ईश्वरचंद विद्यासागर जिनकी मूर्ति तोड़े जाने पर चल रहा है विवाद
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नई दिल्ली: शिक्षाविद, महान दार्शनिक, समाज सुधारक और लेखर ईश्वरचंद विद्यासागर को इस दुनिया से गए करीब 128 साल हो चुके हैं. उनका पश्चिम बंगाल में वही स्थान है जैसा उत्तरी भारतीयों के दिलों में विवेकानंद का है. मंगलवार को उन्हीं शिक्षाविद और महान समाज सुधारक विद्यासागर की मूर्ति कुछ दंगाइयों ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान तोड़ दी. मूर्ति तोड़े जाने के बाद से ही कोलकाता में भाजपा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहा है. वहीं तृणमूल कांग्रेस सहित शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने सोशल मीडिया पर विरोध स्वरूप उनकी फोटो को अपनी प्रोफाइल फोटो बना ली है. मजेदार बात यह है कि मूर्ति तोड़े जाने को लेकर जहां टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ता व समर्थकों ने एक-दूसरे पर मूर्ति तोड़े जाने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन न तो ईश्वरचंद विद्यासागर को पता होगा कि उनके निधन के 128 साल बाद वो एक बार फिर चर्चा में होंगे और चुनावी मुद्दा भी बनाए जाएंगे. ये वही विद्यासागर हैं जिनके निधन के बाद महान कवि और दार्शनिक रबीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था ‘महापुरुष.’

कौन हैं ईश्वरचंद्र विद्यासागर

ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को पश्चिम बंगाल के जिला मेदनीपुर के गांव बीरशिंघा में हुआ था. वह एक प्रसिद्ध समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री और स्वाधीनता संग्राम के सेनानी थे. उन्हें गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता था. उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह के खिलाफ आवाज उठाई थी.

उन्होंने ‘मेट्रोपोलिटन विद्यालय’ सहित अनेक महिला विद्यालयों की स्थापना की और साल 1848 में वैताल पंचविंशति नामक बंगला भाषा की प्रथम गद्य रचना का भी प्रकाशन किया था. नैतिक मूल्यों के संरक्षक और शिक्षाविद विद्यासागर का मानना था कि अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के ज्ञान का समन्वय करके भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं के श्रेष्ठ को हासिल किया जा सकता है.

इंग्लिश पढ़ने के लिए गांव से लाए गए थे कोलकाता

विद्यासागर के पिता का नाम ठाकुरदास बन्धोपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था. उनका बचपन काफी गरीबी में बीता. यही नहीं कई बार दैनिक जरूरी चीजें भी मुहैया नहीं हो पाती थीं लेकिन बताया जाता है कि वह बहुत ही तीव्र बुद्धि के बच्चे थे. चूंकि उस दौरान इतना पैसा नहीं होता था तो उन्होंने भी महान लोगों की तरह अपनी पढ़ाई सड़क किनारे जलने वाले स्ट्रीट लैंप के नीचे की थी. गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद वह अपने पिता के साथ आठ वर्ष की आयु में कोलकाता आ गए थे. चूंकि वह तीक्ष्ण बुद्धि के धनी थे इसलिए वह न केवल हर चीज को झट से सीख जाया करते थे बल्कि छोटी सी उम्र में ही उन्हें कई संस्थानों से छात्रवृत्तियां भी दी गई थीं.

वह संस्कृत के स्कॉलर थे इसलिए उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गई थी.

यह कहानी भी रोचक है कि वह गांव में संस्कृत में पढ़ाई करते थे और अंग्रेजी पढ़ने के लिए कोलकाता लाए गए थे लेकिन हिंदू कॉलेज की फीस इतनी अधिक थी कि उनके पिता फीस देने में सक्षम नहीं थे..इसलिए ईश्वर का एडमिशन संस्कृत कॉलेज में ही कराया गया. जहां रहकर वह पढ़ाई कर रहे थे वहां एक बाल विधवा बहन थी जिसको लेकर उन्हें महिलाओं के साथ उस विधवा प्रथा के बारे में पता चला और यहां से महिलाओं के लिए क्रांति की शुरुआत की. यही नहीं उन्होंने इस कहावत को भी चरितार्थ किया जिसमें कहा जाता है कि ‘चैरिटी बिगींस एट होम’ कहावत को अपने घर से शुरू किया और अपने बेटे की शादी एक विधवा से कर नया इतिहास लिखा. उनके लगातार प्रचार का नतीजा था कि विधवा पुनर्विवाह कानून-1856 पारित हुआ. उन्होंने खुद एक विधवा से अपने बेटे की शादी कराई थी. उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई थी.

