशत सीवेज को इक्ट्ठा करके उसका ट्रिटमेंट सुनिश्चित करेंगे जिसके लिए व्यापक सीवर नेटवर्क और नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएंगे. बिना ट्रीटमेंट वाले पानी और औद्योगिक गंदगी को यमुना में बहाए जाने से सख्ती से रोका जाएगा.’

ऐसा वादा करने वाली पार्टी आप के मुखिया और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के पास पिछले चार सालों से अधिक समय से जल विभाग मंत्रालय है. बावजूद इसके सीवेज समस्या का निवारण तो छोड़िए यमुना और मैली हो गई है.

क्या होता है सीवेज

प्रतिदिन घरों से पानी के साथ निकलने वाला मैला, कचरा और गंदगी ही सीवेज है. दिल्ली जल बोर्ड के मुताबिक दिल्ली में 20 के करीब सीवेज ट्रटीमेंट प्लांट है जिनमें से सारे काम नहीं कर रहे. हालांकि, इनकी ट्रीटमेंट की क्षमता 600 एमजीडी की है. लेकिन ये 500 एमजीडी के करीब ही ट्रीट कर पाते हैं.

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क्या है यमुना के पानी का स्तर, ई क्लास से के क्या है मायने 

इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने साफ तौर पर कहा है कि अगर डेडलाइन का पालन नहीं किया गया तो नियामक संस्थाएं पर्यावरण कर लगाने को स्वतंत्र होंगी. वहीं, दिल्ली की जल समस्या पर पर्यावरणविद बिमलेंदू झा ने कहा, ‘नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली का ग्राउंड वॉटर लेवल छह महीने में शून्य हो जाएगा. सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मुताबिक युमना के सर्फेस वॉटर (सतह का पानी) ई-क्लास (बेहद ख़राब) है.’

दिल्ली में मौजूद ट्रीटमेंट प्लांट की लिस्ट: डीजेबी

20 वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट हैं तो लेकिन कितने हैं कारगार
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कहां-कहां से यमुना में गिर रहा है बिना ट्रीटमेंट वाला सीवेज

दिल्ली में यमुना की बदहाली के दो बड़े कारण हैं. एक नजफगढ़ नाला और दूसरा शहादरा वाला नाला है. इन दोनों ही नालों से आधी से अधिक दिल्ली की अनाधिकृत कॉलनियों का बिना ट्रीटमेंट किया गया मैला यमुना में गिरता है. दिल्ली में यमुना से जुड़ी 22 सहायक प्राकृतिक धाराएं (ट्रीब्यूटरीज़) भी हैं. जिसे यमुना की सहायक नदियां भी कहा जाता है,  इनसे बहकर बारिश का पानी नदी में आता था. दरअसल, अब दिल्ली जल बोर्ड अनाधिकृत कॉलनियों से पानी निकासी के लिए इन श्रोतों का उपोयग नाले के तौर पर कर रहा है.

इन सब से निबटने के लिए डीजेबी को मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता को 99% तक ले जाना था. यमुना में सीवेज ले जा रहे चार नालों पर भी लगाम लगानी थी और इंटरसेप्टर सीवेज प्रोजेक्ट (आईएसपी) के जरिए बिना सीवर लाइन वाले इलाकों को सीवर से जोड़ना था. तय समय में डीजेबी इनमें से कुछ भी नहीं कर पाया. सीवेज दिल्ली में प्रदूषण और जल संकट का बड़ा कारण है. यमुना में सीवेज का पानी जाने से रोकने के लिए दिल्ली सरकार ने कोई सार्थक कदम नहीं उठाए हैं.

दिल्ली जल बोर्ड के मुताबिक आईएपसी जुलाई तक तैयारी होगी. लेकिन दिसंबर से पहले काम करना शुरू नहीं करेगी. क्योंकि सीवेज को दिल्ली के आजदपुर स्थित कोरोनेशन पिलर के पास वाले ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाना होगा. दिल्ली जल बोर्ड के मुताबिक इसकी क्षमता 30 एमजीडी ट्रीटमेंट की है. ये प्लांट दिसंबर से पहले शुरू नहीं हो पाएगा. कोरोनेशन पिलर वाले प्लांट को एक जून तक शुरू करना था. लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

अनाधिकृत कॉलनियों में क्या है सीवर लाइन से जुड़ी समस्या?

