Saturday, 2 July, 2022
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‘बुली बाई’, PM की सुरक्षा में नाकामी, लखीमपुर मामले में चार्जशीट- उर्दू प्रेस की ये रही सुर्खियां

दिप्रिंट का राउंड-अप बता रहा है कि उर्दू मीडिया ने बीते हफ्ते विभिन्न घटनाओं को कैसे कवर किया और कुछ खबरों को लेकर उनका संपादकीय रुख क्या रहा.

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नई दिल्ली: हरिद्वार की धर्म संसद में नफरत भरे भाषणों और हरियाणा में नमाज में बाधा डाले जाने को लेकर जारी विवादों के बीच मुस्लिम महिलाओं को ऑनलाइन बदनाम करने का एक और प्रयास सामने आया. बुली बाई एप से जुड़े इस मामले में उर्दू अखबारों ने काफी कड़ा रुख अपनाया और एक उनमें से एक ने तो ‘सांप्रदायिकता’ के लिए एक केंद्रीय मंत्री तक को जिम्मेदार ठहराया.

अखबारों ने फिरोजपुर में एक कार्यक्रम में भाग लेने जा रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब यात्रा के दौरान सुरक्षा चूक और इसे लेकर जबर्दस्त राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों को पूरे विस्तार से छापा. उर्दू अखबारों ने न केवल इस घटना और उसके बाद शुरू हुई राजनीतिक बयानबाजी का पूरा ब्योरा दिया बल्कि कई बार नैरेटिव के किसी एक पक्ष को उभारकर मामले को रोचक मोड़ भी दे दिया.

दिप्रिंट अपने साप्ताहिक राउंडअप में आपको बता रहा है कि काफी ज्यादा हलचल भरे इस हफ्ते में उर्दू अखबारों ने किन खबरों को अपने पहले पन्ने पर तरजीह दी, और कुछ प्रमुख समाचार पत्रों ने इन पर किस तरह का संपादकीय रुख अपनाया.

‘बुली बाई’ एप जमकर मचा बवाल

उत्तराखंड की धर्म संसद में कथित नफरत भरे भाषणों के बाद ‘बुली बाई’ एप और इस मामले का ‘राजनीतिकरण’, पूरे हफ्ते उर्दू अखबारों के पहले पन्नों की सुर्खियों में रहा. 3 जनवरी को इंकलाब ने लिखा कि पिछले साल इसी तरह की एक वेबसाइट ‘सुल्ली डील्स’ के मामले में ठोस कार्रवाई के अभाव ने अपराध की पुनरावृत्ति को बढ़ावा दिया. एक दिन बाद रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने इस मामले पर ‘आक्रोश’ की रिपोर्ट छापी.

इंकलाब ने 5 जनवरी को अपने संपादकीय में लिखा कि यह अपराध मुस्लिम महिलाओं की तरह से रखी जा रही सही जानकारियों और तर्कपूर्ण राय को स्वीकारने में लोगों की अक्षमता को दिखाता है और ‘गोली मारो…’जैसी अभद्र भाषा के इस्तेमाल और धार्मिक आयोजनों में कथित तौर पर नफरत भरे भाषणों के साथ माहौल बिगाड़ने का प्रत्यक्ष परिणाम है.

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अखबार ने 7 जनवरी को एक फ्रंट पेज ओपिनियन पीस में इस एप के मामले को हिंदुओं और मुसलमानों के बीच टकराव में बदलने की कोशिश के लिए केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव की आलोचना की और कहा हिंदू महिलाओं के खिलाफ इसी तरह के अपराधों का उनका दावा निराधार है. अखबार ने धर्म संसद में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किए जाने खिलाफ कार्रवाई न होने को लेकर सेवानिवृत्त नौकरशाहों और राजनयिकों सहित प्रमुख नागरिकों की तरफ से लिखे गए एक ओपन लेटर की खबर को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया.

रोजनामा ने अपने 6 जनवरी के संपादकीय में लिखा कि मुसलमानों के खिलाफ इस साजिश के लिए युवा लड़के-लड़कियों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

पीएम की सुरक्षा में चूक

इस सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा में चूक, इस पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच छिड़ा वाकयुद्ध और दोनों सरकारों की तरफ से दो जांच समितियों का गठन किया जाना, इस सप्ताह उर्दू मीडिया में पहले पन्ने की सुर्खियों में छाया रहा.