संस्कृत से लगाव बना रहा

चूंकि वह अति विद्वान थे तो उन्होंने संस्कृत पढ़ते हुए इंग्लिश में भी बराबर की महारत हासिल की. 1839 में विद्यासागर ने कानून की पढ़ाई पूरी की. 21 साल की उम्र में साल 1841 में उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया था. यहां पांच साल तक अपनी सेवा देने के बाद उन्होंने इसे छोड़ दिया और संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव के तौर पर नियुक्त हुए. पहले साल से ही उन्होंने शिक्षा पद्धति को सुधारने के लिए प्रशासन को अपनी सिफारिशें सौंपी.

उनकी सिफारिशों की वजह से कॉलेज के तत्कालीन सचिव रसोमय दत्ता के बीच तकरार भी हो गई. इसके बाद उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वो लगातार अपने मिशन में जुटे रहे. 1849 में एक बार फिर वह साहित्य के प्रोफेसर के तौर पर संस्कृत कॉलेज से जुडे़ और शिक्षा पद्धति में सुधार के साथ वह समाज सुधार की ओर आगे बढ़ने लगे.

समाज सुधारक और लड़कियों के लिए खोले कई दरवाजे

चूंकि उनका सामना बचपन में ही महिलाओं और बच्चियों की समस्या से हुआ था और बाल विवाह और विधवा की पीड़ा को उन्होंने नजदीक से देखा था तो उन्होंने समाज सुधार योगदान के रूप में स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कोलकाता में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज की स्थापना की. इन स्कूलों को चलाने का पूरा खर्चा उन्होंने अपने कंधों पर लिया. इसके लिए वह बंगाली में लिखी गई किताबों जिन्हें कि विशेष रूप से स्कूली बच्चों के लिए लिखा जाता था, उसकी बिक्री से फंड जुटाते थे.

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जातिवाद को खत्म कर सभी के लिए कॉलेज खोला

जब उन्हें संस्कृत कालेज का प्रधानाचार्य बनाया गया तो उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे खोल दिए. 1872 उच्च शिक्षा के लिए न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे भारत के लिए एक महत्वपूर्ण साल माना जाता है. यह पहला निजी कालेज है, जिसे किसी भारतीय ने खोला, इसमें पढ़ाने वाले शिक्षक भी भारतीय ही थे. इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि इस कालेज का वित्तीय प्रबंधन भी भारतीयों के हाथों में ही था.

1917 में स्थापित की गई थी ये मूर्ति

कल दंगाइयों ने विद्यासागर की जो मूर्ति तोड़ी है वह कालेज में 1917 में स्थापित की गई थी. यह लगभग 100 साल से अधिक पुरानी थी. मजेदार बात यह है कि इस कालेज के संस्थापक भी ईश्वरचंद्र विद्यासागर ही थे और उनके उत्साह, आकांक्षा, लगन और बलिदान के कारण, कालेज ने 1879 में स्नातक स्तर तक की शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय को मान्यता दिलाई. यह पहला कालेज है जिसके खुलने से उच्च शिक्षा में यूरोपियों का एकाधिकार समाप्त हुआ था. इस कालेज का उद्देश्य मध्यमवर्गीय हिंदुओं को कम पैसों में उच्च शिक्षा प्रदान करना था. इस कॉलेज के शुरू होने से पहले तक उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना पड़ता था लेकिन जिनके पास विदेश जाने के लिए पैसे नहीं होते थे, वो उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते थे. जिसके बाद 1917 में कालेज का नाम बदलकर विद्यासागर कालेज किया गया. इसी दौरान ये मूर्ति यहां स्थापित की गई थी.

विद्या सागर कॉलेज/ सोशल मीडिया

कॉलेज के संस्थापक ईश्वरचंद्र विद्यासागर का निधन 70 साल की उम्र में 29 जुलाई, 1891 को हो गया था. उनकी मृत्यु के बाद राष्ट्रकवि रबीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, ‘यह सोचकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि 4 करोड़ बंगालियों के निर्माण के लिए भगवान ने महापुरुष को जन्म दिया था.’


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