Monday, 6 December, 2021
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किशोर दा, पंचम, संजीव कुमार- ये तीनों अपने काम को लेकर जुनूनी थे: गुलजार

'ऑफ द कफ' कार्यक्रम में शेखर गुप्ता के साथ बातचीत में गुलजार ने अपने जीवन और काम पर पड़े बंगाली प्रभाव के बारे में बातें की और बताया कि मनोरंजन जगत के सितारों के साथ उनकी गुफ्तगू ने कैसे उनके लेखन को आकार दिया.

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नई दिल्ली: कवि, शायर, लेखक,फिल्म निर्माता गुलजार का कहना है कि 1975 में आपातकाल के दौरान उनके द्वारा बनायी गयी फिल्म ‘आंधी ‘ पर लगाए गए प्रतिबंध में कुछ भी असाधारण नहीं था. दिप्रिंट के प्रधान संपादक शेखर गुप्ता के साथ ‘ऑफ द कफ’ कार्यक्रम में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, ‘सभी राजनीतिक दल इसी तरह से व्यवहार करते हैं. जो स्थिति अब है, वही स्थिति तब भी थी’.

गुलजार ने अपने जीवन और काम पर पड़े बंगाली प्रभाव, पिछले 60 वर्षों में मनोरंजन जगत के दिग्गजों के साथ काम करने के अपने अनुभव और उनके साथ उनकी बेलाग बातचीत ने उनके लेखन को कैसे आकार दिया, इसके बारे में भी काफी कुछ बताया.

इनमें से कुछ दिग्गजों में बिमल रॉय, सलिल चौधरी, हेमंत कुमार, सत्यजीत रे, उत्तम कुमार, ऋषिकेश मुखर्जी, पंडित रविशंकर, सुचित्रा सेन, शर्मिला टैगोर, ऋत्विक घटक, समरेश बसु, बासु भट्टाचार्य, पंडित भीमसेन जोशी, महाश्वेता देवी और तरुण मजूमदार जैसे नाम शामिल हैं.

अपनी हालिया किताब, एक्चुअली… आई मेट देम, ए मेमॉयर में, गुलजार ने किशोर कुमार, आर.डी. बर्मन, संजीव कुमार और अन्य दिग्गज सितारों के साथ अपने काम के माध्यम से अपने दशकों लंबे करियर का चित्रण किया है. गुलजार ने कहा, ‘मैंने इन सभी सितारों के साथ अपनी मुलाकातों के बारे में ठीक वैसे ही लिखा है जैसा कि मेरे साथ हुआ था.’

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फिल्म ‘आंधी ’, जिसके एक दृश्य में सुचित्रा सेन द्वारा अभिनीत नायिका के चरित्र को एक मेज के सामने बैठा दिखाया गया है जिस पर एक शराब का गिलास और ऐशट्रे में एक आधी जली हुई सिगरेट रखी थी, के बारे में उन्होंने कहा, ‘उस वक्त तक, भारतीय फिल्मों में सिर्फ खलनायिकाओं को ही शराब पीते और धूम्रपान करते हुए दिखाया जाता था. मुझे यह सही नहीं लगा. हालांकि, मैंने जानबूझकर उसे शराब पीते हुए नहीं दिखाया, मुझे पता था कि इससे सेंसर बोर्ड कुछ समस्या पैदा कर सकता है. बस इतना सी ही बात है.’

गुलजार कहते हैं, ‘बाद में मुझे बताया गया था कि गांधी परिवार के भीतर इस दृश्य पर काफी चर्चा की गई थी, जहां संजय गांधी ने इस बारे में बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी.’ उन्होंने कहा कि उन्हें लगता था कि वह इस सब से बच निकलने में कामयाब रहेंगे.

अपने काम में रूपक का प्रयोग करने की अपनी शैली पर बात करते हुए गुलजार ने इस बात को रेखांकित किया कि कैसे पंजाबी हास्य भाव (सेंस ऑफ ह्यूमर) में व्यक्तित्व चित्रण और कल्पना व्यापक रूप से मौजूद हैं.

अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में प्रतिबंधित सा महसूस करने पर, उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि मैंने बदलते समय के साथ अपने आप को अच्छी तरह से ढाला है. लेकिन बेहतर होगा कि दर्शक ही इस बारे में निर्णय करें, वे ज्यादा बेहतर तरीके से जानते है.’

वे कहते हैं, ‘यदि आप अपने आस-पास के परिवेश से पूरी तरह से अवगत हैं और आप अपने इर्द-गिर्द जो कुछ भी हो रहा है उसे पकड़ पा रहे हैं, तो आपको किसी अन्य तरह की प्रेरणा की कोई आवश्यकता नहीं है. आपको अपने जीवन में हर चीज के प्रति प्रतिक्रिया देनी चाहिए.’


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ऐसा पागलपन जो विलक्षण प्रतिभा के साथ जिंदा रहता है

अतीत के पलों की याद ताजा करते हुए गुलजार ने कहा, ‘किशोर दा, पंचम दा (आरडी बर्मन) और संजीव कुमार, ये सब अपने काम के प्रति जुनूनी थे. वे सभी पागल थे और यह कहना उचित नहीं होगा कि उनमें से कौन ज्यादा पागल था. यह उस तरह का पागलपन है जो एक जीनियस के साथ हमेशा जिंदा रहता है.’

1972 में उनके द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म परिचय के गीत ‘मुसाफिर हूं यारों ‘ के बारे में बात करते हुए गुलजार ने विस्तार से बताया कि कैसे इस मशहूर गीत की धुन बनी थी. उन्होंने कहा, ‘लगभग आधी रात के आसपास का समय रहा होगा. मैं अपने घर पर था और पंचम ने मुझे नीचे आने को कहा. उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि मैं उनकी कार में एक गाना सुनूं.’

इस मजेदार वाकये के बारे में और बताते हुए वे कहते हैं, ‘हम कैसेट को रिवाइंड (आगे-पीछे) करते रहे, उन्होंने अंतरा के लिए पूरी धुन तैयार कर ली थी और फिर मुझसे इस गाने के लिए डमी लिरिक्स (नकली बोल) लिखने को कहा. हमने बांद्रा से जुहू तक कार की सवारी की और फिर वापस आ गए, तब तक गाने ने आकार लेना शुरू कर दिया था.’ इसके साथ वे यह बात भी जोड़ते हैं कि ऐसे पागल लोग आपके जीवन में अक्सर नहीं आते हैं. उन्होंने कहा ‘विशाल भारद्वाज एक और ऐसे ही जुनूनी शख्स हैं.’

1975 में शर्मिला टैगोर-अभिनीत ‘मौसम ‘ फिल्म, जिसमें शर्मिला ने दोहरी भूमिका निभाई थी जिनमें से एक युवा सेक्स वर्कर बनी थी, के एक संवाद के बारे में एक दिलचस्प घटना को याद करते हुए गुलजार ने कहा, ‘वो एक संवाद की अदायगी को लेकर काफी शर्मिंदगी महसूस कर रहीं थी पर वो मुझसे ऐसा कह नहीं पाई. लेकिन संजीव कुमार, जो उनके साथी-कलाकार थे, ने उन्हें वह संवाद बोलने के लिए मना लिया, और वह भी एक ट्रिक के साथ.

यह संवाद कुछ यूं था: ‘मैं तुम्हारे साथ जाउंगी और तुम्हारे साथ सोऊंगी भी लेकिन अगर तुमने मुझे अपने दोस्तों के साथ सोने के लिए कहा, तो मैं ऐसा नहीं करने वाली.‘


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