6 जनवरी को तीनों अखबारों—इंकलाब, रोजनामा और सियासत—ने इस खबर को पहले पन्ने पर छापा लेकिन सियासत ने अपनी हेडलाइन थोड़ी ट्विस्ट कर दी. इसने लिखा, ‘सुरक्षा चूक का ड्रामा! मोदी रैली मैदान में भीड़ न होने के कारण फिरोजपुर नहीं गए.’ अगले दिन रोजनामा ने इस घटना पर पीएम मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के बीच बैठक की खबर दी. 7 जनवरी को इंकलाब ने अपने पहले पेज पर खबर प्रकाशित की कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर एक याचिका पर तत्काल सुनवाई के लिए तैयार है.

लखीमपुर खीरी चार्जशीट

लखीमपुर खीरी मामले में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री (गृह) अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा के खिलाफ 5,000 पन्नों की चार्जशीट दायर की गई थी, जिसे 4 जनवरी को सहारा और इंकलाब दोनों ने अपनी लीड खबर बनाया. इंकलाब ने 7 जनवरी को अपने संपादकीय को एक दिलचस्प रंग देते हुए एमओएस अजय मिश्रा और मेघालय के राज्यपाल सत्य पाल मलिक को भाजपा पर बोझ बताया. अखबार ने दावा किया कि यद्यपि दोनों अपने-अपने स्तर पर पार्टी के लिए शर्मिंदगी का सबब बन रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों के कारण उन्हें हटाना मुश्किल हो गया है.

मलिक ने किसान आंदोलन के मुद्दे पर सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा था. सियासत और रोजनामा दोनों ने उनके दावे को 4 जनवरी को पहले पन्ने पर भी छापा था.

कोविड के बढ़ते केस

कोविड के बढ़ते केस, एक नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का हमला और टीकाकरण अभियान इस सप्ताह अधिकांश समय पहले पन्ने की सुर्खियों में रहा.

इंकलाब ने 3 जनवरी को सरकार के बयान से जुड़ी एक खबर को पहले पन्ने पर जगह दी जिसमें कहा गया था कि साल के अंत तक टीकाकरण लक्ष्य पूरा नहीं कर पाने संबंधी मीडिया रिपोर्ट भ्रामक थी. इसके एक दिन बाद ही रोजनामा ने दिल्ली में कोविड की स्थिति पर फ्रंट पेज पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसमें बताया गया कि न केवल मामलों की संख्या बढ़ी है बल्कि पॉजिटिविटी रेट भी 6 प्रतिशत पर पहुंच गया है. अखबार ने यह भी कहा कि लॉकडाउन लगाए जाने की संभावना है.

हालांकि, उसी दिन इसने अपने संपादकीय में इस सबको लेकर दहशत खत्म करने की कोशिश करते हुए कहा कि ओमिक्रॉन वैरिएंट को डेल्टा की तरह ज्यादा घातक नहीं माना जा रहा है. साथ ही सलाह दी कि मौजूदा समय में सावधानी बरतना सबसे ज्यादा जरूरी है. इंकबाल ने 1 जनवरी को अपने संपादकीय में लिखा कि बीता साल कोविड की एक लहर के साथ शुरू हुआ था और इसका अंत ओमिक्रॉन नामक एक दूसरे के खतरे के साथ हुआ.

बेरोजगारी पर जताई चिंता

निजी थिंक टैंक सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक बेरोजगारी दर बढ़ जाने की खबर को पहले पन्नों पर खास जगह दी गई. इंकलाब ने अपने 6 जनवरी के संपादकीय में तर्क दिया कि भारत ने इस मुद्दे से निपटने के लिए न तो कोई बेहतर कदम ही उठाया और न ही दूसरों से कोई सबक ही लिया. इसमें यह कहा गया कि चिंताजनक पहलू यह है कि लोगों ने अब रोजगार की तलाश करना भी छोड़ दिया है.

2022 की विशलिस्ट पर दूसरी कड़ी के तहत 3 जनवरी को प्रकाशित एक अन्य संपादकीय में अखबार ने लिखा कि अर्थव्यवस्था में सुधार का इंतजार करने के बजाये बेरोजगारी से निपटने के लिए यूपीए की मनरेगा जैसी कोई शानदार पहल शुरू करने की जरूरत है.

(उर्दूस्कोप को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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