दिल्ली जल बोर्ड के मुताबिक अनाधिकृत कॉलनियों में सड़कें इतनी सकरी हैं कि सीवर के लिए गहरी खुदाई नहीं की जा सकती. दि हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में 1700 अवैध कॉलनियों की आबादी 40 लाख़ के करीब है. इनमें से महज़ 385 के पास ही सीवर लाइनें हैं. हालांकि, डीजेबी ने यह भी माना है कि जिन आधी अनाधिकृत कॉलनियों के पास सीवर लाइनें नहीं हैं इन कॉलनियों का सीवेज बिना ट्रीटमेंट के पहले पास के नालों में गिरता है और वहां से यमुना में गिरता है.

डीजेबी ने दिप्रिंट से कहा, ‘अनाधिकृत कॉलनियों में सीवर लाइन नहीं बिछाई जा सकतीं. इससे निबटने के लिए डिसेंट्रलाइज़ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (डीएसटीपी) को मान्यता दी गई है. बिना सीवर लाइन वाले इलाकों में डीएसटीपी के सीवेज ले जाने के लिए बुलाया जा सकता है. डीएसटीपी सीवेज को इन जगहों से ले जाकर ट्रीटमेंट प्लांट में डंप करेगा.’

अनाधिकृत कॉलनियों में सीवर लाइन के मामले पर पर्यावरणविद झा कहते हैं कि सेंटरलाइज़ ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की जगह डिसेंटरलाइज ट्रीटमेंट प्लांट (डीटीपी) बनाना पड़ेगा. पूरी दिल्ली में 20 एसटीपी की जगह 200 डीटीपी लगाने होंगे. डीजेबी के डीएसटीपी भी अभी अपने शुरुआती दौर में नहीं है और कॉलनियों की जगह स्कूल-कॉलेज जैसे संस्थानों के लिए काम करना शुरू किया है. जल बोर्ड ने ऐसे ही एक डीएसटीपी की रजोकरी लेक के पास होने की जानकारी दी.

क्या है इस समस्या का संभावित हल?

इस समस्या पर एनजीओ सेंटर फॉर अर्बन एंड रीजनल एक्सिलेंस (क्योर) की निदेशक रेणु खोसला ने कहा कि अनाधिकृत कॉलनियों में सिम्लिफाइ सीवर सिस्टम (एसएसएस) एक हल हो सकता है. उन्होंने अपने क्योर द्वारा गीता कॉलनी की झुग्गियों में लगाए गए एसएसएस की सफलता का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा, ‘एसएसएस के लिए गहरी खुदाई नहीं करनी पड़ती और बाद में इसे मेन सीवर लाइन से जोड़ दिया जाता है.’ गीता कॉलनी में इसे संकरी गलियों में बनाया गया और किसी घर को नुकसान नहीं पहुंचा.

जल और प्रकृति के लिए काम कर रही गैर सरकारी संस्था कांउसिल फॉर एनर्जी एनवायरमेंट एंड वाटर की कनकनिका नियोग के मुताबिक बेंगलुरु में डिसेंट्रलाइज़ ट्रीटमेंट की छोटी-मोटी कोशिशें हो रही हैं. इसी ओर दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड को भी बढ़ना होगा. एनजीओ ने ये भी कहा कि प्रकृति और उसे बचाने के लिए सिर्फ बातें होती हैं, और उसके बारे में कोई नहीं सोच रहा. एनवॉयरमेंटल फ्लो पानी की वो सबसे कम मात्रा होती है जो एक नदी के सबसे कमज़ोर जीवों के जीवित रहने के लिए ज़रूरी होती है.

एनवॉयरमेंटल फ्लो तो दूर की बात है, दिल्ली में यमुना एक नाले में तब्दील हो गई है. दिप्रिंट से बातचीत में दिल्ली जल बोर्ड ने भी यमुना के लगभग मृत होने की बात स्वीकार की है.

जिस तरह से उच्च तकनीक से लैस देश की राजधानी दिल्ली में यमुना को मारा जा रहा है. सरकार हो या विभाग दिल्ली की लाइफ-लाइन कही जाने वाली यमुना में गंदगी तो धड़ल्ले से गिरा रही है लेकिन साफ-सफाई को लेकर उदासीन रवैया बनाया हुआ है..इससे यह कहा जा सकता है कि यमुना कुछ सालों में सिर्फ नाम रह जाएगी.

(इस मामले पर हमने आप से बात करनी को कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उनका जवाब मिलने पर स्टोरी को अपडेट किया जाएगा.)

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