Sunday, 3 July, 2022
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जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए कर्नाटक राज्य कल्याण विभाग खोलेगा सरकारी सैलून्स

येदियुरप्पा सरकार ने इस सलॉन्स के लिए जगहें चिन्हित करनी शुरू कर दी हैं, और पंचायतों से ऐसे नाईयों की सूचियां तैयार करने को कहा है, जो अनुबंध पर काम करने के लिए तैयार हों.

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बेंगलुरू: कर्नाटक के समाज कल्याण मंत्रालय ने, सरकार द्वारा संचालित नाई की दुकानें खोलने का प्रस्ताव दिया है, चूंकि मीडिया में लगातार ख़बरें आ रहीं थीं, कि बाल कटाने जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी, राज्य में दलितों से भेदभाव किया जा रहा है.

समाज कल्याण विभाग की योजना के अनुसार, अधिकारियों ने पहले ही ऐसी जगहें चिन्हित करनी शुरू कर दी हैं, जहां ये दुकानें खोली जा सकती हैं, और उन्होंने सिफारिश की है कि स्थानीय गांव पंचायतें, ऐसे लोगों की सूचियां तैयार करें, जो अनुबंध के आधार पर नाई का काम करने के लिए तैयार होंगे.

समाज कल्याण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘ये क़दम जातिगत भेदभाव और एक समुदाय की प्रताड़ना से लड़ने की कोशिश है. समाज कल्याण विभाग ने इसकी सिफारिश की है, और हमने पिछले कुछ सालों में ऐसी ख़बरों को संज्ञान में लिया है, जहां दलितों और ओबीसीज को, उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया है’. उन्होंने आगे कहा, ‘सभी तरह के भेदभाव ख़त्म करने के लिए, विभाग ने ये योजना बनाई है’.

सरकार ने ये क़दम मीडिया की उन ख़बरों के बाद उठाया, जिनमें सलॉन्स में दलित और ओबीसीज़ लोगों से बचने की घटनाएं उठाई गईं थीं.

पिछले हफ्ते, मैसूरु स्थित एक बार्बर मल्लिकार्जुन शेट्टी ने आरोप लगाया, कि ऊंची जातियां उनका बहिष्कार कर रही हैं, और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और अन्य पिछड़े वर्गों के ग्राहकों की सेवा करने के लिए, उनसे 50,000 रुपए जुर्माना भरने को कहा गया है.

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नंजांगुड़ तालुक के हल्लारे गांव के निवासी, शेट्टी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. शेट्टी ने दिप्रिंट को बताया, ‘उन्होंने (ऊंची जातियों) मुझसे यहां तक कहा कि मुझे दलितों से कहीं ज़्यादा पैसा लेना चाहिए. उन्होंने मुझसे शेव के लिए 200, और बाल कटाने के लिए 300 रुपए वसूल करने के लिए कहा. मैंने कहा कि मैं ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि मेरे रेट सबके लिए बराबर थे’. उन्होंने आगे बताया, ‘लेकिन उन्होंने कहा कि अगर मैं रेट ऊंचे रखूंगा, तभी वो लोग (उपेक्षित वर्ग) सलॉन्स में नहीं आएंगे. लेकिन फिर उन्होंने इसका बदला लेने की ठानी, और मेरे बेटे को ज़बर्दस्ती शराब पीने, और नंगा होकर नाचने को मजबूर किया’.

राज्य में भेदभाव

ऐसी और भी ख़बरें रही हैं जिनमें दलितों के साथ, उनकी बुनियादी ज़रूरतों को लेकर भेदभाव किया गया है.

25 जून 2019 को, मीडिया में ख़बरें छपीं, कि हासन ज़िले के हुलिकल गांव के दलितों को, शेव कराने या बाल कटाने के लिए, आठ किलोमीटर पैदल चलकर, अरकालगुड़ जाना पड़ता था.


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स्थानीय दलित संस्थाओं ने किसी दूसरी जगह से नाई बुलाकर, दुकान खुलवाने का फैसला किया था, लेकिन वो कभी खुल नहीं पाई. लगभग 3,000 की आबादी के हुलिकल गांव में, क़रीब 150 दलित परिवार हैं, और यहां भेदभाव की कई घटनाएं हो चुकी हैं.

हुलिकल राजाशेखर, जो एक दलित कार्यकर्ता और रिटायर्ड शिक्षाविद हैं, और जो समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं, बताते हैं कि उन्होंने ग्राम पंचायत को एक ज्ञापन देकर, बारबर शॉप चलाने के लिए कोई जगह आवंटित करने का आग्रह किया था.

उन्होंने कहा, ‘हमारे नेताओं ने गांव में स्थित वेंकट रमन मंदिर में, दलितों के प्रवेश को लेकर लड़ाई की’. उन्होंने आगे कहा, ‘इस दिशा में बरसों तक लड़ाई लड़ने के बाद प्रतिबंध हटाए गए, लेकिन नाई की दुकान खोलने की गुज़ारिश अभी भी पूरी नहीं की गई है’.

भेदभाव की ऐसी ही एक और घटना 2017 में, कर्नाटक के रानेबेनूर ज़िले के हरनागिरी से सामने आई. मदिगा समुदाय के सदस्यों ने, जो कर्नाटक में 50 से अधिक दलित उप-जातियों को कहा जाता है, मांग की कि उन्हें नाई की दुकानों में दाख़िल होने दिया जाए.

उनका आरोप था कि नाई की सेवाएं लेने के लिए, उन्हें मजबूरन 20 किलोमीटर दूर रानेबेनूर शहर जाना पड़ता था.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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